Wednesday, December 23, 2009

प्रकृति की अनुपम कृति गंगरेल


प्रकृति की अनुपम कृति गंगरेल

जल ही जीवन है- जल से ही जीवन है, जल है तो सब कुछ है, जल नहीं तो कुछ भी नहीं- जल बिन सब सून। प्रकृति के हर चरण में जल से परिपूर्ण दृश्य-सदृश्य सौन्दर्य बोध कराते हैं, और खासकर जहां पहाडिय़ों से घिरा दूर-दूर तक पानी ही पानी नजर आये तो फिर क्या कहने वहीं का मंजर हर मौसम में सुकून भरा होता है। चंचल जल और ठहरा हुआ धीमा हलचल कल। कल हर तरह से प्रकृति के चितेरों को तृप्त करता है। आज हम छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े बांध गंगरेल के ऊपर खड़े हैं- यहां का नजरा मीलों तक पानी भरा अत्यंत सुंदर मधुर नमी स्पर्शमय है। गंगरेल बॉंध 2 किलोमीटर में एक फलांग कम 1830 मीटर लंबा है। इसके 14 विशाल रेडियल गेट (टेन्टर गेट) हैं, जो घूमते हुए खुलते हैं, सामान्य स्थिति में यहां 27 टीएमसी (टन मिलियन क्यूबिक मीटर) जल मौजूद रहता है। यहां से नीचे जाने पर गैलेरी में गंगरेल डेम रविशंकर सागर परियोजना का सबसे प्रमुख आकर्षण है ,यह एक सुरंग है, जो डेम के निचले हिस्से में लगभग 1 किलोमीटर लंबी है। इसका उद्देश्य अंदर का निरीक्षण व रिसाव पर नजर रखना भी है, लेकिन यहां आकर एक आश्चर्य अनुभूति की यात्रा चरम सीमा पर आना स्वाभाविक हो जाती है। यहां एक सुंदर लिफ्ट गार्डन है जहां डेम के ऊपर से लिफ्ट से आने की भी व्यवस्था है। यहां 10 मेगावाट विद्युत उत्पादन का कार्य प्रगति पर है। यहां बोटिंग और वाटर गेम्स तथा पर्यटन की प्रचूर संभावनाओं की भरमार है। डेम की मछलियां भी यहां प्रसिद्घ हैं। अब हम है अंगार मोती देवी के मंदिर की ओर पहुंचते हैं। यह गंगरेल डेम से लगा हुआ अत्यंत प्रसिद्घ है। दीपावली के बाद के शुक्रवार में यहां मड़ई (मेला) लगता है, इस अंचल के नामी नाचा पार्टी इस मेले के खास आकर्षण होते हैं। यहीं गंगरेल कॉलोनी है जो गंगरेल के कर्मचारियों का निवास है। गंगरेल से 4 कि.मी. दूर खूबचंद बघेल बराज (छोटा डेम पुलिया) है जहां मुख्य नहरों को सिंचाई के लिए दिशा दी गई है। इसका दृश्य सुंदर है। यहां से 40 किमी दूरी पर मुरूमसिली (माडम) डेम ब्रिटिश गवर्नमेन्ट का बनाया साइफन स्पील व ऑटोमेटिक पद्घति का दर्शनीय है। हमारा अगला पड़ाव धमतरी है। राष्ट्रीय राजमार्ग 43 पर धमतरी छोटा किंतु नामी शहर है। यहां प्रदेश का पहली नगर पालिका है जहां कचरे से खाद तैयार किया जाता है। धान की पैदावार का सबसे महत्वपूर्ण जगह धमतरी। बिलाईमाता मंदिर यहां का सबसे बड़ा एवं महत्वपूर्ण है। धमतरी और रायपुर के बीच चलने वाली नेरो गेज छोटी रेल लाइन की रेलगाड़ी बड़ी सुंदर है। इसकी कम रफ्तार व समतल क्षेत्र से गुजरते हुए दृश्य को कैमरे में कैद करना न भूलें। दूरी- राष्ट्रीय राजमार्ग 43 पर धमतरी, रायपुर से 77 कि.मी. दूर तथा गंगरेल धमतरी से 11 किमी पर स्थित है। रायपुर से धमतरी तक के लिए छोटी लाइन रेल सेवा भी उपलब्ध है।
पड़ाव- धमतरी में सभी प्रकार की ठहरने व खाने की सुविधा है। बेहतर सुविधा के लिये रायपुर रूकना अच्छा रहता है। चल चित्र में जल चित्र का अति महत्व स्थान है। इसका रूपांकन यहां बेहतरीन तरीके से किया जा सकता है।

Sunday, December 20, 2009

छत्तीसगढ़ का इतिहास



छत्तीसगढ़
छत्तीसगढ़ भारत का एक राज्य है। छत्तीसगढ़ राज्य का गठन १ नवंबर २००० को हुआ था। यह भारत का २६वां राज्य है । भारत में दो क्षेत्र ऐसे हैं जिनका नाम विशेष कारणों से बदल गया - एक तो 'मगध' जो बौद्ध विहारों की अधिकता के कारण "बिहार" बन गया और दूसरा 'दक्षिण कौशल' जो छत्तीस गढ़ों को अपने में समाहित रखने के कारण "छत्तीसगढ़" बन गया। किन्तु ये दोनों ही क्षेत्र अत्यन्त प्राचीन काल से ही भारत को गौरवान्वित करते रहे हैं। "छत्तीसगढ़" तो वैदिक और पौराणिक काल से ही विभिन्न संस्कृतियों के विकास का केन्द्र रहा है। यहाँ के प्राचीन मन्दिर तथा उनके भग्नावशेष इंगित करते हैं कि यहाँ पर वैष्णव, शैव, शाक्त, बौद्ध के साथ ही अनेकों आर्य तथा अनार्य संस्कृतियों का विभिन्न कालों में प्रभाव रहा है।
छत्तीसगढ़ के उत्तर और उत्तर-पश्चिम में मध्यप्रदेश का रीवां संभाग, उत्तर-पूर्व में उड़ीसा और बिहार, दक्षिण में आंध्र प्रदेश और पश्चिम में महाराष्ट्र राज्य स्थित हैं। यह प्रदेश ऊँची नीची पर्वत श्रेणियों से घिरा हुआ घने जंगलों वाला राज्य है। यहाँ साल, सागौन, साजा और बीजा और बाँस के वृक्षों की अधिकता है। छत्तीसगढ़ क्षेत्र के बीच में महानदी और उसकी सहायक नदियाँ एक विशाल और उपजाऊ मैदान का निर्माण करती हैं, जो लगभग 80 कि.मी. चौड़ा और 322 कि.मी. लम्बा है। समुद्र सतह से यह मैदान करीब 300 मीटर ऊँचा है। इस मैदान के पश्चिम में महानदी तथा शिवनाथ का दोआब है। इस मैदानी क्षेत्र के भीतर हैं रायपुर, दुर्ग और बिलासपुर जिले के दक्षिणी भाग। धान की भरपूर पैदावार के कारण इसे धान का कटोरा भी कहा जाता है। मैदानी क्षेत्र के उत्तर में है मैकल पर्वत शृंखला। सरगुजा की उच्चतम भूमि ईशान कोण में है । पूर्व में उड़ीसा की छोटी-बड़ी पहाड़ियाँ हैं और आग्नेय में सिहावा के पर्वत शृंग है। दक्षिण में बस्तर भी गिरि-मालाओं से भरा हुआ है। छत्तीसगढ़ के तीन प्राकृतिक खण्ड हैं : उत्तर में सतपुड़ा, मध्य में महानदी और उसकी सहायक नदियों का मैदानी क्षेत्र और दक्षिण में बस्तर का पठार। राज्य की प्रमुख नदियाँ हैं - महानदी, शिवनाथ, खारुन, पैरी , तथा इंद्रावती नदी[
छत्तीसगढ़ का इतिहास
मुख्य लेख: रामायणकालीन छत्तीसगढ़
छत्तीसगढ़ प्राचीनकाल के दक्षिण कोशल का एक हिस्सा है और इसका इतिहास पौराणिक काल तक पीछे की ओर चला जाता है। पौराणिक काल का 'कोशल' प्रदेश, कालान्तर में 'उत्तर कोशल' और 'दक्षिण कोशल' नाम से दो भागों में विभक्त हो गया था इसी का 'दक्षिण कोशल' वर्तमान छत्तीसगढ़ कहलाता है। इस क्षेत्र के महानदी (जिसका नाम उस काल में 'चित्रोत्पला' था) का मत्स्य पुराण[क], महाभारत[ख] के भीष्म पर्व तथा ब्रह्म पुराण[ग] के भारतवर्ष वर्णन प्रकरण में उल्लेख है। वाल्मीकि रामायण में भी छत्तीसगढ़ के बीहड़ वनों तथा महानदी का स्पष्ट विवरण है। स्थित सिहावा पर्वत के आश्रम में निवास करने वाले श्रृंगी ऋषि ने ही अयोध्या में राजा दशरथ के यहाँ पुत्र्येष्टि यज्ञ करवाया था जिससे कि तीनों भाइयों सहित भगवान श्री राम का पृथ्वी पर अवतार हुआ। राम के काल में यहाँ के वनों में ऋषि-मुनि-तपस्वी आश्रम बना कर निवास करते थे और अपने वनवास की अवधि में राम यहाँ आये थे।
इतिहास में इसके प्राचीनतम उल्लेख सन 639 ई० में प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्मवेनसांग के यात्रा विवरण में मिलते हैं। उनकी यात्रा विवरण में लिखा है कि दक्षिण-कौसल की राजधानी सिरपुर थी। बौद्ध धर्म की महायान शाखा के संस्थापक बोधिसत्व नागार्जुन का आश्रम सिरपुर (श्रीपुर) में ही था। इस समय छत्तीसगढ़ पर सातवाहन वंश की एक शाखा का शासन था। महाकवि कालिदास का जन्म भी छत्तीसगढ़ में हुआ माना जाता है। प्राचीन काल में दक्षिण-कौसल के नाम से प्रसिद्ध इस प्रदेश में मौर्यों, सातवाहनों, वकाटकों, गुप्तों, राजर्षितुल्य कुल, शरभपुरीय वंशों, सोमवंशियों, नल वंशियों, कलचुरियों का शासन था। छत्तीसगढ़ में क्षेत्रीय राजवंशो का शासन भी कई जगहों पर मौजूद था। क्षेत्रिय राजवंशों में प्रमुख थे: बस्तर के नल और नाग वंश, कांकेर के सोमवंशी और कवर्धा के फणि-नाग वंशी। बिलासपुर जिले के पास स्थित कवर्धा रियासत में चौरा नाम का एक मंदिर है जिसे लोग मंडवा-महल भी कहा जाता है। इस मंदिर में सन् 1349 ई. का एक शिलालेख है जिसमें नाग वंश के राजाओं की वंशावली दी गयी है। नाग वंश के राजा रामचन्द्र ने यह लेख खुदवाया था। इस वंश के प्रथम राजा अहिराज कहे जाते हैं। भोरमदेव के क्षेत्र पर इस नागवंश का राजत्व 14 वीं सदी तक कायम रहा।१०

साहित्य
छत्तीसगढ़ साहित्यिक परम्परा के परिप्रेक्ष्य में अति समृद्ध प्रदेश है। इस जनपद का लेखन हिन्दी साहित्य के सुनहरे पृष्ठों को पुरातन समय से सजाता-संवारता रहा है। श्री प्यारेलाल गुप्त अपनी पुस्तक "प्राचीन छत्तीसगढ़" में बड़े ही रोचकता से लिखते है। [२] छत्तीसगढ़ी और अवधी दोनों का जन्म अर्धमागधी के गर्भ से आज से लगभग 1080 वर्ष पूर्व नवीं-दसवीं शताब्दी में हुआ था।"[३]
भाषा साहित्य पर और साहित्य भाषा पर अवलंबित होते है। इसीलिये भाषा और साहित्य साथ-साथ पनपते है। परन्तु हम देखते है कि छत्तीसगढ़ी लिखित साहित्य के विकास अतीत में स्पष्ट रुप में नहीं हुई है। अनेक लेखकों का मत है कि इसका कारण यह है कि अतीत में यहाँ के लेखकों ने संस्कृत भाषा को लेखन का माध्यम बनाया और छत्तीसगढ़ी के प्रति ज़रा उदासीन रहे।इसीलिए छत्तीसगढ़ी भाषा में जो साहित्य रचा गया, वह करीब एक हज़ार साल से हुआ है।
अनेक साहित्यको ने इस एक हजार वर्ष को इस प्रकार विभाजित किया है :
छत्तीसगढ़ी गाथा युग:सन् 1000 से 1500 ई. तक
छत्तीसगढ़ी भक्ति युग - मध्य काल,सन् 1500 से 1900 ई. तक
छत्तीसगढ़ी आधुनिक युग: सन् 1900 से आज तक
ये विभाजन साहित्यिक प्रवृत्तियों के अनुसार किया गया है यद्यपि प्यारेलाल गुप्त जी का कहना ठीक है कि - " साहित्य का प्रवाह अखण्डित और अव्याहत होता है।" [४]
यह विभाजन किसी प्रवृत्ति की सापेक्षिक अधिकता को देखकर किया गया है।एक और उल्लेखनीय बत यह है कि दूसरे आर्यभाषाओं के जैसे छत्तीसगढ़ी में भी मध्ययुग तक सिर्फ पद्यात्मक रचनाएँ हुई है।
संस्कृति
आदिवासी कला काफी पुरानी है । हिंदी लगभग सभी जगह बोली जाती है पर मूल भाषा छत्तीसगढ़ीहै।
लोकगीत और लोकनृत्य
छत्तीसगढ़ के गीत दिल को छु लेती है यहाँ की संस्कृति में गीत एवं नृत्य का बहुत महत्व है। इसीलिये यहाँ के लोगों में सुरीलीपन है। हर व्यक्ति थोड़े बहुत गा ही लेते है। और सुर एवं ताल में माहिर होते ही है।
यहां के गीतों में से कुछ हैं:
के
लोकगीत
भोजलीपंडवानीजस गीतभरथरी लोकगाथा • बाँस गीतगऊरा गऊरी गीतसुआ गीतछत्तीसगढ़ी प्रेम गीतदेवार गीतकरमाछत्तीसगढ़ी संस्कार के iit
छत्तीसगढ़ के लोकगीत में विविधता है, गीत अपने आकार में छोटे और गेय होते है। गीतों का प्राणतत्व है भाव प्रवणता। छत्तीसगढ़ी लोकभाषा में गीतों की अविछिन्न परम्परा है।छत्तीसगढ़ के प्रमुख और लोकप्रिय गीतों है - सुआगीत, ददरिया, करमा, डण्डा, फाग, चनौनी, बाँस गीत, राउत गीत, पंथी गीत।
सुआ, करमा, डण्डा, पंथी गीत नृत्य के साथ गाये जाते है। सुआ गीत करुण गीत है जहां नारी सुअना (तोता) की तरह बंधी हुई है। गोंड जाति की नारियाँ दीपावली के अवसर पर आंगन के बीच में पिंजरे में बंद हुआ सुआ को प्रतीक बनाकर (मिट्टी का तोता) उसकेचारो ओर गोलाकार वृत्त में नाचती गाती जाती हैं। इसालिए अगले जन्म में नारी जीवन पुन न मिलने ऐसी कामना करती है।
राऊत गीत दिपावली के समय गोवर्धन पूजा के दिन राऊत जाति के द्वारा गाया जाने वाला गीत है। यह वीर-रस से युक्त पौरुष प्रधान गीत है जिसमें लाठियो द्वारा युद्ध करते हुए गीत गाया जाता है। इसमें तुरंत दोहे बनाए जातें हैं और गोलाकार वत्त में धूमते हुए लाठी से युद्ध का अभ्यास करते है। सारे प्रसंग व नाम पौराणिक से लेकर तत्कालीन सामजिक / राजनीतिक विसंगतियों पर कटाक्ष करते हुए पौरुष प्रदर्शन करते है।

Thursday, December 17, 2009

loving birds

kal ho na ho...




































...






save it.

Saturday, September 19, 2009

Sunday, August 23, 2009

शरारत या किसी बड़ी घटना की तैयारी ?

शरारत या

किसी बड़ी

घटना की

तैयारी ?

Friday, August 14, 2009

आजादी के 62 साल बाद देश मे हर चीज नकली


आजादी के 62 साल बाद
देश मे हर चीज नकली

ये कैसा विकास है? ये कैसी तरक्की है? किस रास्ते पर जा रहा है हमारा प्यारा भारत देश? कौन है इसके लिए जिम्मेदार? कौन रोकेगा इसे? ये और इस तरह के तमाम सवाल देश के उन सभी लोगों से है जो किसी न किसी माध्यम से इस देश के साथ जुड़े हैं ,अर्थात् ये सवाल देश के सवा अरब लोगों से जिनमें देश को चलाने वाले नेता, देश का भविष्य संवारने वाले शिक्षक, देश के स्वास्थ्य की चिंता करने वाले डॉक्टर, देश को नया स्वरूप देने वाले इंजीनियर,देश का पेट भरने वाले किसान और देश के भविष्य की योजना बनाने वाले नौकरशाह सभी शामिल हैं। आजादी के इतने सालों में लिखने के लिए तो बहुत से विषय हैं लेकिन हम यहां पर देश में पांव पसार रहे नकली चीजों के कारोबार पर लोगों का ध्यान आकर्षित करना चाह रहे हैं।अनुभव करें तो आजाद भारत की उम्र जैसे-जैसे बढ़ती जा रही है वैसे-वैसे देश अंदर से खोखला होता जा रहा है। कभी शुद्धता और सौम्यता की मिसाल रहे इस देश की हर एक चीज आज नकली और मिलावटी हो गई है। देश के बाजार में नकली और मिलावटी चीजों की इतनी भरमार हो गई है कि आम आदमी का जीना दूभर हो गया है। नकली चीजें बनाने और मिलावट का कारोबार करने वाले चंद लोगोंं ने करोड़ों लोंगों की जिंदगी खतरे में डाल दी है। अपने आस पास नजर डालें तो खाने-पीने की चीजों से लेकर दैनिक उपयोग की प्रत्येक चीजें नकली हो गई है यहां तक की इन चीजों को खरीदने के लिए उपयोग किया जाने वाला नोट तक नकली बन चुका है। पाकिस्तान और पड़ोसी मुल्क के कुछ कारोबारियों ने भारत के भीतर इतनी अधिक मात्रा में जाली नोटों का जाल फैला दिया है कि वो देश की आर्थिक स्थिति को खोखला करने में महत्वपूर्ण हथियार साबित हो रहा है। नकली सामान,नकली खाद्य पदार्थ और नकली नोट देश के कोने-कोने में पहुंच चुके हैं। नकली समान से लोगों को आर्थिक क्षति,नकली खाद्य पदार्थ से लोगों को शारीरिक क्षति और नकली नोटों से देश को आर्थिक क्षति पहुंच रही है। क्या हमारे पुर्वजों ने देश की आजादी की मांग इन्हीं सब चीजों के लिए की थी ताकि विकास और तरक्की के नाम पर हमें नकली चीेजों का सामना करना पड़े। यदि नकली नोटों, दवाइयों, खाद्य पदार्थों एवं जरूरत की अन्य सामानों का कारोबार देश के भीतर इसी तेजी से फैलता रहा तो देश अंदर से इतना खोखला हो जाएगा कि एक दिन पूरा भारत नकली सामानों से पट जाएगा और नकली नोटों के कारण देश आर्थिक रुप से कमजोर हो जाएगा। आज हम अपने देश के भीतर अपने ही कुछ लोगों की कार गुजारियों के गुलाम बनकर रह गए हैं, हमारी जिंदगी चंद-लालची लोगों के हाथों में है जो मिलावट कर रातों-रात मालामाल हो रहे हैं। यदि हमारा देश आजाद है? देश में लोकतंत्र है? देश में कानून व्यवस्था है? तो देश की छाती पर बैठकर मूंग दलने वाले अर्थात देश के भीतर बैठकर देश भर में तमाम नकली चीजें फैलाने वाले लोगों पर सरकार इतनी नरम क्यों है? हाथ में आने के बाद भी हमारी पुलिस ऐसे लोगों के आकाओं तक क्यों नहीं पहुंच पाती? सरकार को चाहिए कि नकली चीजों का कारोबार करने वाले ऐसे लोगों को देशद्रोही करार देकर इनके खिलाफ कड़ी सजा का प्रावधान रखना चाहिए जिससे इस तरह देश के भीतर जहर घोलने वाले दूसरे लोगों के लिए यह एक सबक हो।
क्या-क्या नकली-
नोट- 100, 500, 1000 के नकली नोटों का जाल
खाद्य पदार्थ- तेल, घी, दूध, मक्खन, खोवा, आइसक्रीम, बिस्किट, चॉकलेट।
कई प्रकार की दवाईयां
आटोमोबाइल में टू-व्हीलर,फोर व्हीलर के तमाम नकली पार्ट्स
इलेक्ट्रीकल्स, इलेक्ट्रानिक्स की तमाम चीजों के नकली माल बाजार में उपलब्ध
ब्रांडेड कंपनियों के नकली कपड़े
विभिन्न यूनिवर्सिटी/ कालेजों के नकली मार्कशीट
टू-व्हीलर/ फोर व्हीलर के ड्राइविंग लायसेंस एवं कागजात
चेहरे पर लगाने वाले क्रीम, पाउडर, हेयर आयल इत्यादि।
क्या हानियां-
नकली चीजें खाने से जानलेवा बीमारियों का खतरा
इनसे आज मनुष्य की औसत उम्र में कमी
विकास में बाधक, विनाश में सहायक।
ऐसे हो बचाव-
सरकार को चाहिए कि वर्तमान में उपलब्ध तमाम नकली पदार्थों को मापने और जांचने परखने का मानक तैयार कर इसे सीधे आम जनता तक पहुंजाया जाना चाहिए जिससे जनता पहचान सके कि कौन सी चीज नकली है और कौन सी असली। अभी तक सरकार नकली नोटों की पहचान के लिए ही जनजागरण अभियान चला रही है। सरकार को ऐसा ही जनजागरण सभी चीजों के लिए चलाया जाना चाहिए।

Thursday, August 13, 2009

पैसों के पैसा बनाने का खेल




रायपुर में खुलेआम हो रही है


सिक्कों की कालाबाजारी


सिक्कों की कालाबाजारी राजधानी सहित जिले के कुछ हिस्सों में जोरों पर है। शहर के नामी इलाकों में कुछ ऐसे लोग हैं जो कमीशन पर सिक्कों का व्यवसाय कर रहे हैं। पैसे से पैसा बनाने के इस खेल के बीच ऐसे लोग तो लाल हो रहे हैं लेकिन इसका दुष्परिणाम आम लोगों और छोटे व्यापारियों की भुगतना पड़ रहा है। छोटे व्यापारी भी बैंकों से सिक्के नहीं मिलने के कारण ऐसे लोगों से कमीशन में सिक्के लेने को मजबूर हैं। इसी मजबूरी के कारण वे अपनी थोड़ी-बहुत कमाई चिल्हर की खरीदी में लुटा देते हैं। बाजार में हालात ये हंै कि अब एक दो रुपए के सिक्के तो दूर पांच के सिक्कों की भी शार्टेज हो गई है। जानकारों की मानें तो आरबीआई द्वारा जारी किए गए सिक्के की क्वालिटी काफी बेहतर होती है जिसका उपयोग कुछ लोगों द्वारा गलाकर बेचने में किया जाता है। बताते हैं कि इससे काफी बढिय़ा क्वालिटी की आर्टिफिशियल ज्वेलरी बनाई जाती है। जिसकी अच्छी कीमत उन्हें मिल जाती है एक विशेष वर्ग सिर्फ इसी काम में लगा हुआ है। इसके अलावा सिक्के खपाने वाला एक गिरोह जरुरत मंदों को 10 से 15 प्रतिशत कमीशन पर सिक्के उपलब्ध करवाता है। सूत्र बताते हैं कि ऐसे लोगों के पास बैकों से मिले सौ सिक्कों की पाउच आसानी से मिल जाती है,इसके लिए सिर्फ उन्हें उसके एवज में ज्यादा रुपए देने होते हैं। गोलबाजार और मौदहापारा थाना क्षेत्र में यह व्यापार खुलेआम संचालित है। कुछ व्यापारियों ने बताया कि एक रुपए के सिक्के के लिए उन्हें ज्यादा पैसे देने होते हैं जबकि पांच रुपए के सिक्के एक रुपए के सिक्के की तुलना में कम कमीशन पर उपलब्ध हो जाते हैं। बैंकों की मानें तो उनके पास आने वाले सिक्के चेम्बर आफ कामर्स के माध्यम से व्यापारियों तक पहुंचते हैं और किस व्यापारी को कितने सिक्के चेम्बर द्वारा दिए गए हैं इसकी लिस्टिंग बैंक के पास जमा की जाती है। लेकिन छोटे व्यापारियों को जिन्हें चेम्बर से सिक्के नहीं मिल पाते उन्हें बैंक से सिक्के देने का प्रावधान है पर छोटे व्यापारियों की मानें तो बैंकों द्वारा उन्हें सिक्के नहीं मिल पाते और ना ही उन्हें सिक्के वाली मशीन से सिक्के उपलब्ध हो पाते हैं। जिससे मजबूरन ऐसे लोगों से ज्यादा दाम में उन्हें व्यावसायिक उपयोग के लिए सिक्के खरीदने पड़ते हैं।


एक नजर कमीशन पर
पुराने सिक्के- 5 से 8 प्रतिशत
नए सिक्के - 10 से 12 प्रतिशत
एक रुपए - सबसे महंगा
दो रुपए -सामान्य
पांच रुपए - कम प्रतिशत पर उपलब्ध


चेम्बर में शिकायत करें- श्रीचंद

चेम्बर आफ कामर्स के अध्यक्ष श्रीचंद सुंदरानी ने कहा कि व्यापारियों को नियमत: सिक्के प्रदान किए जाते हैं लेकिन इस तरह का काम हो रहा है तो गलत है। शहर के किसी भी व्यापारी द्वारा इसकी शिकायत चेम्बर के पास की जाएगी तो निश्चित तौर पर ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।


आवश्यक्ता से अधिक सिक्के नहीं- राव


एसबीआई के उपप्रबंधक रोकड़ चिन्नाराव के मुताबिक सिक्के का आबंटन चेम्बर के माध्यम से व्यापारियों को किया जाता है और आरबीआई के दिशा निर्देश के मुताबिक किसी भी एक व्यापारी को आवश्यक्ता से अधिक सिक्के नहीं दिए जाते क्योकि इससे सिक्के की कालाबाजारी हो सकती है। छोटे व्यापारियों को भी बैकों के माध्यम से सिक्के दिए जाते हैं।


शिकायत पर होगी कार्रवाई- अमित कुमार

एसपी रायपुर अमित कुमार का कहना है कि यदि इस तरह के किसी मामले की शिकायत पुलिस के पास आती है तो उस पर जरुर कार्रवाई की जाएगी।

Wednesday, July 29, 2009

पैसों के लिए कुछ भी करेगा...

पैसों के लिए कुछ भी करेगा...


रियालिटी शो सच का सामना
देखकर ही पस्त हुए कई नामचीन

स्टार टीवी द्वारा प्रसारित किया जाने वाला रियालिटी शो सच का सामना जितनी तेजी से प्रचारित हो रहा है उतनी ही तेजी से उसका विरोध भी शुरु हुआ है। इस शो में पूछे जाने वाले प्रश्नों के एक-एक जवाब के साथ आप अपनों के दिलों से दूर और पैसों के नजदीक आते जाएंगे। अभी हाल में सच का सामना करने पहुंचे पूर्व क्रि केटर और वर्तमान के एक्टर विनोद कांबली ने मात्र दस लाख तक पहुंचने के लिए एक ऐसी कड़वी बात कह डाली जिसने उसे अपने सबसे अजीज और करीबी माने जाने वाले दोस्त तथा दुनिया के बेहतरीन बल्लेबाज सचिन तेंदुलकर के दिल में खटास भर दी। मात्र दस लाख के लिए उसने अपने बचपन की दोस्ती और सबसे अनमोल रिश्ता कुर्बान कर दिया। एकमात्र कांबली ही इसका उदाहरण नहीं है बल्कि जो भी अभी तक उस शो में आया है उन पर ऐसे सवाल दागे गए जिनके जवाब उनके रिश्तों की डोर को कमजोर करती चली गई। इस मंच पर आने वाला प्रतिभागी अपने सिर पर कफन बांध कर आता है. क्यों कि अपनी पत्नी, बच्चों,भाईयों और माता-पिता के सामने बैठकर उसे जो जबाव देने हैं वो वहां बैठे किसी भी रिश्ते को खत्म करने के लिए काफी है। कार्यक्रम को देखने और समझने से एक बात तो स्पष्ट हो जाती है कि तेजी से विकास की ओर बढ़ रही पृथ्वी के भारत देश में भी कुछ ऐसे लोग हैं जिन्हें पैसों के आगे अपने अनमोल रिश्ते-नातों की कोई परवाह नहीं है। यानि वे सच का सामना करने यह उद्देश्य लेकर पहुंचे हों कि पैसों के लिए तो कुछ भी करेगा। यह बात तो स्टार चैनल वालों को भी कबूलनी होगी कि इस कार्यक्रम के प्रसारित होने के बाद चैनल की टीआरपी में काफी इजाफा हुआ है। क्योंकि इस कार्यक्रम में आने वाले प्रतिभागी से ऐसे सवाल किए जाते हैं जो देखने और सुनने में तो काफी अच्छा लगते है क्योंकि आज हर इंसान को दूसरों के बारे में ऐसी बातें जानने में काफी रूचि होती है जो दूसरों की निजी जिंदगी को प्रभावित करती है। लेकिन क्या किसी के जीवन से जुड़ी तमाम बातों को करोड़ों लोगों के सामने बताकर टीवी चैनलों द्वारा पैसे कमाना सही है? क्या अपने जीवनभर की सच्चाई और कमजोर रिश्तों को मात्र चंद रुपयों की खातिर कैमरे के सामने कहना सही है। सच कड़वा होता है सही है लेकिन इतना कड़वा सच भी किस काम का जिससे बसी बसाई गृह्स्थी,दोस्त-यार,और तमाम रिश्ते तलवार की नोक पर रख दिए जाएं?

Sunday, July 26, 2009

राज्य में अब डीजी नक्सल आपरेशन ?

राज्य में अब डीजी नक्सल आपरेशन ?

नक्सल समस्या से निपटने बन रही रणनीति

जेल और होमगार्ड को एक करने की कवायद

राज्य की नक्सल समस्या को ध्यान में रखते हुए अब जल्द ही डीजी नक्सल का पद सृजित किया जाएगा। इसके लिए प्रशासनिक स्तर पर कवायद शुरु हो गई है। बढ़ती नक्सल समस्या पर लगाम कसने और नक्सल मामले से जुड़ी पुलिसिंग की कार्यप्रणाली की कमान अलग करने के लिए इसे राज्य सरकार की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। ज्ञात हो कि मदनवाड़ा घटना के दो दिन बाद ही नक्सल आपरेशन की कमान एडीजी रामनिवास को दी गई थी। इसके पूर्व नक्सल आपरेशन की कमान आईजी स्तर के अधिकारी ही संभाला करते थे। सूत्रों के मुताबिक नक्सल मामलों पर सरकार गंभीरता से विचार कर रही है इसे देखते हुए कुछ दिनों पहले ही गृह विभाग ने एसपी नक्सल आपरेशन का पद सृजित किया है जिसमें एएसपी स्तर के अधिकारियों की पदस्थापना की गई है। पिछले कुछ सालों से लगातार बढ़ रही नक्सली घटनाओं और वर्तमान में मदनवाड़ा घटना के बाद विपक्षी पार्टी कांग्रेस द्वारा विधानसभा सत्र के दौरान सदन के भीतर और बाहर किए गए हंगामे के बाद से राज्य सरकार कुछ दबाव में है। मदनवाड़ा घटना के लिए कांग्रेसी नेताओं ने डीजीपी की भूमिका पर भी सवाल उठाए थे। विश्वस्त सूत्रों की मानें तो इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए राज्य के गृह विभाग ने इस विकराल समस्या से निपटने के लिए एक नया पद सृजित करने का सुझाव सरकार को दिया है,जिसे डीजी नक्सल आपरेशन नाम दिया जाएगा। इस पद का कार्यक्षेत्र भी व्यापक होगा। बताते हैं कि इस पद के लिए राज्य के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों के नामों की भी चर्चा है जिसमें पूर्व में डीजीपी पद की दौड़ में सबसे आगे रहे एसके पासवान का नाम प्रमुख है। सूत्रों के मुताबिक डीजी नक्सल के लिए राजीव माथुर और प्रवीर महेन्दु के नामों की भी चर्चा है । यदि डीजी नक्सल आपरेशन को सरकार की हरी झंडी मिल जाती है तो माना जा रहा है कि एसके पासवान ही डीजी नक्सल आपरेशन की कमान संभालेंगे। वर्तमान में वे अभी डीजी जेल हैं। सूत्रों का कहना है कि श्री पासवान को डीजी नक्सल बनाए जाने के बाद पूर्व की भांति ही जेल और होमगार्ड की कमान एक ही डीजी के पास होगा। ज्ञात हो कि वर्तमान में अनिल नवानी डीजी होमगार्ड हैं जो डीजी नक्सल पद लागू हो जाने के बाद जेल की कमान भी संभालेंगे। माना जा रहा है कि इस पद के सृजन से नक्सली क्षेत्र में काम कर रहे पुलिस के जवानों को एक बेहतर नेतृत्व प्राप्त होगा। इससे नक्सली क्षेत्र में काम कर रहे जवानों को होने वाली परेशानियों का निपटारा जल्द हो जाएगा साथ ही उन्हें उचित सुविधाएं सही समय पर उपलब्ध हो जाएगी, साथ ही सामान्य पुलिसिंग की कार्यप्रणाली से उन्हें अलग काम करने का मौका मिलेगा। जिससे निश्चित ही बेहतर परिणाम सामने आएंगे।

राज्य में अब डीजी नक्सल आपरेशन ?


राज्य में अब
डीजी नक्सल
आपरेशन ?

Tuesday, July 21, 2009

रमन के लड़के का हो गया सलेक्शन

रमन के लड़के

का हो गया

सलेक्शन

परीक्षा दिए बिना ही आया सेकेंड रैंक

Wednesday, July 15, 2009

...डूबने से बचेगा कैसे ?


...डूबने से बचेगा कैसे ?


राजधानी रायपुर में मात्र एक दिन की जोरदार बारिश ने ऐसा कहर बरपाया कि आम जनता से लेकर प्रशासन का हर जिम्मेदार अफसर आंहे भरता नजर आया। शहर की सबसे व्यस्त एवं प्रमुख सडकों का ये हाल था जैसे किसी गांव खेड़े की सड़कों का होता है। शहर की सभी सड़कें तालाबों में बदल गई थी। इन सड़कों से गुजरने वाले लोगों की वाहनें पानी भरने के कारण बंद हो गईं। रात की बारिश और सड़कों पर पानी,गाड़ी खराब हो जाए तो सिवाय भुगतने के और कुछ भी नहीं। शहर के भीतर और बाहर(आउटर) में गुजर बसर करने वाले चाहे वो कालोनी के मकान हों, चाहे किसी गली या मुहल्ले के,सभी बारिश की झमाझम से परेशान दिखे। किसी ने लाखों,करोड़ों खर्च कर,तो किसी ने हजारों, लाखों में अपना आशियाना बनाया है, पर सभी अपने घरों में पानी भरने से परेशान रहे। घर में आरामदायक बिस्तर,सोफा सहित तमाम सुविधाएं होने के बाद भी वे आंखों ही आंखों में रात गुजारने को मजबूर दिखे। दिन में भी कभी काम ना करने वाले लोग रात को आई इस आफत से बचने कुदाल,फावड़ा लेकर जद्दोजहद करते दिख गए। अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने वाले वे लोग अचानक बरसने वाली इस मुसीबत के लिए शासन,प्रशासन को कोसते भी नजर आए। वैसे अभी इस परेशानी को राजधानी के लिए शुरुआत मान सकते हैं। क्योंकि आने वाले आठ-दस सालों तक और यहां के लोग यदि इसी तरह शहर का बारह बजाते रहे तो कुछ कालोनियों, कुछ बस्तियों और कुछ सड़कों तक हाहाकार मचाने वाली पानी पूरे रायपुर शहर को ले डूबेगी। क्योंकि शहर के मुहल्लों और कालोनियों में कभी मुरम की दिखने वाली सड़कों को आज पूरी तरह से कांक्रीट में बदल दिया गया है। अब कांक्रीट,पानी सोंके तो सोंके कैसे? बारिश से गिरने वाला जल जमीन के भीतर जाए तो जाए कैसे? शासन और प्रशासन में बैठे कुछ लोग कमीशन के चक्कर में पूरे शहर की जमीन को पत्थर में बदल चुके हैं और लगातार शहर में तेजी से इस तरह के काम को अंजाम देने में लगे हैं। प्रशासन के जिम्मेदार चाहें तो इस पर रोक लगाकर आने वाले समय में होने वाली मुसीबत से लोगों को बचा सकते हैं। इसके लिए आम लोगों को भी सामने आना होगा। मकान और कालोनियों का निर्माण विकास के लिए सही है लेकिन प्रकृति के साथ खिलवाड़ करके ऐसा विकास हमें कहां ले जाएगा? समय के साथ लगातार बदल रही राजधानी की जनसंख्या पिछले कुछ वर्षों में सबसे ज्यादा बढ़ी है। जनसंख्या बढऩे के कारण शहर के क्षेत्रफल में भी काफी इजाफा हुआ है। शहर के आसपास कभी खेतों की शक्ल में दिखने वाली जमीनें अब कालोनियों और बस्तियों में तब्दील हो चुकी हैं। जाहिर है इसके लिए पेड़ों के साथ जमीनों को भी कुर्बान किया गया होगा। अब जब जमीन ही नहीं होगी,पेड़ ही नहीं होंगे तो मिट्टी का कटाव कहां से होगा,मिट्टी की जमीन ही नही होगी तो पानी धरती के भीतर जाएगी कैसे? तेजी से विकसित हो रहे शहर में बड़े-बड़े कांक्रीट के जंगल उग आए हैं मिट्टीनुमा धरती समाप्त होती जा रही है, जमीन का स्थान कांक्रीटों ने ले लिया है। आखिरकार ऐसे मे कब तक हम प्रकृति से सहायता की उम्मीद कर सकते हैं प्रकृति से खिलवाड़ करने वालों को तो प्रकृति ही सबक सिखाएगी ना... तो ऐसे में जनाब रायपुर डूबने से बचेगा कैसे?

doobane se bachega kaise ?

doobane se bachega kaise ?


Tuesday, July 14, 2009

बंद क्यों ?

बंद क्यों ?

किसी भी मामले पर विरोध प्रदर्शन करने के लिए विपक्षी पार्टी, छोटे दलों या व्यापारिक संगठनों द्वारा सस्ता,सुंदर और मीडिया में आसानी से आने के लिए एक रास्ता निकाल लिया गया है बंद का। बंद मतलब,काम बंद,दैनिक जरुरतों की चीजों से लेकर आम लोगों के जीवन चक्र से जुड़ी तमाम चीजें बंद। ठीक है विरोध प्रदर्शन अच्छी बात है लेकिन विरोध प्रदर्शन करने के लिए बंद का स्वरुप ऐसा होना चाहिए जिससे वह संस्था,पार्टी या व्यक्ति सबसे ज्यादा प्रभावित हो जिसका विरोध किया जा रहा है। गौर करें तो बंद हमेशा सरकार की गलत कार्यप्रणाली या किसी मामले पर सरकार की असफलता के विरोध में किया जाता है। लेकिन बंद के दौरान सिर्फ सरकारी दफ्तरों को छोड़ सब कुछ बंद रहता है। यहां पर सोचने और देखने वाली बात यह है कि जब सरकार के विरोध में बंद करवाया जाता है तो आम लोगों को इससे सबसे ज्यादा परेशानी झेलनी पड़ती है। बल्कि होना यह चाहिए कि बंद करवाने वाली पार्टियों या संस्थाओं को नेताओं और सरकार से जुड़े हुए लोगों को परेशान करना चाहिए,सरकारी दफ्तरों में ताला जडऩा चाहिए। सत्ताधारी पार्टी के नेताओं को अपने घरों से निकलने नहीं देना चाहिए। हालिया घटित घटना के विरोध में बंद किया भी गया तो सरकार के विरोध में। बंद के दौरान छग सरकार को भी जमकर कोसा गया लेकिन जरुरत है जिन्होंने(नक्सलियों ने) इस घटना को अंजाम दिया उसके विरोध में आवाज बुलंद करने की। उनके बढ़ते कदमों को रोकने के लिए सामूहिक प्रयास करने की। सिर्फ आम आदमी के पेट पर लात मारकर बंद को किस तरह से सफल बनाया जा सकता है? बंद की सफलता असफलता पर ध्यान दें तो बंद से ना तो व्यापारी वर्ग को नुकसान होता है, ना तो नेताओं को नुकसान होता और ना ही हाई प्रोफाइल लोगों को नुकसान होता है, बंद से नुकसान होता है तो केवल गरीबों और निम्न मध्यमवर्गीय परिवारों को,जो रोज काम करने के एवज खाना खा सकते हैं। अब बंद करवाकर इसे सफल बताने वाले लोग क्या गरीबों की पेट पर लात मारकर इसे सफल बता सकते हैं। बंद करवाने से किसी को क्या मिल गया होगा? यदि बंद को सार्थक करना है तो आने वाले समय में आम लोगों के हितों की रक्षा के दावे करने वाले नेताओं को बंद की परिभाषा बदलनी पड़ेगी।

बंद क्यों ?


Monday, July 13, 2009

aakhir kab ?

aakhir kab ?

कब तक यूं ही नक्सलियों की गोलियों का निशाना बनते रहेंगे जवान



आखिर कब ?

कब तक यूं ही नक्सलियों की गोलियों का निशाना बनते रहेंगे जवान

जबानी जंग जीतने में माहिर नेता और अधिकारियों को यह बात अच्छी तरह से समझ लेनी चाहिए कि यदि नक्सलियों के तेजी से बढ़ते कदमों को रोकने प्रदेश सरकार द्वारा गंभीरता नहीं दिखाई गई तो पूरे प्रदेश में कश्मीर जैसे हालात पैदा होते देर नहीं लगेगी। कश्मीर में भले ही आतंकियों का कब्जा हो लेकिन छत्तीसगढ़ में पांव जमा चुके नक्सली अब किसी भी मामले में आंतकियों से कम नहीं है। इनकी कार्यशैली भी पूरी तरह आतंकवादियों की तरह हो गई है। अब नक्सलियों का उद्देश्य सिर्फ आतंक फैलाना और लोगों की हत्या करना ही रह गया है।

एक के बाद एक बड़ी घटनाओं को अंजाम दे रहे नक्सलियों से लडऩे के लिए सरकार के पास ना को रणनीति है ना ही उनके पुलिस अधिकारियों के पास कोई योजना। राज्य की सबसे बड़ी समस्या बन चुके हैं नक्सली। लेकिन नक्सलियों की गतिविधियों पर रोक लगाने अब तक किए जा रहे सभी सरकारी और प्रशासनिक दावे सिर्फ कहने सुनने को रह गए हैं। अब तक ऐसा कोई भी कदम सरकार और उनकी पुलिस के द्वारा नहीं उठाए गए हैं जिससे यह पता चल सके कि नक्सली मामले में सरकार कितनी गंभीर है। नक्सली लगातार राज्य के भीतर अपनी गतिविधियां बढ़ाने में लगे हैं लेकिन पुलिस का खुफिया तंत्र बत्ती बुझाए बैठा है। इंटेलिजेंस कहने और सुनने में तो काफी अच्छा लगता है लेकिन उनकी इंटेलिजेंसी कहां है उसका पता नहीं? प्रदेश के लिए नासूर बन चुके नक्सलियों का इलाज कैसे करना शायद डाक्टर साहब को भी समझ नहीं आ रहा है। समय लगातार बीतता जा रहा है लेकिन इस समस्या ने निबटने के लिए आज तक सरकार और पुलिस विभाग के अफसरों ने कुछ भी नहीं किया है,किया है तो सिर्फ नक्सलियों ने। राज्य में जब भी नक्सली मामलों का जिक्र किया जाता है तो एक ही बात सामने आती है कि केन्द्र से सहयोग नहीं मिल रहा है? सूचना तंत्र (खुफिया) फेल होने की बात कही जाती है तो पुलिस के बड़े अफसर बड़ी सफाई से टाल जाते हैं कि आप लोगों को बता देंगे तो वो खुफिया कहां रह जाएगा। जब लालगढ़ में घुसकर तबाही मचाने वाले नक्सलियों को खदेड़ा जा सकता है तो छत्तीसगढ़ में भी इस तरह की किसी योजना पर काम क्यों नहीं किया जा सकता। जबानी जंग जीतने में माहिर नेता और अधिकारियों को यह बात अच्छी तरह से समझ लेनी चाहिए कि यदि नक्सलियों के तेजी से बढ़ते कदमों को रोकने प्रदेश सरकार द्वारा गंभीरता नहीं दिखाई गई तो पूरे प्रदेश में कश्मीर जैसे हालात पैदा होते देर नहीं लगेगी। कश्मीर में भले ही आतंकियों का कब्जा हो लेकिन छत्तीसगढ़ में पांव जमा चुके नक्सली अब किसी भी मामले में आंतकियों से कम नहीं है। इनकी कार्यशैली भी पूरी तरह आतंकवादियों की तरह हो गई है। अब नक्सलियों का उद्देश्य सिर्फ आतंक फैलाना और लोगों की हत्या करना ही रह गया है। बारुद के ढेर पर बैठे राज्य के पुलिस प्रशासन प्रमुख की गतिविधयां भी समझ से परे है। हर नक्सली वारदात के बाद सीएम,एचएम,डीजीपी सहित तमाम सत्ताधारी नेताओं के यह बयान आते हैं कि शहादत व्यर्थ नहीं जाएगी। लेकिन शहीदों की शहादत कब सार्थक होगी, वह समय कब आएगा, शायद यह प्रदेश के नेता और अफसर किसी के भी दिमाग के करोड़वें हिस्से को भी नहीं पता होगा।

Friday, July 3, 2009

एक व्यक्ति एक पेड़ लगा ले तो भला हो जाएगा देश का...


एक व्यक्ति एक पेड़ लगा ले

तो भला हो जाएगा देश का...

कटते जंगल और गिरते

वातावरण का स्तर सुधर सकता है

देश में जिस गति से पेड़ कट रहे हैं जंगल तबाह हो रहे हैं उसे देखते हुए ऐसा लगता है कि आने वाले दस सालों में आंखे पेड़ देखने तक को तरस जाएगी। इसी गति से पेड़ों की बलि चढ़ाई जाती रही तो निश्चित ही प्रकृति इसका भयंकर परिणाम मनुष्यों को देगी। पेड़ पौधों का जीवन मानव जीवन के लिए सबसे महत्वपूर्ण है लेकिन आने वाले कुछ वर्षों में जिस तरह विकास के नाम पर हरियाली की बलि चढ़ाई जाती रही है यह काफी चिंतनीय विषय है। इस पर समाज के चिंतकों को राजनेताओं को जिम्मेदार अधिकारियों को गहन चिंतन मनन करना चाहिए कि इस पर किस तरह से रोक लगाई जाए। क्यों कि यदि पेड़ (जंगल) नहीं होंगे तो बारिश नहीं होगी यदि बारिश हुई भी तो जहां पेड़ नहीं होंगे वहां पर बारिश का पानी धरती के नीचे जाएगा वहां तो मिट्टी का कटाव ही नहीं होगा। इससे जलस्तर लगातार नीचे चला जाएगा और पानी की कमी से जलसंकट जैसी गंभीर स्थिति पैदा हो जाएगी। जल संकट होने से दैनिक जीवन पर इसका काफी बुरा असर पड़ेगा। इससे हर व्यक्ति प्रभावित होगा चाहे वो कोई भी हो। क्योंकि पानी हर किसी की जरुरत है। पेड़ों की कम होती संख्या आने वाले समय में लोगों के जीवन में काफी भयावह समस्या लेकर आएगी। इसमें कोई दो राय नहीं है लेकिन इस विकराल समस्या से बचने के लिए जब तक व्यक्ति खुद से प्रयास नहीं करेगा तब तक उसे कोई नहीं बचा सकता। यदि प्रत्येक व्यक्ति सिर्फ एक पेड़ लगाकर उसे सहेजना चालू कर दे तो आने वाले एक दशक में कुछ हद तक जलस्तर को गिरने से भी रोका जा सकता है साथ ही प्रदूषण को रोका जा सकता है स्वच्छ हवा में श्वांस ले सकते हैं इसके अलावा और भी कई बाते हैं जिससे हमें नुकसान कुछ नहीं होगा बल्कि लाभ ही लाभ होगा। तो हर कोई एक पेड़ अवश्य लगाए और पृथ्वी की रक्षा में सहभागी बन अपने स्वयं की रक्षा करें।

Sunday, June 28, 2009

समलैंगिक रिश्तों को मान्यता?


समलैंगिक रिश्तों को मान्यता?
शक के घेरे में रहेंगे दो जिगरी दोस्त
भारत जैसे सुसंस्कृत देश में रिश्तों की अहमियत को काफी जोर दिया जाता है यहां पर समलैंगिकता जैसे विषय पर विचार करना ही समझ से परे है। भारत और विदेशों की संस्कृति में जमीन आसमान का अंतर है। टीवी में पनप रही विदेशी संस्कृति का देश के भीतर लगातार विरोध होता रहा है लेकिन घर के अंदर प्रवेश कर चुके टीवी संस्कृति पर लगाम लगाने में अब तक ना सिर्फ सरकार बल्कि परिवार का वह व्यक्ति स्वयं असहाय है जो खुद परिवार का मुखिया है। अब ऐसे में एक और विदेशी संस्कृति को भारत में लादने की तैयारी सरकार में बैठे कुछ जिम्मेदार लोगों द्वारा की जा रही है। सरकार में महत्वपूर्ण पदों पर बैठे इन नुमाइंदों की सुनें तो वे इस आधार पर इसकी मान्यता के लिए विचार कर रहे हैं कि देश के कई अन्य देशों में इसे मान्यता मिल गई है लेकिन क्या वे जिम्मेदार भारतीय संस्कृति से परिचित नहीं है और क्या वे यह नहीं जानते कि इस देश में ऐसी किसी चीज के लिए कोई जगह नहीं है। बावजूद इसके सरकार में बैठे कुछ लोग कुछ मुठ्ठी भर लोगों की मांग पर इतना बड़ा निर्णय लेने पर विचार कर रहे हैं। भारत देश में सेक्स लगातार विकृत रुप ले रही है समलैंगिकों को बढ़ावा देने से समाज में इसका और भी ज्यादा विकृत रुप में सामने आएगा। इस मान्यता से आपसी संबंधों में भी खटास आने की भरपूर संभावना है। अभी तक एक महिला और पुरुष के बीच नजदीकियों को गलत निगाह से देखा जाता रहा है लेकिन इस तरह के रिश्तों को मान्यता मिल जाने के बाद दो पुरुषों को आपस में गंभीरता और आपसी बात करते देख लोगों के दिमाग में बेवजह ही शक जैसी खतरनाक चीज उतपन्न होगी। यही हाल दो महिलाओं के बारे में भी होगा। इससे सबसे ज्यादा तकलीफ ऐसे दोस्तों को होगी जो एक-दूसरे से काफी क्लोज होते हैं या जिसे जिगरी दोस्त की संज्ञा दी जाती है। यह प्रकृति का नियम है कि जब तक समाज में किसी प्रकार का नियम नहीं बनता तब तक उस नियम का उल्लंघन नहीं होता लेकिन नियम के बनते ही लोगों के दिमाग में उस नियम से खिलवाड़ करने की तरह-तरह की योजनाएं बनने लग जाती हैं यही इस कानून के साथ भी होगा। जो आने वाले समय में समाज में विकृतियां और विसंगतियां तो पैदा करेंगी ही साथ ही इससे हिंसा जैसी चीजों को भी बढ़ावा मिलेगा।

Friday, June 12, 2009

मया से आई छालीवुड में जान

मया से आई

छालीवुड में जान

सतीश जैन की फिल्म से बढ़ा

राज्य के कलाकारों का हौसला

एक लंबे अरसे से छत्तीसगढ़ी फिल्म की आस लगाए बैठे कलाकारों के लिए हालिया रिलीज फिल्म मया किसी संजीवनी बूटी से कम नहीं है। इस फिल्म के प्रदर्शन से राज्य के कलाकारों का हौसला काफी बढ़ा है। मधुर संगीत और झूमने को मजबूर कर देने वाले गानों के बीच सतीश जैन ने एक साफ सुथरी पारिवारिक फिल्म दर्शकों के लिए पेश की है। छत्तीसगढ़ की पहली सुपर-डुपर हिट फिल्म मोर छंईहां भुईयां के बाद छत्तीसगढ़ी फिल्मों की एक लंबी श्रृंखला चल पड़ी थी जिसमें कई सफल फिल्में भी फ्लोर पर आईं लेकिन पिछले कुछ समय से छत्तीसगढ़ी फिल्मों का अकाल सा हो गया था। सतीश जैन के अलवा प्रेम चंद्राकर ,सुंदरानी ब्रदर्स के बैनर तले भी कुछ सफल फिल्मों का निर्माण हो चुका है लेकिन इन सबके बावजूद भी राज्य में अभी तक फिल्मसिटी जैसी किसी चीज का आगाज नहीं हुआ है जिसमें राज्य के कलाकारों और निर्माता निर्देशकों का कुछ भला हो सके। कारण है सरकार द्वारा लगातार की जा रही इसकी उपेक्षा। लेकिन राज्य में कुछ ऐसे होनहार और जीवंत लोग भी हैं जो अपने दम पर छत्तीसगढ़ी फिल्मों के माध्यम से राज्य की भाषा को बढ़ावा देने में लगे हैं साथ ही यहां के होनहार और प्रतिभाशाली कलाकारों के कैरियर के लिए एक नया मंच बनाने मेहनत कर रहे हैं। ऐसा नहीं है कि राज्य में छत्तीसगढ़ी फिल्मों का निर्माण नहीं हो रहा था पिछले 8 सालों में कई हिट वीडियों फिल्मों के अलावा कई हिट गानों के एलबम बाजार तक पहुंच चुके हैं लेकिन सिर्फ एलबमों और वीडियो फिल्मों के माध्यम से इसे बढ़ावा नहीं दिया जा सकता। राज्य में जब तक बड़ी बजट की बड़े परदे की फिल्मों की निरंतरता नहीं होगी तब तक इसे संघर्ष करना पड़ेगा। सतीश जैन ने मया प्रदर्शित करके यह तो स्पष्ट कर दिया है कि वो पीछे हटने वालों में से नहीं हैं। साल में इस तरह की एक-दो फिल्में आती रही तो निश्चित ही इसे वो मुकाम हासिल हो जाएगा जो साउथ और अन्य रीजनल फिल्मों को है। सतीश जैन की मया को देखकर यह जरुर कह सकते हैं इससे छालीवुड में नई जान आ गई है।

Thursday, June 4, 2009

विश्व पर्यावरण दिवस

विश्व पर्यावरण दिवस 5 जून

Wednesday, June 3, 2009

भारत की पहली महिला लोकसभा अध्यक्ष बनी मीरा कुमार


पहली महिला लोकसभा अध्यक्ष बनी मीरा कुमार


राजनयिक से राजनेता बनने वाली कांग्रेस के दलित चेहरे मीरा कुमार ने 1980 के दशक के मध्य में चुनावी राजनीति में प्रवेश करने के बाद दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की प्रथम महिला लोकसभा अध्यक्ष पद के लिए चुने जाने तक एक लंबा सफर तय किया है. मीरा कुमार कांग्रेस के दिवंगत नेता जगजीवन राम की पुत्री हैं.लोकसभा के पहले अध्यक्ष थे जी. वी. मावलंकर जो 15 मई, 1952 से 27 फरवरी, 1956 तक इस पद पर बने रहें.
क्रम लोकसभा कार्यकाल पार्टी सत्तारुढ़ पार्टी
1. जी. वी. मावलंकर 15 मई, 1952 से 27 फरवरी, 1956 कांग्रेस कांग्रेस
2. एम. ए. अय्यंगर 8 मार्च, 1956 से 16 अप्रैल, 1962 कांग्रेस कांग्रेस
3. सरदार हुकूम सिंह 17 अप्रैल, 1962 से 16 मार्च, 1967 कांग्रेस कांग्रेस
4. एन.संजीव रेड्डी 17 मार्च, 1967 से 19 जुलाई, 1969 कांग्रेस कांग्रेस
5. जी.एस. ढि़ल्?लन 8 अगस्?त, 1969 से 1 दिसंबर, 1975 कांग्रेस कांग्रेस
6. बलि राम भगत 15 जनवरी, 1976 से 25 मार्च 1977 कांग्रेस कांग्रेस
7. एन.संजीव रेड्डी 26 मार्च, 1977 से 13 जुलाई, 1977 जनता पार्टी जनता पार्टी
8. के.एस. हेगड़े 21 जुलाई, 1977 से 21 जनवरी, 1980 जनता पार्टी जनता पार्टी
9. बलराम जाखड़ 22 जनवरी, 1980 से 18 दिसंबर 1989 कांग्रेस कांग्रेस
10. रवि रे 19 दिसंबर 1989 से 9 जुलाई 1991जनता दल एनएफ
11. शिवराज पाटिल 10 जुलाई, 1991 से 22 मई 1996 कांग्रेस कांग्रेस
12. पी. ए. संगमा 25 मई, 1996 से 23 मार्च, 1998 कांग्रेस यूएफ
13. जी.एम.सी. बालयोगी 24 मार्च, 1998 से 3 मार्च, 2002 टीडीपी एनडीए
14. मनोहर जोशी 10 मई, 2002 से 2 जून, 2004 शिव सेना एनडीए
15. सोमनाथ चटर्जी 4 जून, 2004 से 30 मई, 2009 सीपीआईएम यूपीए
16. मीरा कुमार 3 जून, 2009 से कांग्रेस यूपीए ---------

Sunday, May 31, 2009

सिगरेट पीने से दिमाग पर गहरा असर

विश्व तंबाकू निषेध दिवस 31 मई

सिगरेट पीने से
दिमाग पर
गहरा असर

सिगरेट दिमाग के रसायनों पर असर डाल बड़े बदलाव के लिए ज़िम्मेदार होती है
एक अध्ययन में पाया गया है कि सिगरेट पीने से मस्तिष्क में उसी तरह के परिवर्तन होते हैं जैसा कि नशीली दवाएँ लेने पर.अमरीकी शोधकर्ताओं ने कुछ मृत लोगों के दिमागों का तुलनात्मक अध्ययन किया. इसमें तीन तरह के लोगों के दिमाग़ को लिया गया था.इसमें धूम्रपान करने वाले, न करने वाले और पहले कभी धूम्रपान के आदी रह चुके लोगों के मस्तिष्क शामिल थे. 'जनरल ऑफ़ न्यूरोसाइंस' में छपी इनके अध्ययन में कहा गया है कि धूम्रपान करने से मस्तिष्क में लंबे समय तक बने रहने वाले बदलाव होते हैं.एक ब्रिटिश विशेषज्ञ ने कहा कि इन परिवर्तनों को देखकर यह भी पता लगाया जा सकता है कि धूम्रपान करने वाले के लिए इसे रोकना कठिन क्यों था और उसने फिर धूम्रपान करना क्यों शुरू किया.
निकोटिन
'नेशनल इंस्टीट्यूट ऑन ड्रग एब्यूज़' के शोधकर्ताओं ने मानव मस्तिष्क के उन ऊतकों के नमूनों को देखा जो नशे की प्रवृत्ति रोकने में प्रभावी भूमिका निभाते हैं.ऐसे आठ लोगों के नमूने लिए गए थे जिन्होंने मरते दम तक नशा किया. आठ ऐसे लोगों के नमूने लिए गए थे जिन्होंने 25 साल तक नशा किया था और आठ लोगों के नमूने ऐसे थे जिन्होंने कभी भी नशा नहीं किया था.इनमें से किसी की मौत नशा करने की वजह से नहीं हुई थी.शोधकर्ताओं का कहना था कि धूम्रपान करने वालों और न करने वालों के मस्तिष्क में भी निकोटिन के प्रभाव से बड़ा बदलाव हो सकता है.लंदन के किंग्स कॉलेज़ में 'नेशनल एडिक्शन्स सेंटर' के डॉ जॉन स्टैप्लेटन का कहना है,"यदि लंबे समय तक निकोटिन दिन में कई बार शरीर के अंदर जाए तो यह बहुत ही आश्चर्य की बात होगी कि दिमाग में बड़े परिवर्तन न दिखाई पड़ें."उन्होंने कहा,"लेकिन अभी यह पता करना बाक़ी है कि क्या ये परिवर्तन किसी भी स्तर पर धूम्रपान की आदत पड़ने या एक बार आदत छूटने के बाद भी फ़िर से धूम्रपान के लिए ज़िम्मेदार हैं."
शोधकर्ताओं के अनुसार ये बदलाव धूम्रपान छोड़ने के लंबे समय के बाद भी दिखाई पड़ सकते हैं.
'धूम्रपान पर रोक से दिल को ख़तरा कम'
धूम्रपान से कई तरह की बीमारियाँ होती हैं
एक शोध से पता चला है कि इटली में सार्वजनिक जगहों पर धूम्रपान पर प्रतिबंध लगने के बाद से दिल का दौरा पड़ने वाले लोगों की संख्या में कमी आई है.इटली के पाइडमॉंट इलाक़े में ये अध्ययन किया गया है. विशलेषण के मुताबिक प्रतिबंध लगने के बाद पहले पाँच महीनों में, दिल का दौरा पड़ने के चलते अस्पताल में भर्ती होने वालों की संख्या में पिछले साल के मुकाबले 11 प्रतिशत की कमी आई है.
अध्ययन करने वाली टीम ने यूरोप की पत्रिका हार्ट जर्नल में लिखा है कि ऐसा 'पैसिव स्मोकिंग' में कमी आने से हुआ है. पैसिव स्मोकिंग से प्रभावित होने वाले वे लोग होते हैं जो धूम्रपान नहीं करते पर आस-पास हो रहे धूम्रपान के चलते धुँए का शिकार हो जाते हैं.इटली की सरकार ने 2005 में ऐसी सभी सार्वजनिक जगहों पर धूम्रपान पर रोक लगा दी है जो अंदर हैं जैसे कैफ़े, बार और रेस्तरां.
आयरलैंड, नॉर्वे, दक्षिण अफ़्रीका और स्वीडन में भी ऐसा ही प्रतिबंध लागू है.
'ख़तरा कम'
साँस की बीमारी और फ़ेफ़डे के कैंसर समेत कई ऐसी बीमारियाँ हैं जिनका संबंध धूम्रपान से है.
इटली में टयूरिन विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने पाइटमॉंट इलाक़े में दिल का दौरा पड़ने के बाद भर्ती होने वाली मरीज़ों की संख्या का अध्ययन किया है.साथ ही उन लोगों का भी जिनकी भर्ती होने के बाद मौत हो गई.ये अध्ययन धूम्रपान पर प्रतिबंध लगने के बाद के समय-फऱवरी 2005 से जून 2005 में किया गया. शोध 60 वर्ष से कम उम्र वाले लोगों पर हुआ.शोधकर्ताओं ने पाया कि प्रतिबंध लगने का बाद दिल के दौरे के 832 मामले सामने आए जबकि पिछले वर्ष इस दौरान 922 मामले हुए थे. यानी 11 फ़ीसदी की गिरावट.उधर ब्रिटिश हार्ट फ़ाउंडेशन के रुआरी ओ कॉनर ने कहा कि इस अध्ययन पर हम सतर्कता से प्रतिक्रिया दे रहे हैं लेकिन ये ज़रूर लग रहा है कि धूम्रपान से जुड़ी ऐसी नीतियाँ का दिल के दौरे के मामलों पर असर हो सकता है.लेकिन हॉर्ट जनरल पत्रिका में छपे एक अन्य लेख में धूम्रपान पर लगी रोक को लेकर आलोचना भी की गई है.
अप्रत्यक्ष धूम्रपान से आँख को ख़तरा
ब्रिटेन में उम्र से प्रभावित होने वाली आँख की बीमारियों के क़रीब पाँच लाख मरीज़ हैं ब्रिटेन में एक शोध में कहा गया है कि धूम्रपान करने वालों के धुएँ का शिकार होने वाले लोग भी अंधेपन की एक सामान्य कारण का शिकार हो सकते हैं यानी अप्रत्यक्ष धूम्रपान नज़र के लिए बेहद ख़तरनाक साबित हो सकता है.कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के एक दल ने उम्र बढ़ने के साथ होने वाली नज़र समस्या का संबंध धूम्रपान के असर के साथ जोड़कर देखने के लिए अध्ययन किया जो नेत्र विज्ञान की ब्रितानी पत्रिका में प्रकाशित हुआ है.शोध से नतीजा निकला है कि धूम्रपान करने वाले के साथ पाँच साल तक रहने से अंधेपन का ख़तरा बढ़ जाता है और लगातार धूम्रपान करने से यह ख़तरा तीन गुना बढ़ जाता है.
वैज्ञानिकों का कहना है कि यह अध्ययन इस बात को और पक्का करता है कि सार्वजनिक स्थलों और दफ़्तरों आदि में धूम्रपान पर पूर्ण रूप से रोक लगाई जाए.पहले ही शोधों से पता चलता है कि धूम्रपान नज़र की समस्याओं का ख़तरा बढ़ाता है लेकिन इस ताज़ा अध्ययन ने यह भी साफ़तौर पर साबित कर दिया है कि अप्रत्यक्ष धूम्रपान भी उतना ही ख़तरा पैदा कर सकता है.उम्र के साथ होने वाली नज़र की समस्या आमतौर पर 50 साल की उम्र पार करने के बाद होती है. धूम्रपान रैटिना के केंद्रीय हिस्से पर असर डालता है जो पढ़ने, कार चलाने वगैरा में बहुत ज़रूरी होती है.हालाँकि ऐसी बात नहीं है कि इससे हमेशा ही अंधेपन का ख़तरा हो. ब्रिटेन में उम्र के साथ नज़र की समस्या से क़रीब पाँच लाख लोग प्रभावित हैं.

Saturday, May 30, 2009

सिगरेट पर सचित्र चेतावनी अनिवार्य


सिगरेट पर सचित्र

चेतावनी अनिवार्य

तंबाकू उत्पादों पर सचित्र चेतावनी देने का फ़ैसला काफ़ी समय से टल रहा था
विश्व तंबाकू निषेध दिवस यानी 31 मई से भारत में सभी तंबाकू उत्पादों पर सचित्र चेतावनी देना अनिवार्य हो गया है.भारत सरकार ने आदेश दिया है कि इस दिन से तंबाकू के किसी भी उत्पाद की बिक्री तभी होगी जब उस पर कम से कम 40 फ़ीसदी हिस्से में तस्वीर से चेतावनी दी गई हो.
ये इस चेतावनी के रूप में होगा कि तंबाकू उत्पादों का सेवन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है.
लोग तंबाकू उत्पादों का सेवन कम करें, इस उद्देश्य से भारत सरकार ने ये क़दम उठाया है.
हालांकि सरकार ने ये फ़ैसला काफ़ी पहले किया था लेकिन तंबाकू उत्पादकों के कड़े विरोध के कारण ये टल रहा था.सरकार ने पिछले साल अगस्त में सिगरेट, बीड़ी और गुटका निर्माताओं को पैकेट पर 'तंबाकू के सेवन से मौत' की चेतावनी छापने का निर्देश दिया था, पर इसे लागू नहीं किया जा सका था. क़ानूनी दांवपेचों के बाद इसकी सीमा 31 मई निर्धारित कर दी गई थी.उल्लेखनीय है कि भारत में तंबाकू का लोग बड़ी संख्या में सेवन करते हैं.दिल्ली और कई अन्य शहरों में सार्वजनिक स्थानों पर सिगरेट, बीड़ी पीने पर पाबंदी है लेकिन शायद ही कभी किसी को इससे लिए सज़ा मिली हो.

Friday, May 29, 2009

कन्वर्जेस के युग में पहुंची हिंदी पत्रकारिता


कन्वर्जेस के युग
में पहुंची
हिंदी पत्रकारिता

तीस मई का दिन हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में उल्लेखनीय है क्योंकि इसी दिन वर्ष 1826 में कोलकाता से पहला हिंदी पत्र उदंत मार्तण्ड शुरू हुआ। हालांकि इससे बहुत पहले वर्ष 1780 में यहीं से जेम्स आगस्टस हिक्की ने बंगाल गजट या कलकत्ता जनरल एडवरटाइजर शुरू कर अंग्रेजी पत्रकारिता की शुरुआत कर दी थी। इन 183 वर्षों में हिंदी पत्रकारिता में बड़े आमूल चूल परिवर्तन आए।
अंग्रेजी पत्रकारिता के बरक्स इसके कद और ताकत में व्यापक बढ़ोतरी हुई। कागज से शुरू हुई पत्रकारिता अब कन्वर्जेंस के युग में पहुंच गई है। कन्वर्जेंस के कारण आज खबर मोबाइल, रेडियो, इंटरनेट और टीवी पर कई रूपों में उपलब्ध है। सूचना प्रौद्यागिकी के इस युग में हिंदी पत्र डिजिटल रूपों में उपलब्ध है। वरिष्ठ पत्रकार और जनसंचार विशेषज्ञ प्रोफेसर कमल दीक्षित ने बताया कि पंडित युगल किशोर शुक्ल द्वारा शुरू किए गए उदंत मार्तण्ड के परिप्रेक्ष्य में बात करें तो उस समय पत्रकारिता का उद्देश्य समाज सुधार, समाज में स्त्रियों की स्थिति में सुधार और रूढि़यों का उन्मूलन था। उन्होंने बताया उस समय पत्रकारिता के सामाजिक सरोकार शीर्ष पर थे और व्यावसायिक प्रतिबद्धताएं इनमें बाधक नहीं थीं। युगल किशोर शुक्ल का उदंत मार्तण्ड 79 अंक निकलने पर चार दिसंबर 1827 को बंद हो गया। हालांकि उसके बाद हिंदी में बहुत सारे पत्र निकले। राजा राम मोहनराय ने हिंदी सहित तीन भाषाओं में 1829 में बंगदूत नामक पत्र शुरू किया। सूचना प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ और माइक्रोसाफ्ट मोस्ट वैल्यूबल पर्सन से सम्मानित बालेन्दु दाधीच के अनुसार जो मौजूदा प्रवृत्ति है, उसके अनुसार हिंदी के अखबारों पर प्रासंगिक और तेज बने रहने का भारी दबाव है। ई पेपर उसी दिशा में एक अग्रगामी कदम है। यह अवसर भौगोलिक सीमाओं को पार करने और व्यावसायिक अवसरों के दोहन को लेकर है। प्रोफेसर दीक्षित के अनुसार हिंदी पत्रकारिता में मानवोचित मूल्यों को स्थान देने में पूर्व की अपेक्षा कमी आई है। 1950 से 55 के दशक तक जिस हिंदी पत्रकारिता को बाजार की सफलता के मानकों पर खरा नहीं माना जाता था, उसके प्रति विचारधारा परिवर्तित हुई है। उन्होंने बताया कि अस्सी के दशक के बाद से स्थिति यह हो गई कि अंग्रेजी से लेकर बड़ा से बड़ा भाषाई समूह हिंदी में अखबार शुरू करने में रुचि दिखाने लगा। हालांकि विकास के बड़े अवसर हैं, लेकिन हिंदी पत्रकारिता के समक्ष चुनौतियां भी कम नहीं हैं। दाधीच कहते हैं कि हिंदी पत्रकारिता का इंटरनेट के क्षेत्र में जाने का मकसद अपने प्रभाव क्षेत्र में बढ़ोतरी करना होता है। मीडिया हाउस पर अब खबरों के व्यापार का एकाधिकार नहीं रह गया है। गूगल और याहू जैसी कई कंपनियां भी खबरों के प्रसार के प्रमुख स्रोत के रूप में काम कर रही हैं। उन्होंने बताया कि प्रिंट मीडिया प्रसार संख्या पर आधारित है, ई पेपर भी अब इसमें शामिल किया जाने लगा है। बालेंदु दाधीच ने बताया कि हिंदी सहित अन्य भाषाओं के वेब पत्रों में बिजनेस माडल का अभाव है। विज्ञापनों की संख्या में बढ़ोतरी नहीं हो रही है, लेकिन जिस प्रकार विदेशों में प्रिंट से वेब में पत्रकारिता की प्रस्तुति बढ़ी है। वह दिन दूर नहीं जब भारत में भी यही रूप स्वीकार होगा। प्रोफेसर दीक्षित ने बताया कि हिंदी पत्रकारिता ने एक समय अपना भाषाई समाज रचने में बहुत बड़ा योगदान दिया। दिनमान और धर्मयुग जैसे पत्रों ने हिंदी पाठक को उन विषयों पर सोचने और समझने का अवसर दिया, जिन पर केवल अंग्रेजी का एकाधिकार माना जाता था। अंग्रेजी में श्रेष्ठत्व के नाम पर दावा करने की कोई चीज नहीं है। हिंदी उस बराबरी पर पहुंच गई है। हालांकि परंपरा में अंग्रेजी पत्रकारिता हिंदी से आगे है लेकिन हिंदी पत्रकारिता ने भी लंबी दूरी तय की है।

(आभार एजेंसी)

Wednesday, May 27, 2009

60 साल में 2000 से अधिक परमाणु विस्फोट




60 साल में 2000 से

अधिक परमाणु विस्फोट

उत्तर कोरिया ने अपना दूसरा

परमाणु परीक्षण विस्फोट किया।
दुनिया के देशों ने पिछले 61 वर्षों में परीक्षणों के लिए 2,000 से अधिक परमाणु विस्फोट किए हैं। 1945 में पहला अमेरिका द्वारा जापान पर पहला परमाणु बम गिराए जाने से लेकर 2006 तक कुल आठ देशों ने 2000 से अधिक परमाणु विस्फोट किए हैं जिनमें सबसे ज्यादा संख्या अमेरिका द्वारा किए गए परमाणु विस्फोटों की है। उसने कुल 1,032 परमाणु विस्फोट किए हैं। उसके बाद रूस (715) और फ्रांस (210 विस्फोट) का नंबर है। भारत ने अब तक कुल तीन बार परीक्षण के लिए परमाणु विस्फोट किए हैं।
परमाणु शक्ति सम्पन्न देश और उनके द्वारा किए गए परमाणु विस्फोटों की संख्या इस प्रकार है।
अमेरिका- 1,032
रूस ( पूर्व सोवियत संघ) – 715
फ्रांस- 210
चीन- 45
ब्रिटेन- 45
भारत -3
पाकिस्तान -2
उत्तर कोरिया- 2

Tuesday, May 26, 2009

आखिर ये चक्रवात क्या बला हैं

आखिर ये चक्रवात

क्या बला हैं

पिछले साल मई महीने में म्यांमार में समुद्री चक्रवात नरगिस ने एक लाख से भी ज्यादा लोगों की जान ली थी। ऐसे में ये समझना जरूरी है कि ये समुद्री चक्रवात होते क्या हैं?
समुद्री तूफान जिन्हें चक्रवात भी कहते हैं, कई तरह के होते हैं। इनकी ताकत और बनावट के मुताबिक इन्हें नाम दिया जाता है। इन तूफानों को खासकर हरिकेन या साइक्लोन कहा जाता है। हरिकेन ज्यादातर क्लॉकवाइज घूमते हैं और खासकर Northern hemisphere में बनते हैं। इसलिए इनको ट्रॉपिकल साइक्लोन्स यानि चक्रवात भी कहा जाता है। इन चक्रवातों को इस तरह से बांटा जा सकता है।
1. ट्रॉपिकल डिप्रेशन - इनके बनने में बादलों की मुख्य भूमिका होती है। ऐसे तूफानों की गति 38 मील प्रति घंटा या उससे कम होती है।
2. ट्रॉपिकल स्टॉर्म (तूफान) - ये तूफान काफी तेजी के साथ आगे बढ़ते हैं। इनकी ताकत का अंदाजा सिर्फ इसी बात से लगाया जा सकता है कि इनकी गति 39 से 73 मील प्रति घंटा होती है।
3. हरिकेन - समुद्री चक्रवाती तूफानों में हरिकेन सबसे खतरनाक तूफान होता है। इसकी ताकत की कोई सीमा नहीं होती। अमेरिका में इसने सबसे ज्यादा तबाही मचाई है। कैटरीना और रीटा पिछले कुछ सालों में अमेरिका में आए मशहूर हरिकेन हैं। हरिकेन की गति 74 मील प्रति घंटा या ज्यादा तक हो सकती है। इसे टाइफून और साइक्लोन भी कहा जाता है।

Monday, May 25, 2009

अध्यापक के रूप में शुरु हुआ था डॉ.सिंह का सफर

अध्यापक के रूप में

शुरु हुआ था

डॉ.सिंह का सफर

आर्थिक सुधारों के जनक एवं देश को 'परमाणु वनवास से उबारने वाले कुशल प्रशासक मनमोहन सिंह लगातार दूसरी बार प्रधानमंत्री का दायित्व संभालने जा रहे हैं। एक मंजे हुए अर्थशास्त्री के रूप में भारत में ही नहीं बल्कि अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर उनकी साख है तथा मौजूदा विश्व आर्थिक मंदी के दौर में विश्व नेता डॉ. सिंह की राय को तवज्जो देते हैं। लोकसभा चुनाव 2009 में मिली जीत के बाद वह जवाहरलाल नेहरु के बाद भारत के पहले ऐसे प्रधानमंत्री बन गए हैं, जिन्हें पांच वर्षों का कार्यकाल सफलतापूर्वक पूरा करने के बाद लगातार दूसरी बार प्रधानमंत्री बनने का मौका मिला है। उन्होंने 21 जून 1991 से 16 मई 1996 तक नरसिम्हाराव के प्रधानमंत्रित्व काल में वित्तमंत्री के रुप में भी कार्य किया है। वित्तमंत्री के रुप में उन्होंने भारत में आर्थिक सुधारों की शुरआत की। डॉ. सिंह का प्रिय कथन है, "उस विचार को हकीकत में आने से नहीं रोका जा सकता जिसका समय आ गया है"। इसी सोच के आधार पर उन्होंने मिश्रित अर्थव्यवस्था वाले एक समाजवादी देश को खुली उदारवादी अर्थव्यवस्था की ओर मोड़ दिया। प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने विदेशनीति को भी नई दिशा दी तथा अमेरिका का सहयोग हासिल कर देश को 30 वर्षों से कायम 'परमाणु वनवासÓ से बाहर निकाला। डॉ. सिंह को सही मायनों में एक विचारक और विद्वान के रुप में जयजयकार मिली है। अपनी कर्मठता और कार्य के प्रति अपने शैक्षणिक दृष्टिकोण के साथ-साथ स्पष्टवादिता और आडंबरविहीन आचरण के लिए जाने जाने वाले डॉ. सिंह का जन्म 26 सितम्बर 1932 को अविभाजित भारत के पंजाब प्रांत के गांव गाह में हुआ था। जो इस समय पाकिस्तान में है। उन्होंने वर्ष 1948 में पंजाब विश्वविद्यालय से मैट्रिकुलेशन की परीक्षा उत्तीर्ण की। उनके शैक्षणिक जीवन ने उन्हें पंजाब से कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय पहुंचाया। जहां उन्होंने वर्ष 1957 में अर्थशास्त्र में प्रथम श्रेणी में स्नातक डिग्री हासिल की। इसके पश्चात वर्ष 1962 में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के नफील्ड कॉलेज से अर्थशास्त्र में डी.फिल किया। डॉ. सिंह ने अपनी पुस्तक 'इंडियाज एक्सपोर्ट ट्रेन्डस एण्ड प्रोस्पेक्टस फॉर सेल्फ सस्टेन्ड ग्रोथÓ में भारत के आंतरिक व्यापार पर केन्द्रित नीति की प्रारंभिक समीक्षा की थी। यह पुस्तक इस संबंध में पहली और सटीक आलोचना मानी जाती है। डॉ. सिंह ने अर्थशास्त्र के अध्यापक के तौर पर काफी ख्याति अर्जित की। वह पंजाब विश्वविद्यालय और बाद प्रतिष्ठित दिल्ली स्कूल ऑफ इकनॉमिक्स में प्राध्यापक रहे। इसी बीच वह अंकटाड सचिवालय में सलाहकार भी रहे और 1987 तथा 1990 में जिनेवा में संयुक्त कमिशन में सचिव रहे। 1971 में डॉ. सिंह को वाणिज्य मंत्रालय में आर्थिक सलाहकार तथा 1972 में वित्त मंत्रालय में मुख्य आर्थिक सलाहकार बनाया गया। इसके बाद के वर्षों में वह योजना आयोग के उपाध्यक्ष, रिजर्व बैंक के गवर्नर, प्रधानमंत्री के सलाहकार और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष रहे। भारत के आर्थिक इतिहास में हाल के वर्षों में सबसे महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब डॉ. सिंह 1991 से 1996 तक भारत के वित्तमंत्री रहे। उन्हें भारत के आर्थिक सुधारों का प्रणेता माना जाता है। डॉ. सिंह को उनके सार्वजनिक जीवन में प्रदान किए गए कई पुरस्कारों और सम्मानों में देश का दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'पद्म विभूषण, भारतीय विज्ञान कांग्रेस का 'जवाहरलाल नेहरु जन्म शताब्दी पुरस्कार, वित्तमंत्री के लिए 'एशिया मनी एवॉर्ड और 'यूरो मनी एवॉर्डÓ, क्रैम्ब्रिज विश्वविद्यालय का 'एडम स्मिथ पुरस्कार और कैम्ब्रिज में सेंट जॉन्स कॉलेज में विशिष्ट कार्य के लिए 'रॉयटर्स पुरस्कार प्रमुख थे। डॉ. सिंह को जापानी निहोन कीजई शिमबन सहित अन्य कई संस्थाओं से भी सम्मान प्राप्त हो चुका है। डॉ. सिंह ने कई अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों और अनेक अंतरराष्ट्रीय संगठनों में भारत का प्रतिनिधत्व किया है। उन्होंने साइप्रस में आयोजित सरकार के राष्ट्रमंडल प्रमुखों की बैठक (1993) में और वर्ष 1993 में वियना में आयोजित मानवाधिकार पर विश्व सम्मेलन में भारतीय शिष्टमंडल का नेतृत्व किया है। अपने राजनीतिक जीवन में डॉ. सिंह वर्ष 1991 से भारत के संसद और ऊपरी सदन (राज्यसभा) के सदस्य रहे हैं, जहां वह वर्ष 1998 और 2004 के दौरान विपक्ष के नेता थे। डॉ. सिंह की तीन पुत्रियां हैं।
डॉ. सिंह के जीवन के महत्वपूर्ण पड़ाव इस प्रकार हैं-
1957 से 1965 चंडीगढ़ स्थित पंजाब विश्वविद्यालय में अध्यापक
1969-1971 दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में अंतरराष्ट्रीय व्यापार के प्रोफेसर
1976 दिल्ली के जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में मानद प्रोफेसर
1982 से 1985 भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर
1985 से 1987 योजना आयोग के उपाध्यक्ष
1987 पद्मविभूषण से सम्मानित
1990 से 1991 भारतीय प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार
1991 नरसिम्हाराव सरकार में वित्तमंत्री
1991 असम से राज्यसभा के सदस्य
1995 दूसरी बार राज्यसभा के सदस्य
1996 दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में मानद प्रोफेसर
1999 दक्षिण दिल्ली से लोकसभा का चुनाव लड़ा, लेकिन हार गए
2001 तीसरी बार राज्यसभा सदस्य और सदन में विपक्ष के नेता
2004 भारत के प्रधानमंत्री एवं 2009 दूसरी बार भारत के प्रधानमंत्री

Friday, May 22, 2009

प्रधानमंत्री पद:, मनमोहन ने नेहरु की बराबरी की


प्रधानमंत्री पद:,
मनमोहन ने नेहरु
की बराबरी की
डॉ. मनमोहन सिंह प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु के बाद ऐसे दूसरे प्रधानमंत्री हैं जिन्हें पांच साल का कार्यकाल सफलतापूर्वक पूरा करने के बाद लगातार दूसरी बार प्रधानमंत्री बनने का गौरव हासिल हुआ। स्वतंत्र भारत के इतिहास में पंडित नेहरु और डॉ. सिंह के अलावा पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी उन तीन शख्सियतों में शामिल हैं, जो पांच वर्षों का कार्यकाल सफलतापूर्वक पूरा करने के बाद दूसरी बार प्रधानमंत्री बने। डॉ. सिंह से पहले के प्रधानमंत्रियों पर नजर डालने पर पता चलता है कि पंडित नेहरु और उनकी सुपुत्री इंदिरा गांधी चार-चार बार, जबकि भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख नेता अटल बिहारी वाजपेयी तीन बार और गुलजारी लाल नंदा दो बार प्रधानमंत्री बने। डॉ. मनमोहन सिंह पांच साल का कार्यकाल पूरा करके दूसरे कार्यकाल के लिए प्रधानमंत्री बने हैं। पंडित नेहरु 15 अगस्त 1947 को भारत को आजादी मिलने पर गठित अंतरिम सरकार में प्रधानमंत्री बने और 27 मई 1964 में अपनी मृत्यु तक प्रधानमंत्री बने रहे। स्वतंत्र भारत में 1951-1952 में पहले चुनाव के बाद वे दोबारा प्रधानमंत्री बने और 1957 में हुए दूसरे चुनाव में तीसरी बार प्रधानमंत्री चुने गए। इसके बाद 1962 में हुए तीसरे चुनाव में वह चौथी बार प्रधानमंत्री बने और मृत्यु तक प्रधानमंत्री बने रहे। पंडित नेहरु की मृत्यु के बाद 27 मई 1964 को गुलजारी लाल नंदा को कार्यवाहक प्रधानमंत्री बनाया गया जो 9 जून 1964 तक इस पद पर बने रहे। इसके बाद नंदा को 11 जनवरी 1966 को लाल बहादुर शास्त्री की अचानक हुई मौत के बाद एक बार फिर कार्यवाहक प्रधानमंत्री बनाया गया। श्रीमती इंदिरा गांधी को 1966 में 24 जनवरी को प्रधानमंत्री बनाया गया। इसके बाद 1967 में हुए लोकसभा चुनाव में वे जनादेश के जरिए दोबारा प्रधानमंत्री बनीं। वर्ष 1971 में हुए चुनाव में जनता ने उन्हें भारी बहुमत देकर तीसरी बार प्रधानमंत्री बनाया। लेकिन फिर उन्होंने 26 जून 1975 को देश में आपातकाल लगा दिया जिसका खामियाजा उन्हें 1977 में हुए चुनावों में भुगतना पड़ा और जनता ने उन्हें सत्ता से बेदखल कर दिया। इसके बाद 1980 में हुए चुनाव में उनकी भारी बहुमत से सत्ता में वापसी हुई और वे 31 अक्तूबर 1984 में अपनी हत्या के समय तक प्रधानमंत्री बनी रहीं। अटल बिहारी वाजपेयी तीन बार प्रधानमंत्री बने। पहली बार 13 दिन के लिए, दूसरी बार 13 महीनों के लिए और तीसरी बार पांच वर्ष के लिए। वह पांच वर्ष के कार्यकाल के लिए एक बार ही प्रधानमंत्री बने।
स्वतंत्र भारत के इतिहास में प्रधानमंत्री बनने वाले शख्सितों की सूची एवं अन्य विवरण इस प्रकार है-
जवाहरलाल नेहरु 15 अगस्त 1947 से लेकर 27 मई 1964 तक,
गुलजारी लाल नंदा 27 मई 1964 से 9 जून 1964 तक कार्यवाक प्रधानमंत्री रहे,
लाल बहादुर शास्त्री 9 जून 1964 से 11 जनवरी 1966 तक,
गुलजारी लाल नंदा 11 जनवरी 1966 से 24 जनवरी तक कार्यवाहक प्रधानमंत्री रहे,
इंदिरा गांधी 24 जनवरी 1966 से 24 मार्च 1977 तक,
मोरारजी देसाई 24 मार्च 1977 से 28 जुलाई 1979 तक (जनता पार्टी सरकार)
चौधरी चरण सिंह 28 जुलाई 1979 से 14 जनवरी 1980 तक (जनता पार्टी सरकार)
इंदिरा गांधी 14 जनवरी 1980 से 31 अक्टूबर 1984 तक,
राजीव गांधी 31 अक्तूबर 1984 से 2 दिसंबर 1989 तक,
विश्वनाथ प्रताप सिंह 2 दिसंबर 1989 से 10 नवंबर 1990 तक,
चंद्रशेखर 10 नवंबर 1990 से 21 जून 1991 तक,
नरसिंह राव 21 जून 1991 से 16 मई 1996 तक,
अटल बिहारी वाजपेयी 16 मई 1996 से 1 जून 1996 तक (भाजपा सरकार)
एचडी. देवगौड़ा 1 जून 1996 से 21 अप्रैल 1997 तक (जनता दल सरकार)
इंद्रकुमार गुजराल 21 अप्रैल 1997 से 19 मार्च 1998 तक (जनता दल सरकार)
अटल बिहारी वाजपेयी 19 मार्च 1998 से 22 मई 2004 तक (भाजपा सरकार)
डॉ. मनमोहन सिंह 22 मई 2004 से 18 मई 2009 तक।
डां. मनमोहन सिंह 22 मई 2009 से...

Wednesday, May 20, 2009

'153 के ख़िलाफ़ हैं आपराधिक मामले दर्ज'





'153 के ख़िलाफ़ हैं

आपराधिक मामले दर्ज'

भाजपा के 43 और कांग्रेस के 41 सांसदों के ख़िलाफ़ अपराधिक मामले दर्ज हैं
भारत में हुए पंद्रहवी लोकसभा चुनाव में कम से कम 153 ऐसे सांसद चुने गए हैं जिन के ख़िलाफ़ अपराधिक मामले दर्ज हैं. भारतीय चुनाव प्रक्रिया में सुधार को लेकर काम करने वाले एक ग़ैर सरकारी संगठन 'एसोसिएशन फ़ॉर डेमोक्रेटिक रिफ़ार्म' और 'नेशनल एलेक्शन वॉच' ने एक प्रेस विज्ञप्ति में ये जानकारी दी है.
इन संगठनों के अनुसार ऐसे सांसदों की सबसे ज़्यादा संख्या भारतीय जनता पार्टी में है.
जहाँ भाजपा के 43 सांसदों के ख़िलाफ़ अपराधिक मामले दर्ज हैं, वहीं कांग्रेस 41 सांसदों के साथ इस मामले में दूसरे नंबर पर है. 153 सांसद ऐसे हैं जिनके ख़िलाफ़ अपराधिक मामले दर्ज हैं इनमें से 74 के ख़िलाफ़ गंभीर अपराधिक मामले दर्ज हैं
एसोसिएशन फ़ॉर डेमोक्रेटिक रिफ़ार्म संगठन ने कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं को पत्र लिख कर अपील की है कि वे इन सांसदों को कैबिनेट में शामिल न करें. प्रेस विज्ञप्ति के मुताबिक - "153 सांसद ऐसे हैं जिनके ख़िलाफ़ अपराधिक मामले दर्ज हैं, इनमें से 74 के ख़िलाफ़ गंभीर अपराधिक मामले दर्ज हैं."
विपक्षी पार्टी भाजपा के अपराधिक मामलों में उलझे 43 सांसदों में से 19 सांसदों के ख़िलाफ़ गंभीर अपराधिक मामले दर्ज हैं जबकि कांग्रेस के 12 सांसदों के ख़िलाफ़ गंभीर अपराधिक मामले दर्ज हैं.
बाहर रखने की अपील
इस अध्ययन के मुताबिक, "अपराधिक छवि वाले ऐसे कई बाहुबली नेताओं को मतदाताओं ने इस चुनाव में ख़ारिज कर दिया है. वर्ष 2004 में लोकसभा के लिए चुने गए पाँच सांसद जिनके ख़िलाफ़ अपराधिक मामले थे, वे इस चुनाव में हार गए हैं."
ऐसे कई बाहुबली नेताओं को जिनकी अपराधिक छवि है मतदाताओं ने इस चुनाव में ख़ारिज कर दिया है. वर्ष 2004 में लोकसभा के लिए चुने गए पाँच सांसद जिनके ख़िलाफ़ अपराधिक मामले थे वे इस चुनाव में हार गए हैं
एसोसिएशन फ़ॉर डेमोक्रेटिक रिफ़ार्म संगठन ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष सोनिया गाँधी और पार्टी के महासचिव राहुल गाँधी को पत्र लिख कर अपील की है कि जिन सांसदों के ख़िलाफ़ अपराधिक मामले दर्ज हैं, उन्हें सरकार में और किसी संसदीय समिति में भी शामिल न किया जाए. भारत में जिन लोगों के खिलाफ़ सिर्फ़ अपराधिक मामले दर्ज हैं उन्हें चुनाव लड़ने से नहीं रोका जा सकता है लेकिन जिन लोगों को अदालत ने दोषी ठहरा दिया हो, वे चुनाव नहीं लड़ सकते.
ग़ौरतलब है कि भारतीय कानून व्यवस्था में एक मामले की सुनवाई में कई बार वर्षों लग जाते हैं.

Thursday, May 14, 2009

ये कैसी संवेदना ?


ये कैसी संवेदना ?
विस्फोट के बाद
घटनास्थल पहुंचे
पूर्व और वर्तमान गृहमंत्री
की हंसी ठिठोली
क्या आज नेता सिर्फ बयानबाजी करने और समाचार पत्रों तथा टीवी चैनलों में सिर्फ अपना चेहरा और नाम छपाने और दिखाने के लिए रह गए हैं ? उन्हें किसी की भावना और दुख का जरा भी ख्याल नहीं है? 10 मई को छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले के नगरी सिहावा के रिसगांव में नक्सलियों ने ब्लास्ट और फायरिंग से 13 जवानों को मौत के घाट उतार दिया था। कई घरों का चिराग एक पल में ही बुझ गया। कई परिवारों का सहारा क्षणभर में हमेशा के लिए छीन गया। इस घटना पर राज्य के प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस ने राजनीतिक रुप देने की कोशिश की और बयान जारी किया कि पांच सदस्यीय टीम घटनास्थल पर जाकर जांच करेगी। इस घटना के समय अपने गृहग्राम में बैठे गृहमंत्री ननकीराम कंवर ने मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह के कहने के बाद रायपुर आना गंवारा समझा और दूसरे दिन वे घटनास्थल के लिए रवाना हुए। उनके साथ कांग्रेस के पूर्व गृहमंत्री नंदकुमार पटेल,नेता प्रतिपक्ष रविन्द्र चौबे, विधायक धमतरी गुरमुखसिंह होरा,विधायक सिहावा अंबिका मरकाम आदि के साथ दर्जनों ग्रामीण तथा सैकड़ों पुलिस के अधिकारी और जवान भी घटनास्थल पहुंचे। प्रदेश के गृहमंत्री का घटनास्थल पर पहुंचने को लेकर पुलिस महकमें के जवानों और अधिकारियों के हौसले बढ़े हुए नजर आ रहे थे लेकिन जिस जगह पर विस्फोट हुआ जहां पर जमीन के भीतर आधी धंसी हुई चारपहिया वाहन खड़ी हुई थी उस स्थान पर ना जाने पूर्व गृहमंत्री और वर्तमान गृहमंत्री को किस बात पर इतनी जोर से हंसी आ गई कि वे एक दूसरे को ताली भी दे बैठे। उस समय वहां मौजूद उनके साथ गया हर वो शख्स हंस रहा था जिसके घर का कोई भी व्यक्ति देश सेवा के लिए शहीद नहीं हुआ। ऐसी जगह पर ठहाके लगाते समय उन्हें उन लोगों का जरा भी ख्याल नहीं आया जिनके घरों में मातम छाया हुआ है जो जवान उनके साथ उनकी सुरक्षा के लिए घटनास्थल पर डटे हुए थे। इस हंसी से वहां तैनात सुरक्षाकर्मियों और पुलिस अधिकारियों पर क्या बीती होगी वे ही बता सकते हैं। उस हंसी पर उनके मन में क्या सवाल उठे होंगे वे ही जानें क्या इससे उनके मनोबल पर प्रभाव नही पड़ा होगा ? जहां पर चार दिनों पहले 13 जवानों की मौत हुई वहां गोलियों की दनदनाहट गूंजती रही ऐसी जगह पर इतने जिम्मेदार पदों पर बैठे नेताओं की हंसी-ठिठोली का क्या औचित्य था ? क्या नेताओं में संवेदना इतनी खत्म हो गई है कि वे ऐसे स्थान पर हंसे जहां प्रदेश की सबसे बड़ी समस्या ने दो दिनों पहले मौत का नंगा नाच खेला था? जब घटनास्थल पर वे इस तरह दिखे तो वे अपने मंत्रालय के एसी रुम में अपनी जिम्मेदारी के प्रति कितने गंभीर होंगे इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।

Wednesday, May 13, 2009

आसमान में सुराख


कौन कहता है कि
आसमान में सुराख
नहीं हो सकता
एक पत्थर तो
तबियत से
उछालो यारों...

Tuesday, May 12, 2009

लोकसभा चुनाव: अंतिम चरण का मतदान 13 को



लोकसभा चुनाव: अंतिम चरण का मतदान 13 को


पांच चरणों में हो रहे लोकसभा चुनावों के अंतिम चरण के मतदान में बुधवार को सात राज्यों और दो केंद्र शासित प्रदेशों के मतदाता 1,432 उम्मीदवारों के भाग्य का फैसला करेंगे। इनमें 93 महिलाएं भी शामिल हैं।अंतिम चरण में 86 संसदीय क्षेत्रों में 1.07 करोड़ मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग कर लोकसभा के लिए अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करेंगे.

लोकसभा चुनाव के पहले चरण का मतदान 16 मई को हुआ था और ठीक एक माह बाद 16 मई को मतगणना का काम आरंभ होगा।निर्वाचन आयोग ने अंतिम चरण के लिए 1,21,000 मतदान केंद्र बनाए हैं, जिनमें 5,00,000 मतदान कर्मी नियुक्त किए गए हैं। अंतिम चरण के मतदान में 1,86,000 इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) का इस्तेमाल किया जाएगा। इस दौरान अधिकारियों ने 5,995 गांवों को संवेदनशील घोषित करते हुए कहा है कि वहां मतदान के दौरान अशांति की स्थिति निर्मित हो सकती है।इस चरण में तमिलनाडु की 39, उत्तरप्रदेश की 14, पश्चिम बंगाल की 11, पंजाब की नौ, उत्तराखंड की पांच, हिमाचल प्रदेश की चार तथा जम्मू एवं कश्मीर राज्य की दो संसदीय सीटों पर मतदान होगा। केंद्र शासित प्रदेशों चंडीगढ़ और पुड्डचेरी की एक-एक सीट पर मतदान होगा।