Thursday, February 25, 2010

सचिन तेंदुलकर . एक शख्स जिसने दे दी सारे जहाँ को ख़ुशी

सचिन तेंदुलकर .एक शख्स जिसने दे दी सारे जहाँ को ख़ुशी


आज के समय में जब लोगों के पास खुश हो पाने का भी समय नहीं है ऐसे में यदि मात्र एक शख्स करोड़ो लोगों को ख़ुशी दे-दे तो उसे क्या कहेंगे.ये या तो चमत्कार होगा या फिर किसी ऐसे इंसान की मेहनत का नतीजा जिसने अपने कर्म को पूजा माना हो.जी हाँ हम बात कर रहे है हमारे देश भारत के वंडर-बॉय(अब वंडर-मेन) सचिन तेंदुलकर की. आंकड़े बताते है की विश्व क्रिकेट के इतिहास में अब तक कुल २९६१ वन-डे मैच खेले जा चुके हैं लेकिन सचिन ने जो किया वह हर उस नामी क्रिकेटर का सपना होगा जो आज के फटाफट क्रिकेट का हिस्सा हैं लेकिन भारत के इस लाजवाब क्रिकेटर ने २४ फरवरी बुधवार को ग्वालियर में एक-दिवसीय क्रिकेट का पहला दौहरा शतक लगाया तब देश हर वो व्यक्ति गौरवान्वित हो गया जिसे अपने भारतीय होने पर गर्व है.क्यों वन-डे में डबल सेंचुरी किसी सपने से कम नहीं है.क्रिकेट के जानकार उसे क्रिकेट का भगवान् कहते है.लेकिन सचिन ऐसे शख्स है जिन्होंने कभी भी अपने खेल पर घमंड नहीं किया और इतनी ऊँची शख्सियत होने के बाद भी उनका व्यव्हार हमेशा हर किसी से दोस्ताना ही रहा है. इतनी लम्बी क्रिकेट खेलने के बाद भी आज तक कभी वो विवादों में नहीं रहे. सचिन ने बुधवार को पुरे ५० ओवर मैच खेलकर ये बता दिया की उनमे अभी कितना दम बांकी है.सचिन आज हर उस व्यक्ति का आदर्श होना चाहिए जो अपने परिवार तक को ख़ुशी दे पाने की कोशिश में थक जाता है लेकिन सचिन हमारे देश का एकमात्र ऐसा वंडर-बॉय (अब वंडर-मेन) है जिसने सारे जहाँ को ख़ुशी दे दी.

Friday, February 19, 2010

ये जीवन है


                                    

Sunday, February 14, 2010

साइकिल चलाने की बजाय यदि अपने काफिले से एक-एक गाड़ी कम कर लें मंत्री तो लाखों लीटर पेट्रोल बरबाद होने से बच जाएगा .

महंगाई का सब अपने -अपने तरीके से विरोध जता रहे हैं। लोकतंत्र है इसलिए जो जैसी मर्जी आए अपना दिमाग लगाकर कुछ ना कुछ नया कर पब्लिसिटी पाने की तलाश में रहते हैं। अभी छत्तीसगढ़ में महंगाई को लेकर काफी शोर मचा हुआ है। कोई दुकान लगाकर महंगे सामान बेच रहा है तो कोई महंगाई के लिए जिम्मेदार नेता का पुतला फूंक रहा है तो कोई बंद करवाकर दो वक्त की रोटी की जुगाड़ में निकलने वाले मजदूर के पेट में लात मार रहा है, तो कोई सिर्फ नारेबाजी से काम चला रहा है। ये कोई एक की संख्या में नहीं हैं बल्कि सैकड़ों हजारों की संख्या में हैं। जो महंगाई और ना जाने कितने प्रकार की चीजों को लेकर समय-समय पर सड़कों पर आते रहते हैं। उनकी इस करतूत से ना तो पहले कभी कुछ हुआ है और ना आगे कभी कुछ होने वाला है। सरकार में पद पर बैठे नेताओं को जैसा सरकार चलाना है वो वैसा ही चलाएंगे। अब बात करें महंगाई की तो महंगाई के विरोध में हमारे प्रदेश में काबिज भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री,मंत्री और तमाम विधायक (महिला विधायक और मंत्री भी शामिल हैं) साइकिल चलाकर विधानसभा जाएंगे। अब 12 किलोमीटर तक साइकिल चलाना मजाक तो नहीं। क्योंकि जो रोज साइकिल चलाता है उसके लिए 12 क्या 22 भी चलेगा। पर जो ना जाने कितने सालों से साइकिल चलाना तक भूल गए हैं ऐसे लोग 12 किलोमीटर तक साइकिल चलाएंगे कैसे? खैर ये भी छोड़ो। अब बात करे कि आखिर साइकिल चलाकर वो कितना पेट्रोल-डीजल बचा लेंगे। मैं यह सोच ही रहा था तभी मेरे दिमाग में ये ख्याल आया कि जितने लोग भी इस काम में हिस्सा ले रहे हैं उनमें से सभी दल-बल के साथ चलते हैं। दल-बल मतलब एक के पीछे एक ना जाने तीन,चार,पांच कितने वाहन चलते हैं। जाहिर है वाहन चलते हैं तो इंधन भी खर्च होता होगा। अब साइकिल चलाने वाले मंत्रियों को इतनी ही चिंता महंगाई की है तो अपने ताम-झाम को कुछ कम करके एकात वाहन अपने काफिले से यदि कम कर दें तो लाखों लीटर ईंधन की बचत कर सकते हैं। लेकिन वो ऐसा करेंगे नहीं क्योकि यदि वो ऐसा करेंगे तो पावरफुल मंत्री कैसे कहलाएंगे। क्योंकि पावरफुल दिखना है तो ताम-झाम तो दिखाना ही होगा। अब ऐसे दिखावा करके खबरों में आने के लिए इस तरह की हरकत करने वाले नेताओं को कौन समझाए कि जनता इतनी बेवकूफ नहीं है भैय्या बस उसकी कमजोरी सिर्फ इतनी है कि वो अपना गुस्सा सड़क प्रदर्शित नहीं कर सकती?

Saturday, February 13, 2010

ऐश्वेर्या को बुखार. पहले पन्ने पर खबर


कितनी संवेदनशील है मीडिया


बॉलीवुड अभिनेत्री ऐश्वेर्या को बुखार हो गया. बुखार न हुआ कोई पहाड़ टूट पड़ा हो. एक बड़े समाचार पत्र ने इस खबर को पहले पन्ने पर फोटो के साथ छापा. खबर पढने के बाद मुझे लगा कि एक गरीब असहाय जो लाइलाज बीमारी से तड़पता रहता है उसकी पीड़ा उसके सामने से गुजरने वाले मीडिया कर्मियों को नहीं दिखती पता नहीं क्यों आज हर वर्ग इतना मतलबी हो गया है. खबर भी आजकल औकात देखकर बनाई जाती है.बड़े आदमी को छीक आ जाये तो खबर बन जाती है.और गरीब बेमौत मर जाए उसे अखबार जगह तक नहीं मिल पाती.यदि कभी कभार जगह मिल भी जाती है तो ऐसी जगह होती है जिन पन्नो को पाठक पढता ही नहीं है.हमारे प्रदेश में कई स्थानों पर लोगों को खाना (२ रूपए किलो चावल ) तक नहीं मिल रहा है लेकिन शिकायत के बाद भी खबर लग जाए तो बहुत बड़ी बात है.कहने का मतलब यह है कि जिस उद्देश्य के लिये मीडिया का जन्म हुआ है अगर उसमे उन्ही चीजों को स्थान नहीं मिलेगा तो ऐसी मीडिया का क्या मतलब?

Friday, February 12, 2010

बदल गयी है प्यार की परिभाषा

बदल गयी है प्यार की परिभाषा




खबर है कि वैलंटाइंस डे पर कंडोम

                                                                                                
और वायग्रा की बिक्री बढ़ गयी.


वैलंटाइंस डे प्रपोज करने का सबसे अच्छा दिन है। कहते हैं ना प्यार का रास्ता पेट से होकर जाता है। डेली मेल में छपे सर्वे के मुताबिक, महिलाओं को अगर अच्छे से रेस्तरां के रूमानी माहौल में कुछ खिलाकर प्रपोज किया जाए तो उन्हें यह काफी अच्छा लगता है। लेकिन खबर पढ़कर तो ऐसा लगता है कि प्यार का रास्ता पेट ही नहीं पेट के ......? वैलंटाइंस डे के बारे में मैंने जब पहली बार सुना था तब ये जानता था कि इस दिन नए प्रेमी अपने प्रेम का इजहार करते है. ऐसे तो वैलंटाइंस डे प्यार के खूबसूरत एहसास को व्यक्त करने का अवसर होता है, मगर अनजाने में ही कुछ लोगों ने इसकी गलत परिभाषा भी गढ़ ली है। यही वजह है कि इस मौके पर वायग्रा जैसी दवाओं का मिस यूज बढ़ जाता है। हालत यह होती है कि, वैलंटाइंस डे के अंतिम चार दिनों में वायग्रा जैसी दवाओं की बिक्री में 40 पर्सेंट की बढ़ोतरी हो जाती है और 90 पर्सेंट खरीदार युवा होते हैं, जिन्हें इसकी कोई जरूरत ही नहीं होती। इसे प्यार कहें या फिर सेक्स या फिर प्यार के नाम पर धोखा. क्योंकि मै समझता हूँ कि प्यार और सेक्स में काफी अंतर होता है लेकिन आज-कल के युवाओं कि यह सोच हो गयी है कि जिससे हम प्यार करते है उससे सेक्स करना हमारा अधिकार है. इस सोच के लिए फिल्मे ज्यादा जिम्मेदार मानी जा सकती है. जानकारों की माने तो वैलंटाइंस डे संत वैलंटाइंस के नाम पर पड़ा है जो प्यार करने की सिख देते थे. पर युवाओं ने इसे सेक्स के दिन के लिए चुन लिया है. समाज में बढ़ रहे खुलेपन और टीवी चैनलों तथा फिल्मों को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है. वैलंटाइंस डे अपने चाहने वाले को प्रपोज करने, घूमने फिरने, खुशी मनाने के लिए बना है, लेकिन इस मौके पर कुछ लोग सुपर मैन बन जाना चाहते हैं।

Tuesday, February 9, 2010

सिस्टम में सब चोर हैं



सिस्टम में सब चोर हैं


लोगों के जाए बिना ही कैसे खुल


जाते हैं खाते
 


छत्तीसगढ़ के कृषि सचिव ने राज्य के कई ऐसे गरीबों को लखपति बना दिया था जिनके पास दो वक्त की रोटी जुटाने का भी साधन नहीं है. ये काम भले का होता, यदि जिनके नाम खाता है उन्हें इस बात की जानकारी होती और वो इस खाते का खुद संचालन कर पाते. काले धन को सफ़ेद बनाने का ये खेल क्या सिर्फ कृषि सचिव के चाह लेने से संभव हो पाता.क्या बैंक के अफसर को इस बात के लिए जिम्मेदार नहीं माना जा सकता की जो व्यक्ति बैंक आया ही नहीं है उसके नाम का पास बुक, उसके नाम से चैक आखिर कैसे जारी हो गया. और उस खाते से लाखों रुपये का लेनदेन इन खातेदार की उपस्थिति के कैसे हो रहा था. जाहिर है सिस्टम में सब चोर हैं क्योंकि बिना बैंक अफसरों के सहयोग के इतना बड़ा खेल कर पाना संभव नहीं हैं. लोग बताते हैं की जिस बैंक के बारे में चर्चा छिड़ी है उसके बारे में ऐसी जानकारी है कि वहां सहर के कई और नामी लोगों की इसी तरह कई खाते चल रहे है. यदि उस बैंक के खतों की जाँच की जाए तो निश्चित ही कई बड़े लोगों के फर्जी खातों का पता चल सकता है. कलयुग में सच और सच के रास्ते पर चलने वाले लोगों को आसानी से सुख नसीब हो पाना संभव नहीं है.क्योंकि आज का पूरा सिस्टम ही बिकाऊ और भ्रष्ट है और चोरों के कारण चंडाल राज कर रहें हैं. अभी की घटना में इतना बवाल होने के बाद भी सरकार ने सिर्फ बयान ही जारी किया है कारवाई करने की हिम्मत हो ही नहीं रही है ऐसे में जांच में फंसे अफसर को भी हिम्मत आ गयी की पत्रकारों को बुलाकर बोल रहा है कि मै बेक़सूर हूँ. ये तो इस बात कि इन्तहां हो गयी कि पहले चोरी ऊपर से सीनाजोरी. इतनी मोटी तनखा होने,सरकार द्वारा तमाम सुख-सुविधा देने के बाद भी इस तरह लूट खसोट मचा रखें है तो फिर आम जनता का भला हो पायेगा ये सोचना भी मुश्किल है. नेता हो या मंत्री हर कोई अपनी जिंदगी भर की कमाई एक साथ कमा लेना चाह रहा है. इस पर रोक लगाने के लिए हर पांच साल में सभी अफसरों के खाते और उनकी संपत्ति की जांच करना अनिवार्य कर देना चाहिए ताकि काली कमाई पर कुछ हद तक रोक लग सके.

Monday, February 8, 2010

आमदनी अठन्नी खर्चा दो रुपैया

आमदनी अठन्नी खर्चा दो रुपैया



बढ़ती महंगाई से आम जनता त्रस्त


लोकतंत्र में जी रहे देश के आम लोगों के लिए दो वक्त की रोटी की जुगाड़ भी मुश्किल हो गई है। हर छ: माह में बेहिसाब बढ़ जाने वाली महंगाई ने आम जनता का हाल इतना बेहाल कर दिया है कि उसे अभावों में जीने की आदत पड़ती जा रही है। ऐसा नहीं कि बाजार में किसी चीज की कमी है. बाजार में जरुरत की सभी चीजें उपलब्ध होने के बाद भी बढ़ती महंगाई के कारण लोग चाह कर भी कई चीजों पर अपना मन मार लेते हैं। क्योंकि उन्हें घर परिवार की दूसरी जरुरतों को भी पूरा करना पड़ता है। पहले कहावत हुआ करती थी कि आमदनी अठन्नी खर्चा रुपैया, यह कहावत उन लोगों के लिए लागू होती थी जिनकी कमाई कम और खर्च ज्यादा हुआ करते थे। अब भी यह कहावत लागू होती लेकिन आज के समय में ये खर्ते मजबूरी में लोगों से कराए जा रहे हैं सरकार के द्वारा। क्योंकि पहले इस मुहावरे को जबरिया खर्चे बढ़ाने वाले लोगों पर लागू किया जाता था पर वर्तमान में यह सभी पर लागू हो रहा है। जान निकाल लेनी वाली महंगाई ने पूरे देश के आम लोगों की कमर तोड़ कर रख दी है। ना चाहते हुए भी लोगों की खर्च करना पड़ रहा है क्योंकि यदि जरुरत की चीजों पर खर्च नहीं करेगा तो जीवन कैसे चलेगा। नेताओं की ओर से लगातार यह बयान आते रहते हंै कि कीमतों पर लगाम लगाई जाएगी। लेकिन पिछले डेढ़ दशक में महंगाई हावी हुई है उसका हर कोई जीता जागता सबूत है। लोगों को यह भी पता है कि एक बार जिस वस्तु की कीमत बढ़ी दोबारा उसका मूल्य कभी कम नहीं हुआ। इस पर ना तो नेता लगाम लगा सकते हैं और ना ही देश के नौकरशाह। बढ़ती महंगाई पर यदि कोई लगाम लगा सकता है तो वह है देश की जनता। क्योंकि यही वह जनता है जिसके दम पर नेता कुर्सी पर बैठता है लेकिन जनता कब अपनी ताकत को पहचानेगी कि वो चाहें तो देश,प्रदेश के मुखिया बने लोगों को जब चाहे तब कुर्सी से उतार फेंक सकती है। लेकिन इसके बाद भी कभी जनता उग्र नही होती। सरकार जितनी दाम बढ़ाती है उसे सरकारी फरमान मान कर उसे अपना लेते हैं। यदि जनता उग्र रुप लेकर इनका विरोध करे तो सरकार के इस रवैये पर काफी हद तक रोक लगाई जा सकती है। आज बाजार पर नजर डालें तो हम पाते हैं कि दाल हो तेल,चीनी हो यह दूध या फिर हो रसोई गैस हो या पेट्रोल हर चीज लोगों से जुड़ी है जिनका दैनिक उपयोग करना जरुरी है ऐसे में कोई इन चीजों का उपयोग ना करे तो उनका जीना दूभर हो जाएगा। महंगाई से लोगों की जान तो निकल ही रही पर यदि जनता नहीं जागी तो आने वाले समय में इस तरह की चौकानें वाली खबरें भी सामने आ सकती है कि महंगाई के कारण किसी ने जान दे दी।

Thursday, February 4, 2010

मनमोहन की पहल पर यदि हो जाये अमल...


मनमोहन की पहल पर
यदि हो जाये अमल...

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भ्रष्टाचार रोकने मंत्रियों के लिए जो फरमान जारी किया है ,यदि उस पर अमल हो जाये देश का भला हो जायेगा. क्योंकि देश का हर मंत्री चाहे वो किसी भी राज्य का हो अपने पद का खुलेआम दुरुपयोग कर रहा है. जिस विभाग का वह मंत्री है उस पर ध्यान देने की बजाय अपने दूसरे व्यवसाय पर ज्यादा ध्यान देता है. मंत्री पद मिलने के बाद तो जैसे वह यह सोचने लगता है कि अगली बार मौका मिलेगा कि नहीं। इसलिए पांच साल के कार्यकाल में पूरी जिन्दगी कि कमाई कर लेने चाहता है, और अपने इसी उद्देश्य को पूरा करने सरकार के पैसों का अनाप-शनाप उपयोग कर अपना खजाना भरना चालू कर देते है. कई तरह सरकारी पैसों को अपने फायदे के लिए उपयोग करते है. इस काम में नौकरशाहों का वे भरपूर उपयोग करते है, क्योंकि बिना इनके सहारे कोई भी मंत्री अपनी जेब नहीं भर सकता. मनमोहन जी की इस पहल से ऐसे मंत्रियों के पांव तले जमीन खिसक गयी जो सिर्फ इसी काम में लगे है. वर्तमान देश के किसी भी राज्य में ऐसे किसी मंत्री का मिलना मुश्किल है जो भ्रष्ट न हो. मंत्रियों के पारिवारिक स्थिति पर नजर डालेंगे तो पता चल जायेगा की जो मंत्री बनने के पहले एक कार भी मालिक नहीं होता था वह मंत्री बनते ही करोड़ों की सम्पति का मालिक बन जाता है. आखिर क्या जादू हो जाता है मंत्री पद मिलते ही? जिस नेता का पुत्र कभी राज्य के बाहर नहीं गया होता,मंत्री पद मिलते ही वह हवाई यात्रा कर विदेशों के शैर पर निकल जाता है. देश के बाहर पढने(ऐश) करने चला जाता है. इसे देखने वाला कोई नहीं है. उसे ये पूछने वाला कोई नहीं है कि ये सब कहाँ के पैसों से आ रहा है.मनमोहन जी की इस फरमान को यदि ठीक ढंग से लागु करना है तो मंत्रियों को यह भी निर्देशित करना चाहिए कि मंत्री बनने के पहले उनकी सम्पति कितनी थी और अब कितनी है. मंत्रियों के साथ-साथ नौकरशाहों को भी अपनी सम्पति घोषित करने के निर्देश देने चाहिए क्योंकि किसी मंत्री या नेता को भ्रष्ट बनाने में नौकरशाहों का पूरा-पूरा योगदान होता है.यदि देर से ही सही इस पहल की शुरुवात हो जाती है तो निश्चित ही आने वाले समय में भ्रटाचार पर कुछ हद तक रोक लगायी जा सकती है.

friendship