Friday, December 31, 2010

Tuesday, December 14, 2010

नीरा राडिया - कितना आसान है सरकार और प्रशासन में सेंध लगाना.



नीरा राडिया- जिस महिला को चंद महीने पहले तक कोई जानता नहीं था, वो आज देश-विदेश की सबसे चर्चित महिला बन गई है. नीरा ने अपने दिमाग से ऐसा जाल बुना कि, क्या नेता,क्या उद्योगपति और क्या पत्रकार सबको उसकी बात माननी पड़ी और उसके अनुसार काम करने को मजबूर हो गए. नीरा की  सफलता की  कहानी जितनी सच है उतनी ही सच है सरकार और प्रशासन में सेंध लगाना. इसपर सोचने-विचारने की जरुरत है कि कोई कितनी आसानी से सेंध लगाकर अपना काम निकल सकता है. देश में भ्रष्ट्राचार ने किस  कदर अपनी पैठ बनाई है उसका जीता जागता सबूत नीरा है. कोई लोबिंग करके इतना सफल हो सकता है यह देश-विदेश के तमाम लोबिस्तो के लिए शोध का विषय है. अभी तक जो तथ्य नीरा के बारे में सामने आये है वह दांतों तले उंगलिया दबाने के लिए काफी है. नीरा की काबिलियत एक अलग मामला है लेकिन देश के नेता और नौकरशाह इसके लिए ज्यादा जिम्मेदार है. जरा सी लालच के लिए ये नेता न जाने कहाँ तक जा सकते है. पैसा आज भगवान से भी बढकर हो गया है क्योंकि पैसों के लालच में नेताओ को भगवान का डर भी नहीं रह गया है. घोटालों और गबन की ये कहानी एक दिन में नहीं हुई बल्कि इसके लिए कई लोगों को यूज किया गया.
   
राडिया का कारनामा .
2जी स्‍पेक्‍ट्रम लाइसेंस में हुए कथित घोटाले के सिलसिले में चर्चा में आईं नीरा राडिया लियाजनिंग करने वाली देश की बड़ी हस्तियों में शुमार हैं। उन्‍होंने 1990 में विदेशी कंपनी सिंगापुर एयरलाइंस के भारत में प्रवेश में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। हालांकि बाद में सिंगापुर एयरलाइंस ने भारत में विमान सेवा शुरू नहीं की, लेकिन राडिया तत्कालीन उड्डयन मंत्री अनंत कुमार और टाटा समूह के अध्यक्ष रतन टाटा पर अपना प्रभाव छोड़ने में सफल रहीं। रतन टाटा सिंगापुर एयरलाइंस के भारतीय पार्टनर थे। 

हाल ही में रतन टाटा ने खुलासा किया था कि सिंगापुर एयरलाइंस के साथ मिल कर वह विमानन कंपनी खोलना चाहते थे, लेकिन एक मंत्री ने उनसे 15 करोड़ की रिश्‍वत मांगी थी। उन्‍होंने रिश्‍वत देने से इनकार कर दिया था और एयरलाइन कंपनी खोलने का उनका सपना अधूरा ही रह गया।

राडिया ने व्यावसायिक जगत में 2000 में तब हड़कंप मचाया जब उन्होंने केवल 1 लाख रुपए की पूंजी के साथ खुद की एयरलाइंस कंपनी शुरू करने के लिए लाइसेंस मांगा। हालांकि उनके लाइसेंस का आवेदन निरस्त कर दिया गया।  उस समय नागरिक उड्डयन मंत्री अनंत कुमार थे।   

लेकिन तब तक रतन टाटा राडिया से काफी प्रभावित हो चुके थे। उन्होंने राडिया को टाटा टेलीसर्विसेज से जुड़े मामलों में आ रही अड़चनें सुलझाने की जबाबदारी सौंप दी। इसके बाद (2001 में) वैष्‍णवी कार्पोरेट कम्युनिकेशंस कंपनी बनाई गई। राडिया ने टाटा समूह से नजदीकी का भरपूर लाभ लिया और वे करीब 50 बड़ी कंपनियों को सलाह देने का काम करने लगीं। मुकेश अंबानी ने भी 2008-09 में मीडिया प्रबंधन के लिए राडिया की कंपनी को सलाहकार बनाया।  

इसी बीच राडिया 2जी लाइसेंस आवंटन के लिए सक्रिय हो गईं। इसके बाद उन्होंने दूरसंचार विभाग से जुड़े कई अफसरों से बेहतर संबंध बनाए। बड़ी कंपनियों और सरकार के बीच अहम कड़ी का किरदार निभाने वाली नीरा राडिया ने प्रवर्तन निदेशालय की पूछताछ में माना है कि वह टाटा टेलीसर्विसेज और यूनीटेक वायरलेस के लिए पूर्व दूरसंचार मंत्री ए राजा से लाइजनिंग कर रहीं थीं। उन्हें दो कंपनियों से उन्हें सलाह देने के एवज में 60 करोड़ की रकम मिली थी।

राडिया का कैरियर 2009-10 में चरम पर था। उनकी सभी कंपनियों का सालाना टर्नओवर 100 से 120 करोड़ रुपए के आसपास आंका गया।
राडिया कीनिया में पैदा हुईं और उनके पास ब्रिटेन का पासपोर्ट है।

नाम कमाने के बाद बदनामी 

नीरा राडिया पर यह भी आरोप लगते रहे हैं कि उन्‍होंने ए राजा को दूरसंचार मंत्री बनवाने के लिए काफी पैरवी की थी। इसके लिए उन्‍होंने देश के दो बड़े पत्रकारों की भी मदद लेने की कोशिश की थी। इस संबंध में बातचीत की एक रिकॉर्डिंग भी सार्वजनिक हो चुकी है और इस पर काफी विवाद हो रहा है।

प्रवर्तन निदेशालय ने नीरा राडिया से 2जी स्पेक्ट्रम के मामले में लंबी पूछताछ की। पूछताछ मुख्यतः 2 जी घोटाला, उनके राजा से संबंध और 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में शामिल कंपनियों के राडिया से संबंधों पर ही केंद्रित रही। राडिया की कंपनी वैश्नवी कार्पोरेट कम्युनिकेशंस द्वारा जारी बयान में आरोप लगाया गया कि उनके द्वारा टाटा टेलीसर्विसेज की पैरवी किए जाने के बाद इस कंपनी के साथ सौतेला व्यवहार किया गया। 


क्या था रिपोर्ट में 
सीएजी की रिपोर्ट के अनुसार 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाला करीब 1.77 लाख करोड़ रुपये का है। सीएजी ने यह आंकड़ा निकालने के लिए 3जी स्पेक्ट्रम आवंटन और मोबाइल कंपनी एस-टेल के सरकार को दिए प्रस्तावों को आधार बनाया है।

दूरसंचार की रेडियो फ्रिक्वेंसी को सरकार नियंत्रित करती है और अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार संघ (आईटीए) से तालमेल बनाकर काम करती है। दुनिया में आई मोबाइल क्रांति के बाद कई कंपनियों ने इस क्षेत्र में प्रवेश किया। सरकार ने हर कंपनी को फ्रिक्वेंसी रेंज यानी स्पेक्ट्रम का आवंटन कर लाइसेंस देने की नीति बनाई। उन्नत तकनीकों के हिसाब से इन्हें पहली जनरेशन(पीढ़ी) यानी 1जी, 2 जी और 3जी का नाम दिया गया। हर नई तकनीक में ज्यादा फ्रिक्वेंसी होती हैं और इसीलिए टेलीकॉम कंपनियां सरकार को भारी रकम देकर फ्रिक्वेंसी स्पेक्ट्रम के लाइसेंस लेती हैं।

सीएजी रिपोर्ट के अनुसार केंद्रीय दूरसंचार मंत्री ए. राजा ने 2008 में नियमों के उल्लंघन करते हुए 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन किया। इसके लिए उनके विभाग ने 2001 में आवंटन के लिए अपनाई गई प्रक्रिया को आधार बनाया, जो काफी पुरानी थी। उन्होंने इसके लिए बिना नीलामी के पहले आओ, पहले पाओ के आधार पर आवंटन किए। इससे 9 कंपनियों को काफी लाभ हुआ। प्रत्येक को केवल 1651 करोड़ रुपयों में स्पेक्ट्रम आवंटित किए गए जबकि हर लाइसेंस की कीमत 7,442 करोड़ रुपयों से 47,912 करोड़ रुपये तक हो सकती थी। 

सीएजी ने 1.77 लाख करोड़ का आंकड़ा निकालने के लिए दो तथ्यों को आधार बनाया। उन्होंने इस साल 3जी आवंटन में मिली कुल रकम और 2007 में एस-टेल कंपनी द्वारा लाइसेंस के लिए सरकार को दिए प्रस्ताव के आधार पर यह नतीजा निकाला। सीएजी के अनुसार 122 लायसेंस के आवंटन में सरकार को जितनी रकम मिली, उससे 1.77 लाख करोड़ रुपए और मिल सकते थे। इसीलिए यह घोटाला 1.77 लाख करोड़ रुपयों का माना गया।

Friday, December 10, 2010

मुन्नी और शीला ने बढ़ाये लड़कियों के सिरदर्द

दबंग में मुन्नी बदनाम क्या हुई  मुन्नी नाम वाली लडकियों का घर से निकलना मुश्किल हो गया. आस-पड़ोस वालों के मुह से इसके बोल निकलने शुरू हो गए. जो मुन्नी कभी गुमनाम हुआ करती थी आज वो बदनाम हो गयी है. मनोरंजन के नाम पर गाने लिखने वालो को इस बात का जरा भी ख्याल नहीं रहता कि इससे किसी को क्या फर्क पड़ेगा.उसे तो बस लिखना था लिख दिया.लेकिन उस गाने ने न सिर्फ गाँव में बल्कि शहर में भी असर दिखाना शुरू कर दिया है. एक शहर कि दो बहनों को इसकी वजह से अपना नाम बदलना पड़  गया. इसी तरह एक लड़की को स्कूल में उनके सहपाठियों ने इतना परेशान किया कि उसे बहुत घातक कदम उठाना पड़ा. मुन्नी का दौर ख़तम हुआ ही नहीं था कि शीला कि जवानी लोगों कि जुबान पर चढ़ गई. शीला कि जवानी गाने ने तो जवा लड़कियां  का रास्ते से गुजरना ही दूभर कर दिया. इस तरह के गानों से वो हर लड़की परेशान है जो समाज में निकल कर किसी न किसी दायित्व को निभा रही है. चाँद पैसो और लोगों को ओछा मजा देने कि लिए गीतकारों ने इस नए  और गंदे फार्मूले को बड़ी तेजी से अपना लिया है. यदि तेजी से बाद रहे इस फार्मूले को कड़े नियम बनाकर नहीं रोके गए तो आने वाले समय में इसके और भी भयंकर परिणाम सामने आयेंगे.लोग अपनी बच्चियों का कितनी बार नाम बदलेंगे जरुरी है कि ऐसी चोजों पर रोक लगाई जाये. 





Tuesday, December 7, 2010

2 जी स्पेक्ट्रम. भ्रष्टाचार की हद पार हो गयी



देश के सबसे बड़े घोटाले ने  भ्रष्टाचार की हद पार कर दी है. इस महा घोटाले ने तो कामनवेल्थ में हुए घोटाले को इतना बौना साबित कर दिया कि कई लोगों के सर चकरा गए. देश में हुए 2जी स्पेक्ट्रम के सस्ते आबंटन से देश को 1.76 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। यह अलॉटमेंट तत्कालीन टेलिकॉम मिनिस्टर ए. राजा के कार्यकाल में हुआ। विपक्ष के लगातार दबाव के बाद ए.राजा ने टेलिकॉम मिनिस्टर के पद से इस्तीफा दे दिया.इसमें आपरेटरों को लाइसेंस देने का प्रावधान किया गया। सरकार को अच्छा पैसा मिला। 2007 में सरकार ने 2जी स्पेक्ट्रम नीलाम करने का फैसला किया। इस नीलामी में सरकार को कुल नौ हजार करोड़ रुपए मिले जबकि सीएजी के अनुमान के अनुसार उसे एक लाख पचासी हजार करोड़ रुपए से अधिक की कमाई होनी चाहिए थी। राजा पर आरोप है कि उन्होंने नीलामी की शर्तो में मनचाहे बदलाव किए। प्रधानमंत्री, कानून मंत्री और वित्त मंत्री की सलाह को अनदेखा किया। उन्होंने ऐसी कंपनियों को कौड़ियों के भाव स्पेक्ट्रम दिया जिनके पास न तो इस क्षेत्र में काम का कोई अनुभव था और न ही जरूरी पूंजी। उन्होंने चंद कंपनियों को फायदा पहंचाने के लिए बनाई और बदली सरकारी नीतियां। लेकिन गठबंधन की राजनीति की दुहाई देते हुए प्रधानमंत्री राजा के खिलाफ विपक्ष, अदालत और सीएजी के आरोप, शिकायतें, टिप्पणियों और रिपोर्टो के बावजूद पूरे तीन साल तक चुप्पी साधे रहे।
क्या है 2 जी?
- सेकंड जनरेशन सेलुलर टेलीकॉम नेटवर्क को 1991 में पहली बार फिनलैंड में लांच किया गया था। यह मोबाइल फोन के पहले से मौजूद नेटवर्क से ज्यादा असरदार तकनीक है। इसमें एसएमएस डाटा सर्विस शुरू की गई।
- राजा ने 2 जी स्पेक्ट्रम के लाइसेंस आवंटन में भारतीय दूरसंचार नियमन प्राधिकरण ट्राई के नियमों की धज्जियां उड़ाईं।
क्या थे नियम
- लाइसेंस की संख्या की बंदिश नहीं
- इकरारनामे में कोई बदलाव नहीं
- प्रक्रिया के समापन तक विलयन और अधिग्रहण नहीं हो सकता
- बाजार भाव से प्रवेश शुल्क
राजा के कानून
- 575 आवेदनों में से 122 को लाइसेंस
- स्वॉन और यूनिटेक के अधिग्रहण को मंजूरी
- इकरारनामे को बदला गया
- 2001 की दरों पर
क्या तरीके अपनाए
- बिल्डर और ऐसी कंपनियों ने लाइसेंस के लिए आवेदन लगाए, जिनका टेलीकॉम क्षेत्र में काम करने का कोई अनुभव नहीं था। रियल स्टेट क्षेत्र की कंपनियों को टेलीकाम लाइसेंस दिया।
- बाहरी निवेशकों को बाहर रखने के लिए अंतिम तिथि को मनमाने ढंग से पहले तय कर दिया गया।
- पहले आओ, पहले पाओ का नियम बना दिया, 575 में से 122 को लाइसेंस दे दिए।
- घोषणा की कि ट्राई की सिफारिशों पर अमल हो रहा है, लेकिन पांच में से चार सिफारिशें बदल दी गईं।
- केबिनेट, टेलीकॉम कमिश्नर और ईजीओएम को दरकिनार किया।
सीएजी रिपोर्ट में
- नुकसान का आंकड़ा 1,76,379 करोड़ रुपए
- लाइसेंस प्रक्रिया में प्रधानमंत्री के दिशा-निर्देशों की अनदेखी
- नीलामी से जुड़ी वित्त मंत्री की जरूरी सिफारिशों को सुना नहीं
- 2 जी स्पेक्ट्रम के आवंटन में टेलीकॉम सचिव के नोट को अनदेखा किया।
- ट्राई के उस पत्र को देखा तक नहीं, जिसमें उसकी सिफारिशों की उपेक्षा नहीं करने को कहा गया।
सात साल पुराने रेट पर स्पेक्ट्रम की बंदरबांट
राजा ने नौ टेलीकॉम कंपनियों को 122 सर्किल में सेवाएं शुरू करने का लाइसेंस दिया। लेकिन प्रक्रिया पर तभी सवाल उठे। आवेदन की अंतिम तारीख एक अक्टूबर घोषित की। बाद में कहा कि स्पेक्ट्रम सीमित होने के कारण 25 सितंबर के बाद मिले आवेदनों पर विचार नहीं होगा। हर कंपनी से 1658 करोड़ रुपए लेकर देश भर में सेवाएं शुरू करने की अनुमति दे दी गई। यह मूल्य सरकार द्वारा 2001 में तय रेट पर लिया गया जबकि 2007 तक टेलीकॉम क्षेत्र कई सौ गुना बढ़ चुका था।
1658 से 10,000 करोड़ बनाए चंद दिनों में
स्वॉन टेलीकॉम को लाइसेंस 1600 करोड़ रुपए में मिला। कुछ दिनों बाद उसने 45 प्रतिशत शेयर सऊदी अरब की इटिसलाट को 4500 करोड़ में बेच दिए। यानी लाइसेंस मिलने के बाद कंपनी का मूल्यांकन 10,000 करोड़ रुपए हो गया। इसी तरह यूनिटेक ने 60 प्रतिशत हिस्सेदारी नार्वे की टेलीनॉर को 6000 करोड़ में बेच दी। तब तक इन दोनों के पास एक भी उपभोक्ता नहीं था। न ही सेवाएं शुरू हुई थीं।