Wednesday, December 23, 2009

प्रकृति की अनुपम कृति गंगरेल


प्रकृति की अनुपम कृति गंगरेल

जल ही जीवन है- जल से ही जीवन है, जल है तो सब कुछ है, जल नहीं तो कुछ भी नहीं- जल बिन सब सून। प्रकृति के हर चरण में जल से परिपूर्ण दृश्य-सदृश्य सौन्दर्य बोध कराते हैं, और खासकर जहां पहाडिय़ों से घिरा दूर-दूर तक पानी ही पानी नजर आये तो फिर क्या कहने वहीं का मंजर हर मौसम में सुकून भरा होता है। चंचल जल और ठहरा हुआ धीमा हलचल कल। कल हर तरह से प्रकृति के चितेरों को तृप्त करता है। आज हम छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े बांध गंगरेल के ऊपर खड़े हैं- यहां का नजरा मीलों तक पानी भरा अत्यंत सुंदर मधुर नमी स्पर्शमय है। गंगरेल बॉंध 2 किलोमीटर में एक फलांग कम 1830 मीटर लंबा है। इसके 14 विशाल रेडियल गेट (टेन्टर गेट) हैं, जो घूमते हुए खुलते हैं, सामान्य स्थिति में यहां 27 टीएमसी (टन मिलियन क्यूबिक मीटर) जल मौजूद रहता है। यहां से नीचे जाने पर गैलेरी में गंगरेल डेम रविशंकर सागर परियोजना का सबसे प्रमुख आकर्षण है ,यह एक सुरंग है, जो डेम के निचले हिस्से में लगभग 1 किलोमीटर लंबी है। इसका उद्देश्य अंदर का निरीक्षण व रिसाव पर नजर रखना भी है, लेकिन यहां आकर एक आश्चर्य अनुभूति की यात्रा चरम सीमा पर आना स्वाभाविक हो जाती है। यहां एक सुंदर लिफ्ट गार्डन है जहां डेम के ऊपर से लिफ्ट से आने की भी व्यवस्था है। यहां 10 मेगावाट विद्युत उत्पादन का कार्य प्रगति पर है। यहां बोटिंग और वाटर गेम्स तथा पर्यटन की प्रचूर संभावनाओं की भरमार है। डेम की मछलियां भी यहां प्रसिद्घ हैं। अब हम है अंगार मोती देवी के मंदिर की ओर पहुंचते हैं। यह गंगरेल डेम से लगा हुआ अत्यंत प्रसिद्घ है। दीपावली के बाद के शुक्रवार में यहां मड़ई (मेला) लगता है, इस अंचल के नामी नाचा पार्टी इस मेले के खास आकर्षण होते हैं। यहीं गंगरेल कॉलोनी है जो गंगरेल के कर्मचारियों का निवास है। गंगरेल से 4 कि.मी. दूर खूबचंद बघेल बराज (छोटा डेम पुलिया) है जहां मुख्य नहरों को सिंचाई के लिए दिशा दी गई है। इसका दृश्य सुंदर है। यहां से 40 किमी दूरी पर मुरूमसिली (माडम) डेम ब्रिटिश गवर्नमेन्ट का बनाया साइफन स्पील व ऑटोमेटिक पद्घति का दर्शनीय है। हमारा अगला पड़ाव धमतरी है। राष्ट्रीय राजमार्ग 43 पर धमतरी छोटा किंतु नामी शहर है। यहां प्रदेश का पहली नगर पालिका है जहां कचरे से खाद तैयार किया जाता है। धान की पैदावार का सबसे महत्वपूर्ण जगह धमतरी। बिलाईमाता मंदिर यहां का सबसे बड़ा एवं महत्वपूर्ण है। धमतरी और रायपुर के बीच चलने वाली नेरो गेज छोटी रेल लाइन की रेलगाड़ी बड़ी सुंदर है। इसकी कम रफ्तार व समतल क्षेत्र से गुजरते हुए दृश्य को कैमरे में कैद करना न भूलें। दूरी- राष्ट्रीय राजमार्ग 43 पर धमतरी, रायपुर से 77 कि.मी. दूर तथा गंगरेल धमतरी से 11 किमी पर स्थित है। रायपुर से धमतरी तक के लिए छोटी लाइन रेल सेवा भी उपलब्ध है।
पड़ाव- धमतरी में सभी प्रकार की ठहरने व खाने की सुविधा है। बेहतर सुविधा के लिये रायपुर रूकना अच्छा रहता है। चल चित्र में जल चित्र का अति महत्व स्थान है। इसका रूपांकन यहां बेहतरीन तरीके से किया जा सकता है।

Sunday, December 20, 2009

छत्तीसगढ़ का इतिहास



छत्तीसगढ़
छत्तीसगढ़ भारत का एक राज्य है। छत्तीसगढ़ राज्य का गठन १ नवंबर २००० को हुआ था। यह भारत का २६वां राज्य है । भारत में दो क्षेत्र ऐसे हैं जिनका नाम विशेष कारणों से बदल गया - एक तो 'मगध' जो बौद्ध विहारों की अधिकता के कारण "बिहार" बन गया और दूसरा 'दक्षिण कौशल' जो छत्तीस गढ़ों को अपने में समाहित रखने के कारण "छत्तीसगढ़" बन गया। किन्तु ये दोनों ही क्षेत्र अत्यन्त प्राचीन काल से ही भारत को गौरवान्वित करते रहे हैं। "छत्तीसगढ़" तो वैदिक और पौराणिक काल से ही विभिन्न संस्कृतियों के विकास का केन्द्र रहा है। यहाँ के प्राचीन मन्दिर तथा उनके भग्नावशेष इंगित करते हैं कि यहाँ पर वैष्णव, शैव, शाक्त, बौद्ध के साथ ही अनेकों आर्य तथा अनार्य संस्कृतियों का विभिन्न कालों में प्रभाव रहा है।
छत्तीसगढ़ के उत्तर और उत्तर-पश्चिम में मध्यप्रदेश का रीवां संभाग, उत्तर-पूर्व में उड़ीसा और बिहार, दक्षिण में आंध्र प्रदेश और पश्चिम में महाराष्ट्र राज्य स्थित हैं। यह प्रदेश ऊँची नीची पर्वत श्रेणियों से घिरा हुआ घने जंगलों वाला राज्य है। यहाँ साल, सागौन, साजा और बीजा और बाँस के वृक्षों की अधिकता है। छत्तीसगढ़ क्षेत्र के बीच में महानदी और उसकी सहायक नदियाँ एक विशाल और उपजाऊ मैदान का निर्माण करती हैं, जो लगभग 80 कि.मी. चौड़ा और 322 कि.मी. लम्बा है। समुद्र सतह से यह मैदान करीब 300 मीटर ऊँचा है। इस मैदान के पश्चिम में महानदी तथा शिवनाथ का दोआब है। इस मैदानी क्षेत्र के भीतर हैं रायपुर, दुर्ग और बिलासपुर जिले के दक्षिणी भाग। धान की भरपूर पैदावार के कारण इसे धान का कटोरा भी कहा जाता है। मैदानी क्षेत्र के उत्तर में है मैकल पर्वत शृंखला। सरगुजा की उच्चतम भूमि ईशान कोण में है । पूर्व में उड़ीसा की छोटी-बड़ी पहाड़ियाँ हैं और आग्नेय में सिहावा के पर्वत शृंग है। दक्षिण में बस्तर भी गिरि-मालाओं से भरा हुआ है। छत्तीसगढ़ के तीन प्राकृतिक खण्ड हैं : उत्तर में सतपुड़ा, मध्य में महानदी और उसकी सहायक नदियों का मैदानी क्षेत्र और दक्षिण में बस्तर का पठार। राज्य की प्रमुख नदियाँ हैं - महानदी, शिवनाथ, खारुन, पैरी , तथा इंद्रावती नदी[
छत्तीसगढ़ का इतिहास
मुख्य लेख: रामायणकालीन छत्तीसगढ़
छत्तीसगढ़ प्राचीनकाल के दक्षिण कोशल का एक हिस्सा है और इसका इतिहास पौराणिक काल तक पीछे की ओर चला जाता है। पौराणिक काल का 'कोशल' प्रदेश, कालान्तर में 'उत्तर कोशल' और 'दक्षिण कोशल' नाम से दो भागों में विभक्त हो गया था इसी का 'दक्षिण कोशल' वर्तमान छत्तीसगढ़ कहलाता है। इस क्षेत्र के महानदी (जिसका नाम उस काल में 'चित्रोत्पला' था) का मत्स्य पुराण[क], महाभारत[ख] के भीष्म पर्व तथा ब्रह्म पुराण[ग] के भारतवर्ष वर्णन प्रकरण में उल्लेख है। वाल्मीकि रामायण में भी छत्तीसगढ़ के बीहड़ वनों तथा महानदी का स्पष्ट विवरण है। स्थित सिहावा पर्वत के आश्रम में निवास करने वाले श्रृंगी ऋषि ने ही अयोध्या में राजा दशरथ के यहाँ पुत्र्येष्टि यज्ञ करवाया था जिससे कि तीनों भाइयों सहित भगवान श्री राम का पृथ्वी पर अवतार हुआ। राम के काल में यहाँ के वनों में ऋषि-मुनि-तपस्वी आश्रम बना कर निवास करते थे और अपने वनवास की अवधि में राम यहाँ आये थे।
इतिहास में इसके प्राचीनतम उल्लेख सन 639 ई० में प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्मवेनसांग के यात्रा विवरण में मिलते हैं। उनकी यात्रा विवरण में लिखा है कि दक्षिण-कौसल की राजधानी सिरपुर थी। बौद्ध धर्म की महायान शाखा के संस्थापक बोधिसत्व नागार्जुन का आश्रम सिरपुर (श्रीपुर) में ही था। इस समय छत्तीसगढ़ पर सातवाहन वंश की एक शाखा का शासन था। महाकवि कालिदास का जन्म भी छत्तीसगढ़ में हुआ माना जाता है। प्राचीन काल में दक्षिण-कौसल के नाम से प्रसिद्ध इस प्रदेश में मौर्यों, सातवाहनों, वकाटकों, गुप्तों, राजर्षितुल्य कुल, शरभपुरीय वंशों, सोमवंशियों, नल वंशियों, कलचुरियों का शासन था। छत्तीसगढ़ में क्षेत्रीय राजवंशो का शासन भी कई जगहों पर मौजूद था। क्षेत्रिय राजवंशों में प्रमुख थे: बस्तर के नल और नाग वंश, कांकेर के सोमवंशी और कवर्धा के फणि-नाग वंशी। बिलासपुर जिले के पास स्थित कवर्धा रियासत में चौरा नाम का एक मंदिर है जिसे लोग मंडवा-महल भी कहा जाता है। इस मंदिर में सन् 1349 ई. का एक शिलालेख है जिसमें नाग वंश के राजाओं की वंशावली दी गयी है। नाग वंश के राजा रामचन्द्र ने यह लेख खुदवाया था। इस वंश के प्रथम राजा अहिराज कहे जाते हैं। भोरमदेव के क्षेत्र पर इस नागवंश का राजत्व 14 वीं सदी तक कायम रहा।१०

साहित्य
छत्तीसगढ़ साहित्यिक परम्परा के परिप्रेक्ष्य में अति समृद्ध प्रदेश है। इस जनपद का लेखन हिन्दी साहित्य के सुनहरे पृष्ठों को पुरातन समय से सजाता-संवारता रहा है। श्री प्यारेलाल गुप्त अपनी पुस्तक "प्राचीन छत्तीसगढ़" में बड़े ही रोचकता से लिखते है। [२] छत्तीसगढ़ी और अवधी दोनों का जन्म अर्धमागधी के गर्भ से आज से लगभग 1080 वर्ष पूर्व नवीं-दसवीं शताब्दी में हुआ था।"[३]
भाषा साहित्य पर और साहित्य भाषा पर अवलंबित होते है। इसीलिये भाषा और साहित्य साथ-साथ पनपते है। परन्तु हम देखते है कि छत्तीसगढ़ी लिखित साहित्य के विकास अतीत में स्पष्ट रुप में नहीं हुई है। अनेक लेखकों का मत है कि इसका कारण यह है कि अतीत में यहाँ के लेखकों ने संस्कृत भाषा को लेखन का माध्यम बनाया और छत्तीसगढ़ी के प्रति ज़रा उदासीन रहे।इसीलिए छत्तीसगढ़ी भाषा में जो साहित्य रचा गया, वह करीब एक हज़ार साल से हुआ है।
अनेक साहित्यको ने इस एक हजार वर्ष को इस प्रकार विभाजित किया है :
छत्तीसगढ़ी गाथा युग:सन् 1000 से 1500 ई. तक
छत्तीसगढ़ी भक्ति युग - मध्य काल,सन् 1500 से 1900 ई. तक
छत्तीसगढ़ी आधुनिक युग: सन् 1900 से आज तक
ये विभाजन साहित्यिक प्रवृत्तियों के अनुसार किया गया है यद्यपि प्यारेलाल गुप्त जी का कहना ठीक है कि - " साहित्य का प्रवाह अखण्डित और अव्याहत होता है।" [४]
यह विभाजन किसी प्रवृत्ति की सापेक्षिक अधिकता को देखकर किया गया है।एक और उल्लेखनीय बत यह है कि दूसरे आर्यभाषाओं के जैसे छत्तीसगढ़ी में भी मध्ययुग तक सिर्फ पद्यात्मक रचनाएँ हुई है।
संस्कृति
आदिवासी कला काफी पुरानी है । हिंदी लगभग सभी जगह बोली जाती है पर मूल भाषा छत्तीसगढ़ीहै।
लोकगीत और लोकनृत्य
छत्तीसगढ़ के गीत दिल को छु लेती है यहाँ की संस्कृति में गीत एवं नृत्य का बहुत महत्व है। इसीलिये यहाँ के लोगों में सुरीलीपन है। हर व्यक्ति थोड़े बहुत गा ही लेते है। और सुर एवं ताल में माहिर होते ही है।
यहां के गीतों में से कुछ हैं:
के
लोकगीत
भोजलीपंडवानीजस गीतभरथरी लोकगाथा • बाँस गीतगऊरा गऊरी गीतसुआ गीतछत्तीसगढ़ी प्रेम गीतदेवार गीतकरमाछत्तीसगढ़ी संस्कार के iit
छत्तीसगढ़ के लोकगीत में विविधता है, गीत अपने आकार में छोटे और गेय होते है। गीतों का प्राणतत्व है भाव प्रवणता। छत्तीसगढ़ी लोकभाषा में गीतों की अविछिन्न परम्परा है।छत्तीसगढ़ के प्रमुख और लोकप्रिय गीतों है - सुआगीत, ददरिया, करमा, डण्डा, फाग, चनौनी, बाँस गीत, राउत गीत, पंथी गीत।
सुआ, करमा, डण्डा, पंथी गीत नृत्य के साथ गाये जाते है। सुआ गीत करुण गीत है जहां नारी सुअना (तोता) की तरह बंधी हुई है। गोंड जाति की नारियाँ दीपावली के अवसर पर आंगन के बीच में पिंजरे में बंद हुआ सुआ को प्रतीक बनाकर (मिट्टी का तोता) उसकेचारो ओर गोलाकार वृत्त में नाचती गाती जाती हैं। इसालिए अगले जन्म में नारी जीवन पुन न मिलने ऐसी कामना करती है।
राऊत गीत दिपावली के समय गोवर्धन पूजा के दिन राऊत जाति के द्वारा गाया जाने वाला गीत है। यह वीर-रस से युक्त पौरुष प्रधान गीत है जिसमें लाठियो द्वारा युद्ध करते हुए गीत गाया जाता है। इसमें तुरंत दोहे बनाए जातें हैं और गोलाकार वत्त में धूमते हुए लाठी से युद्ध का अभ्यास करते है। सारे प्रसंग व नाम पौराणिक से लेकर तत्कालीन सामजिक / राजनीतिक विसंगतियों पर कटाक्ष करते हुए पौरुष प्रदर्शन करते है।

Sunday, August 23, 2009

Friday, August 14, 2009

आजादी के 62 साल बाद देश मे हर चीज नकली


आजादी के 62 साल बाद
देश मे हर चीज नकली

ये कैसा विकास है? ये कैसी तरक्की है? किस रास्ते पर जा रहा है हमारा प्यारा भारत देश? कौन है इसके लिए जिम्मेदार? कौन रोकेगा इसे? ये और इस तरह के तमाम सवाल देश के उन सभी लोगों से है जो किसी न किसी माध्यम से इस देश के साथ जुड़े हैं ,अर्थात् ये सवाल देश के सवा अरब लोगों से जिनमें देश को चलाने वाले नेता, देश का भविष्य संवारने वाले शिक्षक, देश के स्वास्थ्य की चिंता करने वाले डॉक्टर, देश को नया स्वरूप देने वाले इंजीनियर,देश का पेट भरने वाले किसान और देश के भविष्य की योजना बनाने वाले नौकरशाह सभी शामिल हैं। आजादी के इतने सालों में लिखने के लिए तो बहुत से विषय हैं लेकिन हम यहां पर देश में पांव पसार रहे नकली चीजों के कारोबार पर लोगों का ध्यान आकर्षित करना चाह रहे हैं।अनुभव करें तो आजाद भारत की उम्र जैसे-जैसे बढ़ती जा रही है वैसे-वैसे देश अंदर से खोखला होता जा रहा है। कभी शुद्धता और सौम्यता की मिसाल रहे इस देश की हर एक चीज आज नकली और मिलावटी हो गई है। देश के बाजार में नकली और मिलावटी चीजों की इतनी भरमार हो गई है कि आम आदमी का जीना दूभर हो गया है। नकली चीजें बनाने और मिलावट का कारोबार करने वाले चंद लोगोंं ने करोड़ों लोंगों की जिंदगी खतरे में डाल दी है। अपने आस पास नजर डालें तो खाने-पीने की चीजों से लेकर दैनिक उपयोग की प्रत्येक चीजें नकली हो गई है यहां तक की इन चीजों को खरीदने के लिए उपयोग किया जाने वाला नोट तक नकली बन चुका है। पाकिस्तान और पड़ोसी मुल्क के कुछ कारोबारियों ने भारत के भीतर इतनी अधिक मात्रा में जाली नोटों का जाल फैला दिया है कि वो देश की आर्थिक स्थिति को खोखला करने में महत्वपूर्ण हथियार साबित हो रहा है। नकली सामान,नकली खाद्य पदार्थ और नकली नोट देश के कोने-कोने में पहुंच चुके हैं। नकली समान से लोगों को आर्थिक क्षति,नकली खाद्य पदार्थ से लोगों को शारीरिक क्षति और नकली नोटों से देश को आर्थिक क्षति पहुंच रही है। क्या हमारे पुर्वजों ने देश की आजादी की मांग इन्हीं सब चीजों के लिए की थी ताकि विकास और तरक्की के नाम पर हमें नकली चीेजों का सामना करना पड़े। यदि नकली नोटों, दवाइयों, खाद्य पदार्थों एवं जरूरत की अन्य सामानों का कारोबार देश के भीतर इसी तेजी से फैलता रहा तो देश अंदर से इतना खोखला हो जाएगा कि एक दिन पूरा भारत नकली सामानों से पट जाएगा और नकली नोटों के कारण देश आर्थिक रुप से कमजोर हो जाएगा। आज हम अपने देश के भीतर अपने ही कुछ लोगों की कार गुजारियों के गुलाम बनकर रह गए हैं, हमारी जिंदगी चंद-लालची लोगों के हाथों में है जो मिलावट कर रातों-रात मालामाल हो रहे हैं। यदि हमारा देश आजाद है? देश में लोकतंत्र है? देश में कानून व्यवस्था है? तो देश की छाती पर बैठकर मूंग दलने वाले अर्थात देश के भीतर बैठकर देश भर में तमाम नकली चीजें फैलाने वाले लोगों पर सरकार इतनी नरम क्यों है? हाथ में आने के बाद भी हमारी पुलिस ऐसे लोगों के आकाओं तक क्यों नहीं पहुंच पाती? सरकार को चाहिए कि नकली चीजों का कारोबार करने वाले ऐसे लोगों को देशद्रोही करार देकर इनके खिलाफ कड़ी सजा का प्रावधान रखना चाहिए जिससे इस तरह देश के भीतर जहर घोलने वाले दूसरे लोगों के लिए यह एक सबक हो।
क्या-क्या नकली-
नोट- 100, 500, 1000 के नकली नोटों का जाल
खाद्य पदार्थ- तेल, घी, दूध, मक्खन, खोवा, आइसक्रीम, बिस्किट, चॉकलेट।
कई प्रकार की दवाईयां
आटोमोबाइल में टू-व्हीलर,फोर व्हीलर के तमाम नकली पार्ट्स
इलेक्ट्रीकल्स, इलेक्ट्रानिक्स की तमाम चीजों के नकली माल बाजार में उपलब्ध
ब्रांडेड कंपनियों के नकली कपड़े
विभिन्न यूनिवर्सिटी/ कालेजों के नकली मार्कशीट
टू-व्हीलर/ फोर व्हीलर के ड्राइविंग लायसेंस एवं कागजात
चेहरे पर लगाने वाले क्रीम, पाउडर, हेयर आयल इत्यादि।
क्या हानियां-
नकली चीजें खाने से जानलेवा बीमारियों का खतरा
इनसे आज मनुष्य की औसत उम्र में कमी
विकास में बाधक, विनाश में सहायक।
ऐसे हो बचाव-
सरकार को चाहिए कि वर्तमान में उपलब्ध तमाम नकली पदार्थों को मापने और जांचने परखने का मानक तैयार कर इसे सीधे आम जनता तक पहुंजाया जाना चाहिए जिससे जनता पहचान सके कि कौन सी चीज नकली है और कौन सी असली। अभी तक सरकार नकली नोटों की पहचान के लिए ही जनजागरण अभियान चला रही है। सरकार को ऐसा ही जनजागरण सभी चीजों के लिए चलाया जाना चाहिए।

Thursday, August 13, 2009

पैसों के पैसा बनाने का खेल




रायपुर में खुलेआम हो रही है


सिक्कों की कालाबाजारी


सिक्कों की कालाबाजारी राजधानी सहित जिले के कुछ हिस्सों में जोरों पर है। शहर के नामी इलाकों में कुछ ऐसे लोग हैं जो कमीशन पर सिक्कों का व्यवसाय कर रहे हैं। पैसे से पैसा बनाने के इस खेल के बीच ऐसे लोग तो लाल हो रहे हैं लेकिन इसका दुष्परिणाम आम लोगों और छोटे व्यापारियों की भुगतना पड़ रहा है। छोटे व्यापारी भी बैंकों से सिक्के नहीं मिलने के कारण ऐसे लोगों से कमीशन में सिक्के लेने को मजबूर हैं। इसी मजबूरी के कारण वे अपनी थोड़ी-बहुत कमाई चिल्हर की खरीदी में लुटा देते हैं। बाजार में हालात ये हंै कि अब एक दो रुपए के सिक्के तो दूर पांच के सिक्कों की भी शार्टेज हो गई है। जानकारों की मानें तो आरबीआई द्वारा जारी किए गए सिक्के की क्वालिटी काफी बेहतर होती है जिसका उपयोग कुछ लोगों द्वारा गलाकर बेचने में किया जाता है। बताते हैं कि इससे काफी बढिय़ा क्वालिटी की आर्टिफिशियल ज्वेलरी बनाई जाती है। जिसकी अच्छी कीमत उन्हें मिल जाती है एक विशेष वर्ग सिर्फ इसी काम में लगा हुआ है। इसके अलावा सिक्के खपाने वाला एक गिरोह जरुरत मंदों को 10 से 15 प्रतिशत कमीशन पर सिक्के उपलब्ध करवाता है। सूत्र बताते हैं कि ऐसे लोगों के पास बैकों से मिले सौ सिक्कों की पाउच आसानी से मिल जाती है,इसके लिए सिर्फ उन्हें उसके एवज में ज्यादा रुपए देने होते हैं। गोलबाजार और मौदहापारा थाना क्षेत्र में यह व्यापार खुलेआम संचालित है। कुछ व्यापारियों ने बताया कि एक रुपए के सिक्के के लिए उन्हें ज्यादा पैसे देने होते हैं जबकि पांच रुपए के सिक्के एक रुपए के सिक्के की तुलना में कम कमीशन पर उपलब्ध हो जाते हैं। बैंकों की मानें तो उनके पास आने वाले सिक्के चेम्बर आफ कामर्स के माध्यम से व्यापारियों तक पहुंचते हैं और किस व्यापारी को कितने सिक्के चेम्बर द्वारा दिए गए हैं इसकी लिस्टिंग बैंक के पास जमा की जाती है। लेकिन छोटे व्यापारियों को जिन्हें चेम्बर से सिक्के नहीं मिल पाते उन्हें बैंक से सिक्के देने का प्रावधान है पर छोटे व्यापारियों की मानें तो बैंकों द्वारा उन्हें सिक्के नहीं मिल पाते और ना ही उन्हें सिक्के वाली मशीन से सिक्के उपलब्ध हो पाते हैं। जिससे मजबूरन ऐसे लोगों से ज्यादा दाम में उन्हें व्यावसायिक उपयोग के लिए सिक्के खरीदने पड़ते हैं।


एक नजर कमीशन पर
पुराने सिक्के- 5 से 8 प्रतिशत
नए सिक्के - 10 से 12 प्रतिशत
एक रुपए - सबसे महंगा
दो रुपए -सामान्य
पांच रुपए - कम प्रतिशत पर उपलब्ध


चेम्बर में शिकायत करें- श्रीचंद

चेम्बर आफ कामर्स के अध्यक्ष श्रीचंद सुंदरानी ने कहा कि व्यापारियों को नियमत: सिक्के प्रदान किए जाते हैं लेकिन इस तरह का काम हो रहा है तो गलत है। शहर के किसी भी व्यापारी द्वारा इसकी शिकायत चेम्बर के पास की जाएगी तो निश्चित तौर पर ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।


आवश्यक्ता से अधिक सिक्के नहीं- राव


एसबीआई के उपप्रबंधक रोकड़ चिन्नाराव के मुताबिक सिक्के का आबंटन चेम्बर के माध्यम से व्यापारियों को किया जाता है और आरबीआई के दिशा निर्देश के मुताबिक किसी भी एक व्यापारी को आवश्यक्ता से अधिक सिक्के नहीं दिए जाते क्योकि इससे सिक्के की कालाबाजारी हो सकती है। छोटे व्यापारियों को भी बैकों के माध्यम से सिक्के दिए जाते हैं।


शिकायत पर होगी कार्रवाई- अमित कुमार

एसपी रायपुर अमित कुमार का कहना है कि यदि इस तरह के किसी मामले की शिकायत पुलिस के पास आती है तो उस पर जरुर कार्रवाई की जाएगी।

Wednesday, July 29, 2009

पैसों के लिए कुछ भी करेगा...

पैसों के लिए कुछ भी करेगा...


रियालिटी शो सच का सामना
देखकर ही पस्त हुए कई नामचीन

स्टार टीवी द्वारा प्रसारित किया जाने वाला रियालिटी शो सच का सामना जितनी तेजी से प्रचारित हो रहा है उतनी ही तेजी से उसका विरोध भी शुरु हुआ है। इस शो में पूछे जाने वाले प्रश्नों के एक-एक जवाब के साथ आप अपनों के दिलों से दूर और पैसों के नजदीक आते जाएंगे। अभी हाल में सच का सामना करने पहुंचे पूर्व क्रि केटर और वर्तमान के एक्टर विनोद कांबली ने मात्र दस लाख तक पहुंचने के लिए एक ऐसी कड़वी बात कह डाली जिसने उसे अपने सबसे अजीज और करीबी माने जाने वाले दोस्त तथा दुनिया के बेहतरीन बल्लेबाज सचिन तेंदुलकर के दिल में खटास भर दी। मात्र दस लाख के लिए उसने अपने बचपन की दोस्ती और सबसे अनमोल रिश्ता कुर्बान कर दिया। एकमात्र कांबली ही इसका उदाहरण नहीं है बल्कि जो भी अभी तक उस शो में आया है उन पर ऐसे सवाल दागे गए जिनके जवाब उनके रिश्तों की डोर को कमजोर करती चली गई। इस मंच पर आने वाला प्रतिभागी अपने सिर पर कफन बांध कर आता है. क्यों कि अपनी पत्नी, बच्चों,भाईयों और माता-पिता के सामने बैठकर उसे जो जबाव देने हैं वो वहां बैठे किसी भी रिश्ते को खत्म करने के लिए काफी है। कार्यक्रम को देखने और समझने से एक बात तो स्पष्ट हो जाती है कि तेजी से विकास की ओर बढ़ रही पृथ्वी के भारत देश में भी कुछ ऐसे लोग हैं जिन्हें पैसों के आगे अपने अनमोल रिश्ते-नातों की कोई परवाह नहीं है। यानि वे सच का सामना करने यह उद्देश्य लेकर पहुंचे हों कि पैसों के लिए तो कुछ भी करेगा। यह बात तो स्टार चैनल वालों को भी कबूलनी होगी कि इस कार्यक्रम के प्रसारित होने के बाद चैनल की टीआरपी में काफी इजाफा हुआ है। क्योंकि इस कार्यक्रम में आने वाले प्रतिभागी से ऐसे सवाल किए जाते हैं जो देखने और सुनने में तो काफी अच्छा लगते है क्योंकि आज हर इंसान को दूसरों के बारे में ऐसी बातें जानने में काफी रूचि होती है जो दूसरों की निजी जिंदगी को प्रभावित करती है। लेकिन क्या किसी के जीवन से जुड़ी तमाम बातों को करोड़ों लोगों के सामने बताकर टीवी चैनलों द्वारा पैसे कमाना सही है? क्या अपने जीवनभर की सच्चाई और कमजोर रिश्तों को मात्र चंद रुपयों की खातिर कैमरे के सामने कहना सही है। सच कड़वा होता है सही है लेकिन इतना कड़वा सच भी किस काम का जिससे बसी बसाई गृह्स्थी,दोस्त-यार,और तमाम रिश्ते तलवार की नोक पर रख दिए जाएं?

Sunday, July 26, 2009

राज्य में अब डीजी नक्सल आपरेशन ?

राज्य में अब डीजी नक्सल आपरेशन ?

नक्सल समस्या से निपटने बन रही रणनीति

जेल और होमगार्ड को एक करने की कवायद

राज्य की नक्सल समस्या को ध्यान में रखते हुए अब जल्द ही डीजी नक्सल का पद सृजित किया जाएगा। इसके लिए प्रशासनिक स्तर पर कवायद शुरु हो गई है। बढ़ती नक्सल समस्या पर लगाम कसने और नक्सल मामले से जुड़ी पुलिसिंग की कार्यप्रणाली की कमान अलग करने के लिए इसे राज्य सरकार की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। ज्ञात हो कि मदनवाड़ा घटना के दो दिन बाद ही नक्सल आपरेशन की कमान एडीजी रामनिवास को दी गई थी। इसके पूर्व नक्सल आपरेशन की कमान आईजी स्तर के अधिकारी ही संभाला करते थे। सूत्रों के मुताबिक नक्सल मामलों पर सरकार गंभीरता से विचार कर रही है इसे देखते हुए कुछ दिनों पहले ही गृह विभाग ने एसपी नक्सल आपरेशन का पद सृजित किया है जिसमें एएसपी स्तर के अधिकारियों की पदस्थापना की गई है। पिछले कुछ सालों से लगातार बढ़ रही नक्सली घटनाओं और वर्तमान में मदनवाड़ा घटना के बाद विपक्षी पार्टी कांग्रेस द्वारा विधानसभा सत्र के दौरान सदन के भीतर और बाहर किए गए हंगामे के बाद से राज्य सरकार कुछ दबाव में है। मदनवाड़ा घटना के लिए कांग्रेसी नेताओं ने डीजीपी की भूमिका पर भी सवाल उठाए थे। विश्वस्त सूत्रों की मानें तो इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए राज्य के गृह विभाग ने इस विकराल समस्या से निपटने के लिए एक नया पद सृजित करने का सुझाव सरकार को दिया है,जिसे डीजी नक्सल आपरेशन नाम दिया जाएगा। इस पद का कार्यक्षेत्र भी व्यापक होगा। बताते हैं कि इस पद के लिए राज्य के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों के नामों की भी चर्चा है जिसमें पूर्व में डीजीपी पद की दौड़ में सबसे आगे रहे एसके पासवान का नाम प्रमुख है। सूत्रों के मुताबिक डीजी नक्सल के लिए राजीव माथुर और प्रवीर महेन्दु के नामों की भी चर्चा है । यदि डीजी नक्सल आपरेशन को सरकार की हरी झंडी मिल जाती है तो माना जा रहा है कि एसके पासवान ही डीजी नक्सल आपरेशन की कमान संभालेंगे। वर्तमान में वे अभी डीजी जेल हैं। सूत्रों का कहना है कि श्री पासवान को डीजी नक्सल बनाए जाने के बाद पूर्व की भांति ही जेल और होमगार्ड की कमान एक ही डीजी के पास होगा। ज्ञात हो कि वर्तमान में अनिल नवानी डीजी होमगार्ड हैं जो डीजी नक्सल पद लागू हो जाने के बाद जेल की कमान भी संभालेंगे। माना जा रहा है कि इस पद के सृजन से नक्सली क्षेत्र में काम कर रहे पुलिस के जवानों को एक बेहतर नेतृत्व प्राप्त होगा। इससे नक्सली क्षेत्र में काम कर रहे जवानों को होने वाली परेशानियों का निपटारा जल्द हो जाएगा साथ ही उन्हें उचित सुविधाएं सही समय पर उपलब्ध हो जाएगी, साथ ही सामान्य पुलिसिंग की कार्यप्रणाली से उन्हें अलग काम करने का मौका मिलेगा। जिससे निश्चित ही बेहतर परिणाम सामने आएंगे।

राज्य में अब डीजी नक्सल आपरेशन ?


राज्य में अब
डीजी नक्सल
आपरेशन ?

Tuesday, July 21, 2009

रमन के लड़के का हो गया सलेक्शन

रमन के लड़के

का हो गया

सलेक्शन

परीक्षा दिए बिना ही आया सेकेंड रैंक

Wednesday, July 15, 2009

...डूबने से बचेगा कैसे ?


...डूबने से बचेगा कैसे ?


राजधानी रायपुर में मात्र एक दिन की जोरदार बारिश ने ऐसा कहर बरपाया कि आम जनता से लेकर प्रशासन का हर जिम्मेदार अफसर आंहे भरता नजर आया। शहर की सबसे व्यस्त एवं प्रमुख सडकों का ये हाल था जैसे किसी गांव खेड़े की सड़कों का होता है। शहर की सभी सड़कें तालाबों में बदल गई थी। इन सड़कों से गुजरने वाले लोगों की वाहनें पानी भरने के कारण बंद हो गईं। रात की बारिश और सड़कों पर पानी,गाड़ी खराब हो जाए तो सिवाय भुगतने के और कुछ भी नहीं। शहर के भीतर और बाहर(आउटर) में गुजर बसर करने वाले चाहे वो कालोनी के मकान हों, चाहे किसी गली या मुहल्ले के,सभी बारिश की झमाझम से परेशान दिखे। किसी ने लाखों,करोड़ों खर्च कर,तो किसी ने हजारों, लाखों में अपना आशियाना बनाया है, पर सभी अपने घरों में पानी भरने से परेशान रहे। घर में आरामदायक बिस्तर,सोफा सहित तमाम सुविधाएं होने के बाद भी वे आंखों ही आंखों में रात गुजारने को मजबूर दिखे। दिन में भी कभी काम ना करने वाले लोग रात को आई इस आफत से बचने कुदाल,फावड़ा लेकर जद्दोजहद करते दिख गए। अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने वाले वे लोग अचानक बरसने वाली इस मुसीबत के लिए शासन,प्रशासन को कोसते भी नजर आए। वैसे अभी इस परेशानी को राजधानी के लिए शुरुआत मान सकते हैं। क्योंकि आने वाले आठ-दस सालों तक और यहां के लोग यदि इसी तरह शहर का बारह बजाते रहे तो कुछ कालोनियों, कुछ बस्तियों और कुछ सड़कों तक हाहाकार मचाने वाली पानी पूरे रायपुर शहर को ले डूबेगी। क्योंकि शहर के मुहल्लों और कालोनियों में कभी मुरम की दिखने वाली सड़कों को आज पूरी तरह से कांक्रीट में बदल दिया गया है। अब कांक्रीट,पानी सोंके तो सोंके कैसे? बारिश से गिरने वाला जल जमीन के भीतर जाए तो जाए कैसे? शासन और प्रशासन में बैठे कुछ लोग कमीशन के चक्कर में पूरे शहर की जमीन को पत्थर में बदल चुके हैं और लगातार शहर में तेजी से इस तरह के काम को अंजाम देने में लगे हैं। प्रशासन के जिम्मेदार चाहें तो इस पर रोक लगाकर आने वाले समय में होने वाली मुसीबत से लोगों को बचा सकते हैं। इसके लिए आम लोगों को भी सामने आना होगा। मकान और कालोनियों का निर्माण विकास के लिए सही है लेकिन प्रकृति के साथ खिलवाड़ करके ऐसा विकास हमें कहां ले जाएगा? समय के साथ लगातार बदल रही राजधानी की जनसंख्या पिछले कुछ वर्षों में सबसे ज्यादा बढ़ी है। जनसंख्या बढऩे के कारण शहर के क्षेत्रफल में भी काफी इजाफा हुआ है। शहर के आसपास कभी खेतों की शक्ल में दिखने वाली जमीनें अब कालोनियों और बस्तियों में तब्दील हो चुकी हैं। जाहिर है इसके लिए पेड़ों के साथ जमीनों को भी कुर्बान किया गया होगा। अब जब जमीन ही नहीं होगी,पेड़ ही नहीं होंगे तो मिट्टी का कटाव कहां से होगा,मिट्टी की जमीन ही नही होगी तो पानी धरती के भीतर जाएगी कैसे? तेजी से विकसित हो रहे शहर में बड़े-बड़े कांक्रीट के जंगल उग आए हैं मिट्टीनुमा धरती समाप्त होती जा रही है, जमीन का स्थान कांक्रीटों ने ले लिया है। आखिरकार ऐसे मे कब तक हम प्रकृति से सहायता की उम्मीद कर सकते हैं प्रकृति से खिलवाड़ करने वालों को तो प्रकृति ही सबक सिखाएगी ना... तो ऐसे में जनाब रायपुर डूबने से बचेगा कैसे?

doobane se bachega kaise ?

doobane se bachega kaise ?


Tuesday, July 14, 2009

बंद क्यों ?

बंद क्यों ?

किसी भी मामले पर विरोध प्रदर्शन करने के लिए विपक्षी पार्टी, छोटे दलों या व्यापारिक संगठनों द्वारा सस्ता,सुंदर और मीडिया में आसानी से आने के लिए एक रास्ता निकाल लिया गया है बंद का। बंद मतलब,काम बंद,दैनिक जरुरतों की चीजों से लेकर आम लोगों के जीवन चक्र से जुड़ी तमाम चीजें बंद। ठीक है विरोध प्रदर्शन अच्छी बात है लेकिन विरोध प्रदर्शन करने के लिए बंद का स्वरुप ऐसा होना चाहिए जिससे वह संस्था,पार्टी या व्यक्ति सबसे ज्यादा प्रभावित हो जिसका विरोध किया जा रहा है। गौर करें तो बंद हमेशा सरकार की गलत कार्यप्रणाली या किसी मामले पर सरकार की असफलता के विरोध में किया जाता है। लेकिन बंद के दौरान सिर्फ सरकारी दफ्तरों को छोड़ सब कुछ बंद रहता है। यहां पर सोचने और देखने वाली बात यह है कि जब सरकार के विरोध में बंद करवाया जाता है तो आम लोगों को इससे सबसे ज्यादा परेशानी झेलनी पड़ती है। बल्कि होना यह चाहिए कि बंद करवाने वाली पार्टियों या संस्थाओं को नेताओं और सरकार से जुड़े हुए लोगों को परेशान करना चाहिए,सरकारी दफ्तरों में ताला जडऩा चाहिए। सत्ताधारी पार्टी के नेताओं को अपने घरों से निकलने नहीं देना चाहिए। हालिया घटित घटना के विरोध में बंद किया भी गया तो सरकार के विरोध में। बंद के दौरान छग सरकार को भी जमकर कोसा गया लेकिन जरुरत है जिन्होंने(नक्सलियों ने) इस घटना को अंजाम दिया उसके विरोध में आवाज बुलंद करने की। उनके बढ़ते कदमों को रोकने के लिए सामूहिक प्रयास करने की। सिर्फ आम आदमी के पेट पर लात मारकर बंद को किस तरह से सफल बनाया जा सकता है? बंद की सफलता असफलता पर ध्यान दें तो बंद से ना तो व्यापारी वर्ग को नुकसान होता है, ना तो नेताओं को नुकसान होता और ना ही हाई प्रोफाइल लोगों को नुकसान होता है, बंद से नुकसान होता है तो केवल गरीबों और निम्न मध्यमवर्गीय परिवारों को,जो रोज काम करने के एवज खाना खा सकते हैं। अब बंद करवाकर इसे सफल बताने वाले लोग क्या गरीबों की पेट पर लात मारकर इसे सफल बता सकते हैं। बंद करवाने से किसी को क्या मिल गया होगा? यदि बंद को सार्थक करना है तो आने वाले समय में आम लोगों के हितों की रक्षा के दावे करने वाले नेताओं को बंद की परिभाषा बदलनी पड़ेगी।

बंद क्यों ?