Saturday, April 9, 2011

झुकती है दुनिया झुकाने वाला चाहिए

अन्ना ने सरकार को झुका कर जता दिया कि यदि दृढ़ इच्छा शक्ति हो तो कोई भी काम मुश्किल नहीं है. लेकिन इसके लिए जरुरी है आपकी भावना अच्छी हो. अच्छे उदेश्यों को लेकर कोई भी काम शुरू करने से लेकर आदमी को जिझकना नहीं चाहिए. हर अच्छे काम की ओर लोग भले ही धीरे-धीरे आकर्षित होते है लेकिन जब वो आपके साथ खड़े हो जाते है तो उनसे अधिक शक्ति किसी में नहीं होती. अन्ना के समर्थन में देश भर से उठे हजारों हाथों ने यह तो साबित कर दिया की भारत के लोगों में अभी भी इंसानियत और सच्चाई बाकी है. आज भले ही हर जगह मार-काट,चोरी,लूट,डकैती,हत्या,बलात्कार हो रहे है. पर आज भी अनेकता में एकता भारतीय संस्कृति की विशेषता है. लोगों के भीतर जागरूकता की कमी नहीं है उन्हें समय पर जगाने वालों की जरुरत है. जब लोकपाल बिल के समर्थन में इतनी बड़ी आंधी देश भर से आई तो क्या बदती महंगाई और अंधेरगर्दी तथा घूसखोरी और भ्रष्टाचार को रोकने के लिए देश भर से एक आवाज़ नहीं आ सकती? यदि इसपर भी लोग अपनी जिम्मेदारी समझ जाए तो देश का भला हो जायेगा. देश में फिर से शांति और समानता स्थापित हो जाएगी. १२१ करोड़ में से आधी आबादी भी इस तरह के जनहित के मुद्दों पर अपनी एकता दिखाए तो भारत फिर से सोने की चिड़िया बन जायेगा. 

Monday, March 28, 2011

देश में 12 फीसदी बढ़ गए बाघ


लगभग नौ करोड़ रुपए के खर्च से वनविभाग के 4.76 लाख कर्मचारियों ने अनुमान लगाया है कि भारत में बाघों की संख्या पिछले चार साल में 1411 से बढ़कर 1706 हो गई है. इस तरह बाघों की संख्या में 295 की वृद्धि हुई है. ये आंकड़े दिल्ली में आयोजित बाघ संरक्षण पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में जारी किए गए हैं. पिछली बार बाघों की गणना 2006 में की गई थी और उसके बाद ताज़ा आंकड़े 2010 की गिनती के बाद आए हैं.इस संख्या में सुंदरबन में गिने गए 70 बाघ भी शामिल हैं जिन्हे 2006 में नहीं गिना गया था.

देश में इस साल बाघों की संख्या बढ़कर 1,706 हो गई है। अगर सुन्दरबन में मौजूद बाघों की संख्या को अलग कर दिया जाए तो इसकी संख्या में 12 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। सुन्दरबन में 70 बाघ हैं। बाघ गणना सूची के अनुसार गंगा के मैदानी भागों में बाघों की संख्या 353, मध्य व पूर्वी हिस्सों में 601,पश्चिमी भाग में 534, पूर्वोत्तर के पहाड़ी और ब्रह्मपुत्र के बाढ़ वाले इलाकों में 148 व सुन्दरवन में 70 बताई गई है। वर्ष 2006 की गणना में देशभर में बाघों की संख्या 1,411 थी जिसमें सुन्दरबन में मौजूद इनकी संख्या को शामिल नहीं किया गया था। देश में दो दशक पहले बाघों की संख्या 3,000 थी।


कुल संख्या से अगर सुन्दरबन में मौजूद बाघों की संख्या को छोड़ दिया जाय तो इस साल बाघों की संख्या 12 फीसदी बढ़कर 1,636 तक पहुंच गई है। वर्ष 2006 में यह आंकड़ा 1,411 था। सुन्दरबन में फिलहाल 70 बाघ हैं। एक अंतरसरकारी संगठन 'ग्लोबल टाइगर फोरम' (जीटीएफ) की मदद से सम्मेलन का आयोजन किया जा रहा है। जीटीएफ के राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) और विश्व बैंक का 'ग्लोबल टाइगर इनीशिएटीव'(जीआईटी) सदस्य हैं।

पिछले साल रूस के पीर्ट्सबर्ग में आयोजित सम्मेलन के बाद भारत में इसका आयोजन हो रहा है। इस दौरान 'ग्लोबल टाइगर रिकवरी प्रोग्राम' (जीटीआरपी) को लागू करने सहित बाघों के संरक्षण की चुनौतियों, योजनाओं और उसकी प्राथमिकताओं पर चर्चा होगी। वर्ष 2022 तक बाघों की संख्या दोगुना करने का लक्ष्य है।

महाराष्ट्र, उत्तराखंड, असम, कर्नाटक में वृद्धि

ये आंकड़े भारत के वन और पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने पेश किए हैं. आंकड़ों को पेश करते हुए जयराम रमेश ने कहा, "भारत के तराई क्षेत्र और दक्षिण भारत में बाघों की संख्या में बढ़ोतरी होना काफ़ी सकारात्मक संकेत है. हालांकि मध्य भारत और पूर्वोत्तर भारत के इलाकों में उपलब्ध क्षेत्र के मुकाबले वहाँ बाघों की संख्या काफ़ी कम है जो चिंता का विषय है.

Sunday, March 27, 2011

पांच साल पहले,पांच हजार की नौकरी करने वाला पांच साल बाद पांच अरब का मालिक

छत्तीसगढ़ में आना, खाना, कमाना और यहाँ के लोगों लूटकर ले जाना कोई नई बात नहीं है. राज्य बनने के बाद से यहाँ सिर्फ और सिर्फ ठगों का ही राज्य रहा है. पिछले दस साल के रिकार्ड को खंगाले तो पता चल जायेगा की जितने यहाँ के लोगों की भलाई में खर्च नहीं किया गया होगा उतना तो बाहर से आने वाले ठगों ने लूट लिया होगा. कभी चिटफंड कंपनी के नाम पर तो कभी फिनांस के नाम पर तो कभी दुगुना फायदा का लालच देकर. हर तरह से यहाँ की भोली-भली जनता को लूटा गया है. अभी हाल ही में लूट का एक नया तरीका सामने आया है. इसमें पहले स्कूल के माध्यम से फिर स्कूल के कुछ पैसों को मीडिया में इन्वेस्ट कर ठग ने ऐसा मायाजाल बुना कि राज्य का हर छोटा-बड़ा उसके चाल में फंसता चला गया. कभी भगवत कथा के नाम पर तो कभी कोई बड़ा आयोजन कर उस ठग ने प्रदेश के मुखिया को भी अपने दरवाजे पर लाता रहा. छत्तीसगढ़ में लगभग पांच-छह साल पहले आया राजेश शर्मा नाम ने कुछ इसी तरह प्रदेश भर के लोगो को ठग लिया. बताते है कि राजेश शर्मा ने एक टीचर के रूप में अपना काम शुरू किया था. फिर अचानक उसने डालफिन के नाम से एक स्कूल खोल लिया. पर एक स्कूल के बाद उनसे लगातार प्रदेश के हर बड़े कस्बों में अपना स्कूल खोलना प्रारंभ किया. स्कूल की संख्या बढाने के साथ ही उसने मीडिया में पैर जमाना चाहा. नेशनल लुक नाम से सांध्य दैनिक अखबार प्राम्भ किया. राजधानी में पत्रकारिता के उन तमाम नामो को उसमे शामिल किया जो राजधानी रायपुर में चल चुका था.  एक साल बाद ही उसे बंद कर ऑफिस कापी के रूप में चलता रहा. लेकिन  कम होते प्रभाव को देख उसने एक बार फिर अपने उसी अखबार को नए रूप में जिन्दा करने की तैयारी की और इस बार पिछली बार से भी ज्यादा ताकत के साथ. इस बार उस राजेश शर्मा ने रायपुर भास्कर की सबसे मजबूत टीम को तोड़कर वह कई सालों से अपनी सेवाए दे रहे पत्रकारों को अपने नेशनल लुक में शामिल किया. जिसने जितना चाहा उसे उतना पैसा दिया गया. इस बार मानो उसने तय कर लिया रहा हो कि जितना वो पेमेंट में खर्च करेगा उससे ज्यादा वो उनका दुरूपयोग कर कम लेगा. और हुआ भी यही, २०१० तक उसके एक भी स्कूल कि राज्य से मान्यता नहीं थी लेकिन मीडिया का दुरुपयोग कर उसने सिर्फ एक साल में ही ३० स्कूलों कि मान्यता हासिल कर ली. उसने स्कूल कि आड़ में एक मुस्त रकम लेने कि जो योजना बनाई उसी सी उसने २०० से ३०० करोड़ बना लिया. इसके अलावा बाज़ार से भी करोडो उठाये. बताते है कि  ये इसलिए सामने नहीं आ पा रहा है क्योंकि उसने कई लोगों कि ब्लैक मनी को वाईट करने का झांसा देकर लिया था. यदि कोई शिकायत लेकर गया तो पहले उसे उसका हिसाब देना पड़ जायेगा. राजेश शर्मा अब फरार हो गया है. स्कूल में पड़ने वाले बच्चों के भविष्य का भगवान ही मालिक है. मीडिया में काम करने वाले तो नौकरी खोज रहे है लेकिन दुःख तो इस बात का हो रहा है कि मीडिया के नामी लोगों को ठग कर गायब हो जाने वाला अब तक उतना प्रचारित नहीं हो पाया है जितना उसे करना चाहिए था. मीडिया के वे लोग चाहते तो एक हफ्ते के  भीतर देश के किसी भी कोने से खोज निकलते पर किसी भी पत्रकार ने ऐसा नहीं किया. वास्तविकता तो यह है कि सबसे मजबूत माने जाने वाले स्तम्भ आज सबसे कमजोर हो चुका है. दबे कुचले लोगों कि आवाज़ होने का दिखावा करने वाले खुद कितने दबे कुचले है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कोई उनसे गद्दारी कर गया और वे चुप बैठे रह गए. जो लोग अपने लिए आवाज़ नहीं उठा सकते वे किसी दुसरे के लिए कैसे आवाज़ उठाने का दंभ भरते है. या तो वे अँधेरे में है या फिर उन्हें उजाला पसंद ही नहीं है. खैर अब वापस टापिक पर आते है   पांच साल पहले,पांच हजार की नौकरी करने वाला पांच साल बाद पांच अरब का मालिक कैसे बन गया. इसके लिए उसने वो सब किया जो किसी को भी आसानी से आकर्षित करने के लिए काफी था. हर छोटा कार्यक्रम बड़े और महंगे होटल में करवा कर उसने अपने आप को बहुत ही कम समय में इतना हाई प्रोफाइल बना लिया जिसके लिए लोगों को सालों लग जाते है. मीडिया का दुरुपयोग कैसे कर सकते है ये एक मिसाल है. राजेश शर्मा नाम का व्यक्ति हर वो काम कर लेना चाहता था जिसमे उसे आसानी से पैसा मिल जाए. फिल्म इंडस्ट्री में भी उनसे पैसा लगाया. भोजपुरी हीरो रविकिसन को लेकर फिल्म बना रहा था. एक फिल्म महतारी बना भी चुका है. बताते है कि उसके कई कलाकारों को आज तक पैसा ही नहीं मिला है. जो चेक मिला था वह बौंसा हो गया. धोखा देने के वो हर हथकंडे उसने अपनाये जो एक ठग अपना सकता है. जो पुलिस कभी उसे इज्जत देकर गुजर जाती थी आज वो यहाँ वहां उसकी तलाश में भटक रही है. आज राजेश शर्मा के नाम पर इनाम भी घोषित हो चुका है. पर कई अनसुलझे सवाल इसके पीछे छुपे है जो कही पहेली न बन जाए. ............

Thursday, March 10, 2011

इंडियन बैंकों में भी ब्लैक मनी?


इंडियन बैंकों में भी ब्लैक मनी?
यह जानकार हैरानी होगी कि इंडियन बैंकों में ऐसे अरबों रुपये पड़े हैं जिन पर किसी ने दावा नहीं कियाहै। ये कई सालों से बिना किसी दावे के बैंकों में जमाहैं। एक आरटीआई के जवाब में इसका खुलासा हुआ है। आरटीआई एक्टिविस्ट सुभाष चंद्र अग्रवाल ने इस संबंध में आरटीआई अर्जी डाली थी जिसके जवाब में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने बताया कि भारतीय बैंकों में 13 अरब से ज्यादा ऐसे रुपये हैं जिन पर किसी ने दावा नहीं किया और ये 10 साल पुरानेहैं। 31 दिसंबर 2009 को बैंकों में इस तरह के 13,60, 31,59,646.89 रुपये अनक्लेम्ड हैं। इसमेंफॉरेन बैंकों में 473167698 रुपये और दूसरे प्राइवेट बैंकों में 150323106 रुपये हैं। बाकी के पब्लिकसेक्टर के बैंकों में हैं। आवेदन के जवाब में कहा गया कि ऐसी कोई स्कीम नहीं है जिसके तहत बैंकोंमें पड़ी ऐसी रकम को जिस पर कोई दावा न करें एक निश्चित समय के बाद सरकारी अकाउंट मेंट्रांसफर कर दिया जाए। 
आरबीआई के मुताबिक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में 1047223 अकाउंट में 881584887 रुपये स्टेटबैंक ऑफ बीकानेर ऐंड जयपुर में 75261 अकाउंट में 144361403 रुपये स्टेट बैंक ऑफ हैदराबाद में86311 अकाउंट में 85966644 रुपये स्टेट बैंक ऑफ इंदौर में 40114 अकाउंट में 88583351 रुपये ,स्टेट बैंक ऑफ मैसूर में 122628 अकाउंट में 300340111 रुपये स्टेट बैंक ऑफ पटियाला में 532अकाउंट में 3513378 रुपये एचडीएफसी बैंक में 2500 अकाउंट में 18994831 रुपये ,आईसीआईसीआई बैंक में 90094 अकाउंट में 281925887 रुपये पड़े हैं जिन पर 10 सालों से किसी नेदावा नहीं किया है।

Sunday, February 13, 2011

13 फरवरी ‘क्लीन योर कंप्यूटर डे’ पर विशेष


कंप्यूटर हमारी जीवनशैली का अभिन्न अंग होने का साथ कई बीमारियों का घर भी है.
रास्ते में भी अपनी गाड़ियों और मेट्रो में बैठे हुए आप लैपटॉप पर काम करते रहते हैं. लेकिन, आपने क्या अपने कंप्यूटर के की बोर्ड की हालत पर ध्यान दिया है? नहीं . लेकिन कंप्यूटर पर काम करते वक्त आप उन्हीं हाथों से खाने का सामान उठा कर खा जरूर लेते हैं. अगर ऐसा करते हैं तो मत करिए. यह आपको बीमार बना सकता है.
कैलिफोर्निया विविद्यालय की हाल ही में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक हमारे घरों और दफ्तरों में इस्तेमाल होने वाले कंप्यूटर के की बोर्ड टॉयलेट सीट जितने गंदे होते हैं. उसमें उन तमाम बीमारियों के कीटाणु होते हैं जो टॉयलेट सीट में होते हैं.
शोधकर्ताओं का कहना है कि जिस तरह आप टायलेट सीट को छूने के बाद उन्हीं हाथों से खाना नहीं खा सकते वैसे ही कभी भी कंप्यूटर पर काम करने के बाद बिना हाथ धोए खाना न खाएं. वरना आप तमाम बीमारियों को दावत देंगे.
इंटरनल मेडिसिन विशेषज्ञ डॉक्टर आर पी सिंह का कहना है, ‘‘दफ्तरों के कंप्यूटर पर सभी लोग काम करते हैं. उनके हाथों में जितनी गंदगी होती है वह की बोर्ड पर चिपक जाती है. इसके अलावा उनकी सफाई करने वाले कभी इस बात का ख्याल नहीं रखते कि वे सफाई के लिए कैसा ब्रश या कपड़ा इस्तेमाल कर रहे हैं. ऐसा होने के कारण कंप्यूटर पर तमाम तरह के कीटाणु चिपके रहते हैं.’’
उन्होंने कहा, ‘‘लोगों की कंप्यूटर पर काम करते वक्त खाते रहने की आदत होती है. इस आदत के कारण खाते वक्त खाने का कोई छोटा टुकड़ा भी अगर की बोर्ड में गिर कर फंस जाए तो वह निकल नहीं पाता है. ऐसे में वह वहीं सड़ता रहता है और कीटाणुओं को जन्म देता है.’’
कंप्यूटर की सफाई के बारे में स्वीडन के विविद्यालय क्रिंस्टन के शोध के मुताबिक कंप्यूटर पर काम करने के बाद उन्हीं हाथों से खाना खाने या चेहरा साफ करने से पेट और चमड़े की कई बीमारियां होने की पूरी संभावना होती है.
शोध के मुताबिक कंप्यूटर पर काम करने के बाद बगैर हाथ धोए खाना खाने से पेट की परेशानी सबसे ज्यादा होती है. जिसमें पेचिश और पेट में संक्र मण हो जाना सामान्य है. इसके अलावा अगर किसी संक्रामक बीमारी के शिकार व्यक्ति ने आपसे पहले कंप्यूटर इस्तेमाल किया है तो आपको वह बीमारी भी लग सकती है.
विशेषज्ञों की मानें तो कंप्यूटर को हमें बहुत ज्यादा साफ रखना चाहिए. इससे न सिर्फ हम बीमारियों से बचते हैं बल्कि हमारे कंप्यूटर को भी कोई बीमारी नहीं होती है.
कंप्यूटर इंजीनियर ईषान योगी का कहना है, ‘‘धूल और खाने की चीजें कंप्यूटर की दुश्मन होती हैं. मगर लोग इस बात को नहीं समझते. अगर आपके कंप्यूटर के सीपीयू के भीतर धूल घुस जाए तो वह हार्डवेयर को आसानी से खराब कर देता है. उसे जाम कर सकता है और आपको उसे ठीक करवाने जाना पड़ सकता है. इसके अलावा अगर कंप्यूटर पर गलती से भी खाने-पीने का कोई सामान गिर जाए तो वह उसके जीवन को कम करता है.’’
उनका कहना है, ‘‘कंप्यूटर को किसी भी तरह के तरल पदार्थ से साफ नहीं करना चाहिए . यहां तक कि आप उसे घर में टीवी वगैरह साफ करने वाले सामान्य क्लीनर से भी साफ नहीं कर सकते . ऐसे में उस पर अगर पानी, कोल्ड ड्रिंक या चाय गिर जाए तो समझ लिजिए आपका कंप्यूटर तो गया. ’’
यानी आप अपने कंप्यूटर की सफाई दो कारणों से कर सकते हैं. एक अगर आपको अपनी सेहत का ख्याल है. दूसरा अगर आपको अपने कंप्यूटर की सेहत की चिंता है.

valentine's day


500 नक्सली हमलों में 350 लोग मारे गए

देश के नौ राज्यों में पिछले तीन महीनों के दौरान हुए 500 विभिन्न नक्सली हमलों में लगभग 350 लोग मारे गए हैं। इन हमलों में सबसे अधिक लोग छत्तीसगढ़ में मारे गए हैं। केंद्रीय गृह राज्यमंत्री अजय माकन ने राज्यसभा में बताया कि पिछले तीन महीनों के दौरान छत्तीसगढ़ में 140, झारखण्ड में 111, पश्चिम बंगाल में 88, बिहार में 78 और उड़ीसा में 43 नक्सली हिंसा की घटनाएं हुईं। ऐसी ही 20 घटनाएं महाराष्ट्र में, 17 आंध्रप्रदेश में, दो मध्यप्रदेश में और एक उत्तर प्रदेश में हुईं। उन्होंने बताया कि इस दौरान छत्तीसगढ़ में 194 लोग मारे गए, जिसमें सुरक्षाकर्मी भी शामिल हैं। पश्चिमबंगाल में 66 और उड़ीसा में 23 मारे गए। नक्सलियों ने हमले के दौरान सुरक्षाकमिर्यो के हथियार भी लूट लिए।

अब हेलीकॉप्टर से नक्सलियों पर नजर रखी जाएगी


छत्तीसगढ़ में नक्सलियों पर शिकंजा कसने और दूरदराज के क्षेत्रों समेत घने जंगलों में कहीं भी फोर्स के उतरने की तैयारियां बस्तर पुलिस ने कर ली हैं। बस्तर संभाग के पांचों जिलों के हर पहुंच विहीन इलाकों में छह हेलीकॉप्टरों से नक्सलियों के ठिकानों की रेकी शुरू कर दी गई है। किसी भी बड़े ऑपरेशन में माओवादियों को करारा जवाब देने प्रशिक्षित जवान अधिकारी संबंधित क्षेत्र में हेलीकॉप्टर से उतारे जाएंगे, जो कुछ ही मिनटों में परिस्थितियों के मुताबिक मोर्चा संभाल लेंगे। इस मुहिम में साधारण जवानों को नहीं लगाया जाएगा। उच्च स्तरीय इस फैसले के बाद पुलिस अफसरों ने रणनीति में यह बदलाव किया है। अफसरों समेत दो जवानों को 60 दिन तक कांकेर स्थित काउंटर टेररिज्म एंड जंगलवार फेयर में कड़ा प्रशिक्षण दिया गया है। जहां उन्हें युद्ध का कौशल सिखाया गया है। इतना ही नहीं, इन तैयार किए गए जवानों को कांकेर, दंतेवाड़ा, बीजापुर, बस्तर एवं नारायाणपुर में तैनात कर दिया गया है।  संवेदनील इलाकों पर नजर रखने हेलीकॉप्टरों से रेकी की जाएगी। इसके लिए अग्रीम परीक्षण हो चुका है। ऐसे जवान कुछ ही क्षणों में अपने दुश्मन पर धावा बोल देते हैं।

नक्सलियों ने छह महीनों में 190 हत्याएं कीं

छत्तीसगढ़ में माओवादी नक्सली संगठन ने इस वर्ष छह महीनों में 137 सुरक्षाकर्मियों सहित 190 लोगों की हत्या की, जिसमें केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के 117 जवान भी शामिल हैं। नक्सली इन वारदातों के दौरान पुलिस के लगभग सौ आधुनिक हथियारों और कारतूसों का जखीरा लूट ले गए है। पुलिस की कड़ी कार्रवाई के दावों के बीच केवल 32 नक्सली मारे गए हैं, जबकि नक्सलियों ने मुखबीरी के आरोपों में 53 ग्रामीणों की हत्या कर दी है। हिंसा का शिकार होनेवालों में पुलिस अधिकारी, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और कांग्रेस के नेता तथा चिकित्सक भी शामिल हैं। पिछले तीन महीनों में नक्सलियों ने भारी उत्पात मचाया। गत छह अप्रैल को दंतेवाड़ा जिले के ताड़मेटला में नक्सलियों ने रणनीति के तहत अब तक की सबसे बड़ी वारदात करते हुए सीआरपीएफ पर हमला किया, जिसमें 76 जवान शहीद हो गए। नक्सली इस घटना के दौरान जवानों की 50 से अधिक बंदूकों के अलावा राइफल और भारी मात्रा में कारतूस लूट ले गए। बीजापुर जिले के बासागुड़ा में गत आठ मई को बारूदी सुरंग विस्फोट में सीआरपीएफ के आठ जवान शहीद हो गए। दंतेवाड़ा जिले में नक्सलियों ने पहली बार आम लोगों को निशाना बनाया। सुकमा-कोंटा मार्ग पर गत 17 मई को चिंगावरम के पास नक्सलियों ने एक यात्री बस को विस्फोट करके उड़ा दिया, जिसमें 16 जवान सहित 31 लोग मारे गए।  गत 23 जून को गोलापल्ली थाने से निकले जवानों पर नक्सलियों ने गोलियां चलाईं, जिसमें तीन जवानों की मौत हो गई।  गत 29 जून को नारायणपुर जिले के धोड़ाई थाना क्षेत्र के तहत गश्त से लौट रहे सीआरपीएफ के जवानों पर नक्सलियों ने चारों ओर से घेरकर हमला किया। 

तीन वर्षों में नक्सलियों ने 1,948 हमले किए


छत्तीसगढ़ में पिछले तीन वर्षों के दौरान 1,948 नक्सली हमले हुए। इनमें न सिर्फ 418 आम नागरिकों की जान गई, बल्कि 435 सुरक्षाकर्मी भी शहीद हो गए।
तीन माह में 500 नक्सली हमलों में 350 लोग मारे गए 
पुलिस मुख्यालय के एक अधिकारी ने बताया,"नक्सलियों ने जुलाई 2007 से जुलाई 2010 के बीच 1,948 हमले किए। इन हमलों में 418 नागरिक और 75 विशेष पुलिस अधिकारियों सहित कुल 435 पुलिसकर्मी शहीद हुए।" अधिकारी ने बताया कि नक्सलियों ने 95 फीसदी हमले बस्तर इलाके में किए हैं और हताहतों की संख्या भी सबसे ज्यादा यहीं है। लगभग 40,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला यह क्षेत्र खनिज संपदा के मामलों में समृद्ध माना जाता है। 

Tuesday, January 25, 2011

पत्रकार पा रहे है जवानी में पेंशन


वर्तमान समय में पत्रकारों की हालत कुछ ऐसी है कि जैसे किसी को जवानी में पेंशन मिल रही हो. वैसे तो पत्रकार समाज का चौथा स्तम्भ है, लेकिन चौथा स्तम्भ  आज सबसे कमजोर और उपेक्षित होता जा रहा है.पत्रकार किसी भी संस्थान से जुड़ा हो उसे पहले ही बता दिया जाता है कि पत्रकार का कोई टाइम टेबल नहीं होता बल्कि उसे २४ घंटे सक्रिय रहना पड़ता है. वह अपने कर्तव्यों को पूरी लगन और तल्लीनता से पूरा भी करता है, लेकिन सस्था उसके लिए क्या करता है यह किसी से छिपा  नहीं है. राजधानी रायपुर कि बात करें तो यहाँ पत्रकारों को इतना कम वेतन मिलता है जिसकी कोई सीमा नहीं है, ये कहे कि पूरे देश में पत्रकारों कि सबसे कम वेतन छत्तीसगढ़ में है तो यह अतिसंयोक्ति नहीं होगी. भले पिछले कुछ सालों में नए अख़बार के आने से पत्रकारों को थोड़ी-बहुत राहत जरुर मिली है,लेकिन बांकी अख़बारों से जुड़े पत्रकारों का यही हाल है. वे चाहकर भी अपना वेतन बढ़ाने कि बात संपादक और जीएम्  के सामने नहीं रख सकते. यदि किसी ने हिम्मत भी की, तो या उसे नौकरी से हाथ धोना पड़ा या फिर उसे इतना प्रताड़ित किया जाता है कि उसे मजबूरन नौकरी छोडनी पड़ती है. उसपर बंदिशे इतनी होती है कि वो प्रेस से जुड़ने के बाद यदि किसी पत्रकार संगठन से जुड़ जाता है तो वो हमेशा मैनेजमेंट के निशाने पर रहता है. और धोके से यदि उसने किसी भी संस्था के मैनेजमेंट से पंगा लिया तो उसे किसी दूसरी संस्था में नौकरी के लिए एड़ी-चोटी एक करना पड़ता है भले ही वह कितना भी योग्य क्यों न हो. वर्तमान के व्यावसायिक परिदृश्य में यदि नजर डाले तो किसी भी संस्था में काम करने के लिए आज योग्यता को कम और चापलूसी को ज्यादा महत्व दिया जाता है. लेकिन जवानी में पेन्सन पा रहे पत्रकार जब तक एकजुट होकर अपने हक़ के लिए आवाज नहीं उठाएंगे तब तक हालत सुधर जाये इसकी कोई गारंटी नहीं है

Tuesday, December 14, 2010

नीरा राडिया - कितना आसान है सरकार और प्रशासन में सेंध लगाना.



नीरा राडिया- जिस महिला को चंद महीने पहले तक कोई जानता नहीं था, वो आज देश-विदेश की सबसे चर्चित महिला बन गई है. नीरा ने अपने दिमाग से ऐसा जाल बुना कि, क्या नेता,क्या उद्योगपति और क्या पत्रकार सबको उसकी बात माननी पड़ी और उसके अनुसार काम करने को मजबूर हो गए. नीरा की  सफलता की  कहानी जितनी सच है उतनी ही सच है सरकार और प्रशासन में सेंध लगाना. इसपर सोचने-विचारने की जरुरत है कि कोई कितनी आसानी से सेंध लगाकर अपना काम निकल सकता है. देश में भ्रष्ट्राचार ने किस  कदर अपनी पैठ बनाई है उसका जीता जागता सबूत नीरा है. कोई लोबिंग करके इतना सफल हो सकता है यह देश-विदेश के तमाम लोबिस्तो के लिए शोध का विषय है. अभी तक जो तथ्य नीरा के बारे में सामने आये है वह दांतों तले उंगलिया दबाने के लिए काफी है. नीरा की काबिलियत एक अलग मामला है लेकिन देश के नेता और नौकरशाह इसके लिए ज्यादा जिम्मेदार है. जरा सी लालच के लिए ये नेता न जाने कहाँ तक जा सकते है. पैसा आज भगवान से भी बढकर हो गया है क्योंकि पैसों के लालच में नेताओ को भगवान का डर भी नहीं रह गया है. घोटालों और गबन की ये कहानी एक दिन में नहीं हुई बल्कि इसके लिए कई लोगों को यूज किया गया.
   
राडिया का कारनामा .
2जी स्‍पेक्‍ट्रम लाइसेंस में हुए कथित घोटाले के सिलसिले में चर्चा में आईं नीरा राडिया लियाजनिंग करने वाली देश की बड़ी हस्तियों में शुमार हैं। उन्‍होंने 1990 में विदेशी कंपनी सिंगापुर एयरलाइंस के भारत में प्रवेश में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। हालांकि बाद में सिंगापुर एयरलाइंस ने भारत में विमान सेवा शुरू नहीं की, लेकिन राडिया तत्कालीन उड्डयन मंत्री अनंत कुमार और टाटा समूह के अध्यक्ष रतन टाटा पर अपना प्रभाव छोड़ने में सफल रहीं। रतन टाटा सिंगापुर एयरलाइंस के भारतीय पार्टनर थे। 

हाल ही में रतन टाटा ने खुलासा किया था कि सिंगापुर एयरलाइंस के साथ मिल कर वह विमानन कंपनी खोलना चाहते थे, लेकिन एक मंत्री ने उनसे 15 करोड़ की रिश्‍वत मांगी थी। उन्‍होंने रिश्‍वत देने से इनकार कर दिया था और एयरलाइन कंपनी खोलने का उनका सपना अधूरा ही रह गया।

राडिया ने व्यावसायिक जगत में 2000 में तब हड़कंप मचाया जब उन्होंने केवल 1 लाख रुपए की पूंजी के साथ खुद की एयरलाइंस कंपनी शुरू करने के लिए लाइसेंस मांगा। हालांकि उनके लाइसेंस का आवेदन निरस्त कर दिया गया।  उस समय नागरिक उड्डयन मंत्री अनंत कुमार थे।   

लेकिन तब तक रतन टाटा राडिया से काफी प्रभावित हो चुके थे। उन्होंने राडिया को टाटा टेलीसर्विसेज से जुड़े मामलों में आ रही अड़चनें सुलझाने की जबाबदारी सौंप दी। इसके बाद (2001 में) वैष्‍णवी कार्पोरेट कम्युनिकेशंस कंपनी बनाई गई। राडिया ने टाटा समूह से नजदीकी का भरपूर लाभ लिया और वे करीब 50 बड़ी कंपनियों को सलाह देने का काम करने लगीं। मुकेश अंबानी ने भी 2008-09 में मीडिया प्रबंधन के लिए राडिया की कंपनी को सलाहकार बनाया।  

इसी बीच राडिया 2जी लाइसेंस आवंटन के लिए सक्रिय हो गईं। इसके बाद उन्होंने दूरसंचार विभाग से जुड़े कई अफसरों से बेहतर संबंध बनाए। बड़ी कंपनियों और सरकार के बीच अहम कड़ी का किरदार निभाने वाली नीरा राडिया ने प्रवर्तन निदेशालय की पूछताछ में माना है कि वह टाटा टेलीसर्विसेज और यूनीटेक वायरलेस के लिए पूर्व दूरसंचार मंत्री ए राजा से लाइजनिंग कर रहीं थीं। उन्हें दो कंपनियों से उन्हें सलाह देने के एवज में 60 करोड़ की रकम मिली थी।

राडिया का कैरियर 2009-10 में चरम पर था। उनकी सभी कंपनियों का सालाना टर्नओवर 100 से 120 करोड़ रुपए के आसपास आंका गया।
राडिया कीनिया में पैदा हुईं और उनके पास ब्रिटेन का पासपोर्ट है।

नाम कमाने के बाद बदनामी 

नीरा राडिया पर यह भी आरोप लगते रहे हैं कि उन्‍होंने ए राजा को दूरसंचार मंत्री बनवाने के लिए काफी पैरवी की थी। इसके लिए उन्‍होंने देश के दो बड़े पत्रकारों की भी मदद लेने की कोशिश की थी। इस संबंध में बातचीत की एक रिकॉर्डिंग भी सार्वजनिक हो चुकी है और इस पर काफी विवाद हो रहा है।

प्रवर्तन निदेशालय ने नीरा राडिया से 2जी स्पेक्ट्रम के मामले में लंबी पूछताछ की। पूछताछ मुख्यतः 2 जी घोटाला, उनके राजा से संबंध और 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में शामिल कंपनियों के राडिया से संबंधों पर ही केंद्रित रही। राडिया की कंपनी वैश्नवी कार्पोरेट कम्युनिकेशंस द्वारा जारी बयान में आरोप लगाया गया कि उनके द्वारा टाटा टेलीसर्विसेज की पैरवी किए जाने के बाद इस कंपनी के साथ सौतेला व्यवहार किया गया। 


क्या था रिपोर्ट में 
सीएजी की रिपोर्ट के अनुसार 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाला करीब 1.77 लाख करोड़ रुपये का है। सीएजी ने यह आंकड़ा निकालने के लिए 3जी स्पेक्ट्रम आवंटन और मोबाइल कंपनी एस-टेल के सरकार को दिए प्रस्तावों को आधार बनाया है।

दूरसंचार की रेडियो फ्रिक्वेंसी को सरकार नियंत्रित करती है और अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार संघ (आईटीए) से तालमेल बनाकर काम करती है। दुनिया में आई मोबाइल क्रांति के बाद कई कंपनियों ने इस क्षेत्र में प्रवेश किया। सरकार ने हर कंपनी को फ्रिक्वेंसी रेंज यानी स्पेक्ट्रम का आवंटन कर लाइसेंस देने की नीति बनाई। उन्नत तकनीकों के हिसाब से इन्हें पहली जनरेशन(पीढ़ी) यानी 1जी, 2 जी और 3जी का नाम दिया गया। हर नई तकनीक में ज्यादा फ्रिक्वेंसी होती हैं और इसीलिए टेलीकॉम कंपनियां सरकार को भारी रकम देकर फ्रिक्वेंसी स्पेक्ट्रम के लाइसेंस लेती हैं।

सीएजी रिपोर्ट के अनुसार केंद्रीय दूरसंचार मंत्री ए. राजा ने 2008 में नियमों के उल्लंघन करते हुए 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन किया। इसके लिए उनके विभाग ने 2001 में आवंटन के लिए अपनाई गई प्रक्रिया को आधार बनाया, जो काफी पुरानी थी। उन्होंने इसके लिए बिना नीलामी के पहले आओ, पहले पाओ के आधार पर आवंटन किए। इससे 9 कंपनियों को काफी लाभ हुआ। प्रत्येक को केवल 1651 करोड़ रुपयों में स्पेक्ट्रम आवंटित किए गए जबकि हर लाइसेंस की कीमत 7,442 करोड़ रुपयों से 47,912 करोड़ रुपये तक हो सकती थी। 

सीएजी ने 1.77 लाख करोड़ का आंकड़ा निकालने के लिए दो तथ्यों को आधार बनाया। उन्होंने इस साल 3जी आवंटन में मिली कुल रकम और 2007 में एस-टेल कंपनी द्वारा लाइसेंस के लिए सरकार को दिए प्रस्ताव के आधार पर यह नतीजा निकाला। सीएजी के अनुसार 122 लायसेंस के आवंटन में सरकार को जितनी रकम मिली, उससे 1.77 लाख करोड़ रुपए और मिल सकते थे। इसीलिए यह घोटाला 1.77 लाख करोड़ रुपयों का माना गया।

Friday, December 10, 2010

मुन्नी और शीला ने बढ़ाये लड़कियों के सिरदर्द

दबंग में मुन्नी बदनाम क्या हुई  मुन्नी नाम वाली लडकियों का घर से निकलना मुश्किल हो गया. आस-पड़ोस वालों के मुह से इसके बोल निकलने शुरू हो गए. जो मुन्नी कभी गुमनाम हुआ करती थी आज वो बदनाम हो गयी है. मनोरंजन के नाम पर गाने लिखने वालो को इस बात का जरा भी ख्याल नहीं रहता कि इससे किसी को क्या फर्क पड़ेगा.उसे तो बस लिखना था लिख दिया.लेकिन उस गाने ने न सिर्फ गाँव में बल्कि शहर में भी असर दिखाना शुरू कर दिया है. एक शहर कि दो बहनों को इसकी वजह से अपना नाम बदलना पड़  गया. इसी तरह एक लड़की को स्कूल में उनके सहपाठियों ने इतना परेशान किया कि उसे बहुत घातक कदम उठाना पड़ा. मुन्नी का दौर ख़तम हुआ ही नहीं था कि शीला कि जवानी लोगों कि जुबान पर चढ़ गई. शीला कि जवानी गाने ने तो जवा लड़कियां  का रास्ते से गुजरना ही दूभर कर दिया. इस तरह के गानों से वो हर लड़की परेशान है जो समाज में निकल कर किसी न किसी दायित्व को निभा रही है. चाँद पैसो और लोगों को ओछा मजा देने कि लिए गीतकारों ने इस नए  और गंदे फार्मूले को बड़ी तेजी से अपना लिया है. यदि तेजी से बाद रहे इस फार्मूले को कड़े नियम बनाकर नहीं रोके गए तो आने वाले समय में इसके और भी भयंकर परिणाम सामने आयेंगे.लोग अपनी बच्चियों का कितनी बार नाम बदलेंगे जरुरी है कि ऐसी चोजों पर रोक लगाई जाये. 





Tuesday, December 7, 2010

2 जी स्पेक्ट्रम. भ्रष्टाचार की हद पार हो गयी



देश के सबसे बड़े घोटाले ने  भ्रष्टाचार की हद पार कर दी है. इस महा घोटाले ने तो कामनवेल्थ में हुए घोटाले को इतना बौना साबित कर दिया कि कई लोगों के सर चकरा गए. देश में हुए 2जी स्पेक्ट्रम के सस्ते आबंटन से देश को 1.76 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। यह अलॉटमेंट तत्कालीन टेलिकॉम मिनिस्टर ए. राजा के कार्यकाल में हुआ। विपक्ष के लगातार दबाव के बाद ए.राजा ने टेलिकॉम मिनिस्टर के पद से इस्तीफा दे दिया.इसमें आपरेटरों को लाइसेंस देने का प्रावधान किया गया। सरकार को अच्छा पैसा मिला। 2007 में सरकार ने 2जी स्पेक्ट्रम नीलाम करने का फैसला किया। इस नीलामी में सरकार को कुल नौ हजार करोड़ रुपए मिले जबकि सीएजी के अनुमान के अनुसार उसे एक लाख पचासी हजार करोड़ रुपए से अधिक की कमाई होनी चाहिए थी। राजा पर आरोप है कि उन्होंने नीलामी की शर्तो में मनचाहे बदलाव किए। प्रधानमंत्री, कानून मंत्री और वित्त मंत्री की सलाह को अनदेखा किया। उन्होंने ऐसी कंपनियों को कौड़ियों के भाव स्पेक्ट्रम दिया जिनके पास न तो इस क्षेत्र में काम का कोई अनुभव था और न ही जरूरी पूंजी। उन्होंने चंद कंपनियों को फायदा पहंचाने के लिए बनाई और बदली सरकारी नीतियां। लेकिन गठबंधन की राजनीति की दुहाई देते हुए प्रधानमंत्री राजा के खिलाफ विपक्ष, अदालत और सीएजी के आरोप, शिकायतें, टिप्पणियों और रिपोर्टो के बावजूद पूरे तीन साल तक चुप्पी साधे रहे।
क्या है 2 जी?
- सेकंड जनरेशन सेलुलर टेलीकॉम नेटवर्क को 1991 में पहली बार फिनलैंड में लांच किया गया था। यह मोबाइल फोन के पहले से मौजूद नेटवर्क से ज्यादा असरदार तकनीक है। इसमें एसएमएस डाटा सर्विस शुरू की गई।
- राजा ने 2 जी स्पेक्ट्रम के लाइसेंस आवंटन में भारतीय दूरसंचार नियमन प्राधिकरण ट्राई के नियमों की धज्जियां उड़ाईं।
क्या थे नियम
- लाइसेंस की संख्या की बंदिश नहीं
- इकरारनामे में कोई बदलाव नहीं
- प्रक्रिया के समापन तक विलयन और अधिग्रहण नहीं हो सकता
- बाजार भाव से प्रवेश शुल्क
राजा के कानून
- 575 आवेदनों में से 122 को लाइसेंस
- स्वॉन और यूनिटेक के अधिग्रहण को मंजूरी
- इकरारनामे को बदला गया
- 2001 की दरों पर
क्या तरीके अपनाए
- बिल्डर और ऐसी कंपनियों ने लाइसेंस के लिए आवेदन लगाए, जिनका टेलीकॉम क्षेत्र में काम करने का कोई अनुभव नहीं था। रियल स्टेट क्षेत्र की कंपनियों को टेलीकाम लाइसेंस दिया।
- बाहरी निवेशकों को बाहर रखने के लिए अंतिम तिथि को मनमाने ढंग से पहले तय कर दिया गया।
- पहले आओ, पहले पाओ का नियम बना दिया, 575 में से 122 को लाइसेंस दे दिए।
- घोषणा की कि ट्राई की सिफारिशों पर अमल हो रहा है, लेकिन पांच में से चार सिफारिशें बदल दी गईं।
- केबिनेट, टेलीकॉम कमिश्नर और ईजीओएम को दरकिनार किया।
सीएजी रिपोर्ट में
- नुकसान का आंकड़ा 1,76,379 करोड़ रुपए
- लाइसेंस प्रक्रिया में प्रधानमंत्री के दिशा-निर्देशों की अनदेखी
- नीलामी से जुड़ी वित्त मंत्री की जरूरी सिफारिशों को सुना नहीं
- 2 जी स्पेक्ट्रम के आवंटन में टेलीकॉम सचिव के नोट को अनदेखा किया।
- ट्राई के उस पत्र को देखा तक नहीं, जिसमें उसकी सिफारिशों की उपेक्षा नहीं करने को कहा गया।
सात साल पुराने रेट पर स्पेक्ट्रम की बंदरबांट
राजा ने नौ टेलीकॉम कंपनियों को 122 सर्किल में सेवाएं शुरू करने का लाइसेंस दिया। लेकिन प्रक्रिया पर तभी सवाल उठे। आवेदन की अंतिम तारीख एक अक्टूबर घोषित की। बाद में कहा कि स्पेक्ट्रम सीमित होने के कारण 25 सितंबर के बाद मिले आवेदनों पर विचार नहीं होगा। हर कंपनी से 1658 करोड़ रुपए लेकर देश भर में सेवाएं शुरू करने की अनुमति दे दी गई। यह मूल्य सरकार द्वारा 2001 में तय रेट पर लिया गया जबकि 2007 तक टेलीकॉम क्षेत्र कई सौ गुना बढ़ चुका था।
1658 से 10,000 करोड़ बनाए चंद दिनों में
स्वॉन टेलीकॉम को लाइसेंस 1600 करोड़ रुपए में मिला। कुछ दिनों बाद उसने 45 प्रतिशत शेयर सऊदी अरब की इटिसलाट को 4500 करोड़ में बेच दिए। यानी लाइसेंस मिलने के बाद कंपनी का मूल्यांकन 10,000 करोड़ रुपए हो गया। इसी तरह यूनिटेक ने 60 प्रतिशत हिस्सेदारी नार्वे की टेलीनॉर को 6000 करोड़ में बेच दी। तब तक इन दोनों के पास एक भी उपभोक्ता नहीं था। न ही सेवाएं शुरू हुई थीं।