Monday, March 1, 2010

indian hockey team



चक दे इंडिया

भारतीय हांकी टीम


गोलकीपर: एड्रियन डी'सूजा, पीआर श्रीजेश

डिफ़ेंडर: संदीप सिंह, धनंजय महादिक, दिवाकर राम

मिड फ़ील्डर: गुरबाज सिंह, सरदार सिंह, भारत, अर्जुन हलप्पा, दानिश मुजतबा, विक्रम पिल्लई

फ़ॉरवर्ड: राजपाल सिंह, शिवेंद्र सिंह, तुषार खांडेकर, प्रभजोत सिंह, सरवनजीत सिंह, दीपक ठाकुर, गुरविंदर सिंह चांडी
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खिलाडियों का परिचय
 
 
एड्रियन डीसूजा
जन्म 24-3-1984 पोजिशन गोल कीपर
मुंबई के डीसूजा जनवरी 2004 से भारतीय टीम में हैं। इसी साल वह भारत के प्लेयर ऑफ ईयर से नवाजे गए। अब तक वह देश के लिए 135 मैच खेल चुकेहैं।


दिवाकर राम
जन्म - 8-12-1989 पोजिशन- डिफेंडर
गोरखपुर के रहने वाले दिवाकर राम के दनदनाते ड्रैग फ्लिक की बदौलत ने भारत ने 2008 मैं साउथ कोरिया को हराकर जू. एशिया कप जीता था। सीनियर टीम में वह 14 मैच खेले हैं।

सरदारा सिंह
जन्म - 15-7-1986 पोजिशन - सेंटर, फुलबैक
पीएचएल में हैदराबाद सुल्तान और चंडीगढ़ डायनमोज के कप्तान रह चुके हरियाणा के सरदारा सिंह 2008 में भारतीय हॉकी टीम के सबसे युवा कप्तान में शुमार हुए।

गुरबाज सिंह
जन्म - 09-08-1988, पोजिशन - मिडफील्डर
76 मैच खेल चुके गुरबाज सिंह की कप्तानी में भारत ने जू. एशिया कप जीता था। किलोर्स्कर हॉकी एकेडमी का यह खिलाड़ी किसी भी मुकाबले का पासा पलटने का माद्‌दा रखते हैं।
भरत चिकारा

जन्म - 10-10-1986, पोजिशन - मिडफील्डर
हरियाणा के भरत चिकारा ने कोच जोएकिम कावोर्ल्हो के समय अंतरराष्ट्रीय कैरियर का आगाज किया था। चिकारा बहुत चतुर स्कोर हैं । वह अब तक 60 मैच खेल चुके हैं।

शिवेंदर सिंह
जन्म - 9-6-1987, पोजिशन - फारवर्ड
मध्य प्रदेश का यह युवा खिलाड़ी ने पहले कोच एसपी सिंह और बाद में गुरबक्स सिंह की निगरानी में हॉकी का ककहारा सीखा। 2006 में पदापर्ण के बाद से उन्होंने 102 मैच में 48 गोल दागे हैं।


दानिश मुज्तबा
जन्म - 20.12.1988, पोजिशन - मिडफील्डर
दिल्ली के दानिश मुज्तबा ने 2009 में कोच होसे ब्रासा की निगरानी में अपने कैरियर की शुरुआत की। वह अब तक राष्ट्रीय टीम से देश के लिए 10 मैच खेल चुके हैं।


राजपाल सिंह
जन्म - 08-08-1983, पोजिशन - फारवर्ड
कप्तान राजपाल सिंह अब तक 120 मैच खेल चुके हैं। खुद पर भरोसा करना उनकी ताकत है। उनका कहना है बेशक भारत को कठिन ग्रुप मिला है लेकिन टीम अंतिम चार में जगह बनाने में कामयाब रहेगी।


प्रभजोत सिंह
जन्म - 14.08.1980 पोजिशन - फारवर्ड
भारतीय हॉकी के सबसे तेज तर्रार लेफ्ट विंगर प्रभजोत सिंह मुख्य कोच ब्रासा के सबसे पसंदीदे और भरोसेमंद खिलाड़ी हैं। इसलिए ब्रासा ने बतौर कप्तान पंजाब के इस खिलाड़ी का नाम हॉकी इंडिया के सामने पेश किया था।

तुषार खांडेकर
जन्म - 05-04-1985
पोजिशन - फारवर्ड
एशिया कप 07 (गोल्ड) में भारतीय टीम का हिस्सा रह चुके तुषार खांडेकर ने अब तक देश के लिए 166 मैच खेले हैं और कुल 42 गोल दागे। उन्होंने आस्ट्रेलिया के खिलाफ टेस्ट सीरीज में भारत का नेतृत्व किया।

दीपक ठाकुर
जन्म - 28-12-1980,
पोजिशन - फारवर्ड
भारतीय हॉकी का हीरा है दीपक ठाकुर। यह कहना है कोच हरेंद्र सिंह, जिन्होंने 2009 अर्जेंटीना टूर पर उसे राष्ट्रीय टीम में वापस बुलाया। अर्जेंटीना दौरे पर वह एक अवतार के रूप उभरे।

पीआर श्रीजेश
जन्म - 8-5-1988, पोजिशन - गोलकीपर
केरल से लंबे समय बाद कोई राष्ट्रीय टीम में आया है तो वह है पीआर श्रीजेश। यह एक उदीयमान गोलकीपर है और उसे एंड्रियन डीसूजा के विकल्प के रूप में देखा जा रहा है।

श्रवणजीत सिंह
जन्म - 3-07-1988, पोजिशन - फारवर्ड
पंजाब के स्ट्राइकर श्रवणजीत ने 2007 सुल्तान अजलान शाह कप में कोच जोएकिम कार्वालहो की देखरेख में अंतरराष्ट्रीय कैरियर का आगाज किया था तब से वह 22 मैच खेल चुके हैं।

गुरविंदर सिंह चांदी
जन्म - 20-10-1989 पोजिशन - फारवर्ड
गुरविंदर गजब का फारवर्ड खिलाड़ी है। 2008 में आस्ट्रेलियन चार नेशंस टूर्नामेंट से सीनियर टीम में आगाज करने वाले गुरविंदर ने इस दौरे पर आठ मैचों में तीन गोल दागे थे।

विक्रम पिल्ले
जन्म - 27-11-1981 पोजिशन - मिडफील्डर 163 मैच खेल चुके विक्रम पिल्लै काफी डायनामिक मिडफील्डर हैं। 2004 हॉलैंड टेस्ट सीरीज में वह बेस्ट प्लेयर के खिताब से नवाजे गए।

अर्जुन हलप्पा
जन्म - 17-12-1980 पोजिशन - मिडफील्डर
वर्ल्ड कप में भारत के सबसे अनुभवी खिलाड़ी हैं अर्जुन हलप्पा। कनार्टक का यह खिलाड़ी अब तक 199 मैच खेल चुका है और 32 गोल दोग हैं। इस वर्ल्ड कप में उनपर काफी दारोमदार है।

धनंजय महादिक
जन्म - 5-11-1984 पोजिशन - मिडफील्डर
धनंजय ने अर्जेंटीना के साल्टा में चैंपियंस चैलेंज कप के दौरान खुद को बेहतरीन ऑलराउंडर साबित किया था। 28 मैच मेंं 10 गोल करने वाले महादिक लेफ्ट फुलबैक और मिडफील्डर भी हैं।

संदीप सिंह
जन्म - 27-2-1986 पोजिशन - डिफेंडर
ड्रैग फ्लिकर संदीप सिंह को 18 बरस की उम्र में भारत की सीनियर टीम में खेलने का मौका मिला। उन्होंने 2004 में जूनियर एशिया कप जीतने में अहम भूमिका निभाई।

Thursday, February 25, 2010

सचिन तेंदुलकर . एक शख्स जिसने दे दी सारे जहाँ को ख़ुशी

सचिन तेंदुलकर .एक शख्स जिसने दे दी सारे जहाँ को ख़ुशी


आज के समय में जब लोगों के पास खुश हो पाने का भी समय नहीं है ऐसे में यदि मात्र एक शख्स करोड़ो लोगों को ख़ुशी दे-दे तो उसे क्या कहेंगे.ये या तो चमत्कार होगा या फिर किसी ऐसे इंसान की मेहनत का नतीजा जिसने अपने कर्म को पूजा माना हो.जी हाँ हम बात कर रहे है हमारे देश भारत के वंडर-बॉय(अब वंडर-मेन) सचिन तेंदुलकर की. आंकड़े बताते है की विश्व क्रिकेट के इतिहास में अब तक कुल २९६१ वन-डे मैच खेले जा चुके हैं लेकिन सचिन ने जो किया वह हर उस नामी क्रिकेटर का सपना होगा जो आज के फटाफट क्रिकेट का हिस्सा हैं लेकिन भारत के इस लाजवाब क्रिकेटर ने २४ फरवरी बुधवार को ग्वालियर में एक-दिवसीय क्रिकेट का पहला दौहरा शतक लगाया तब देश हर वो व्यक्ति गौरवान्वित हो गया जिसे अपने भारतीय होने पर गर्व है.क्यों वन-डे में डबल सेंचुरी किसी सपने से कम नहीं है.क्रिकेट के जानकार उसे क्रिकेट का भगवान् कहते है.लेकिन सचिन ऐसे शख्स है जिन्होंने कभी भी अपने खेल पर घमंड नहीं किया और इतनी ऊँची शख्सियत होने के बाद भी उनका व्यव्हार हमेशा हर किसी से दोस्ताना ही रहा है. इतनी लम्बी क्रिकेट खेलने के बाद भी आज तक कभी वो विवादों में नहीं रहे. सचिन ने बुधवार को पुरे ५० ओवर मैच खेलकर ये बता दिया की उनमे अभी कितना दम बांकी है.सचिन आज हर उस व्यक्ति का आदर्श होना चाहिए जो अपने परिवार तक को ख़ुशी दे पाने की कोशिश में थक जाता है लेकिन सचिन हमारे देश का एकमात्र ऐसा वंडर-बॉय (अब वंडर-मेन) है जिसने सारे जहाँ को ख़ुशी दे दी.

Friday, February 19, 2010

Sunday, February 14, 2010

साइकिल चलाने की बजाय यदि अपने काफिले से एक-एक गाड़ी कम कर लें मंत्री तो लाखों लीटर पेट्रोल बरबाद होने से बच जाएगा .

महंगाई का सब अपने -अपने तरीके से विरोध जता रहे हैं। लोकतंत्र है इसलिए जो जैसी मर्जी आए अपना दिमाग लगाकर कुछ ना कुछ नया कर पब्लिसिटी पाने की तलाश में रहते हैं। अभी छत्तीसगढ़ में महंगाई को लेकर काफी शोर मचा हुआ है। कोई दुकान लगाकर महंगे सामान बेच रहा है तो कोई महंगाई के लिए जिम्मेदार नेता का पुतला फूंक रहा है तो कोई बंद करवाकर दो वक्त की रोटी की जुगाड़ में निकलने वाले मजदूर के पेट में लात मार रहा है, तो कोई सिर्फ नारेबाजी से काम चला रहा है। ये कोई एक की संख्या में नहीं हैं बल्कि सैकड़ों हजारों की संख्या में हैं। जो महंगाई और ना जाने कितने प्रकार की चीजों को लेकर समय-समय पर सड़कों पर आते रहते हैं। उनकी इस करतूत से ना तो पहले कभी कुछ हुआ है और ना आगे कभी कुछ होने वाला है। सरकार में पद पर बैठे नेताओं को जैसा सरकार चलाना है वो वैसा ही चलाएंगे। अब बात करें महंगाई की तो महंगाई के विरोध में हमारे प्रदेश में काबिज भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री,मंत्री और तमाम विधायक (महिला विधायक और मंत्री भी शामिल हैं) साइकिल चलाकर विधानसभा जाएंगे। अब 12 किलोमीटर तक साइकिल चलाना मजाक तो नहीं। क्योंकि जो रोज साइकिल चलाता है उसके लिए 12 क्या 22 भी चलेगा। पर जो ना जाने कितने सालों से साइकिल चलाना तक भूल गए हैं ऐसे लोग 12 किलोमीटर तक साइकिल चलाएंगे कैसे? खैर ये भी छोड़ो। अब बात करे कि आखिर साइकिल चलाकर वो कितना पेट्रोल-डीजल बचा लेंगे। मैं यह सोच ही रहा था तभी मेरे दिमाग में ये ख्याल आया कि जितने लोग भी इस काम में हिस्सा ले रहे हैं उनमें से सभी दल-बल के साथ चलते हैं। दल-बल मतलब एक के पीछे एक ना जाने तीन,चार,पांच कितने वाहन चलते हैं। जाहिर है वाहन चलते हैं तो इंधन भी खर्च होता होगा। अब साइकिल चलाने वाले मंत्रियों को इतनी ही चिंता महंगाई की है तो अपने ताम-झाम को कुछ कम करके एकात वाहन अपने काफिले से यदि कम कर दें तो लाखों लीटर ईंधन की बचत कर सकते हैं। लेकिन वो ऐसा करेंगे नहीं क्योकि यदि वो ऐसा करेंगे तो पावरफुल मंत्री कैसे कहलाएंगे। क्योंकि पावरफुल दिखना है तो ताम-झाम तो दिखाना ही होगा। अब ऐसे दिखावा करके खबरों में आने के लिए इस तरह की हरकत करने वाले नेताओं को कौन समझाए कि जनता इतनी बेवकूफ नहीं है भैय्या बस उसकी कमजोरी सिर्फ इतनी है कि वो अपना गुस्सा सड़क प्रदर्शित नहीं कर सकती?

Saturday, February 13, 2010

ऐश्वेर्या को बुखार. पहले पन्ने पर खबर


कितनी संवेदनशील है मीडिया


बॉलीवुड अभिनेत्री ऐश्वेर्या को बुखार हो गया. बुखार न हुआ कोई पहाड़ टूट पड़ा हो. एक बड़े समाचार पत्र ने इस खबर को पहले पन्ने पर फोटो के साथ छापा. खबर पढने के बाद मुझे लगा कि एक गरीब असहाय जो लाइलाज बीमारी से तड़पता रहता है उसकी पीड़ा उसके सामने से गुजरने वाले मीडिया कर्मियों को नहीं दिखती पता नहीं क्यों आज हर वर्ग इतना मतलबी हो गया है. खबर भी आजकल औकात देखकर बनाई जाती है.बड़े आदमी को छीक आ जाये तो खबर बन जाती है.और गरीब बेमौत मर जाए उसे अखबार जगह तक नहीं मिल पाती.यदि कभी कभार जगह मिल भी जाती है तो ऐसी जगह होती है जिन पन्नो को पाठक पढता ही नहीं है.हमारे प्रदेश में कई स्थानों पर लोगों को खाना (२ रूपए किलो चावल ) तक नहीं मिल रहा है लेकिन शिकायत के बाद भी खबर लग जाए तो बहुत बड़ी बात है.कहने का मतलब यह है कि जिस उद्देश्य के लिये मीडिया का जन्म हुआ है अगर उसमे उन्ही चीजों को स्थान नहीं मिलेगा तो ऐसी मीडिया का क्या मतलब?

Friday, February 12, 2010

बदल गयी है प्यार की परिभाषा

बदल गयी है प्यार की परिभाषा




खबर है कि वैलंटाइंस डे पर कंडोम

                                                                                                
और वायग्रा की बिक्री बढ़ गयी.


वैलंटाइंस डे प्रपोज करने का सबसे अच्छा दिन है। कहते हैं ना प्यार का रास्ता पेट से होकर जाता है। डेली मेल में छपे सर्वे के मुताबिक, महिलाओं को अगर अच्छे से रेस्तरां के रूमानी माहौल में कुछ खिलाकर प्रपोज किया जाए तो उन्हें यह काफी अच्छा लगता है। लेकिन खबर पढ़कर तो ऐसा लगता है कि प्यार का रास्ता पेट ही नहीं पेट के ......? वैलंटाइंस डे के बारे में मैंने जब पहली बार सुना था तब ये जानता था कि इस दिन नए प्रेमी अपने प्रेम का इजहार करते है. ऐसे तो वैलंटाइंस डे प्यार के खूबसूरत एहसास को व्यक्त करने का अवसर होता है, मगर अनजाने में ही कुछ लोगों ने इसकी गलत परिभाषा भी गढ़ ली है। यही वजह है कि इस मौके पर वायग्रा जैसी दवाओं का मिस यूज बढ़ जाता है। हालत यह होती है कि, वैलंटाइंस डे के अंतिम चार दिनों में वायग्रा जैसी दवाओं की बिक्री में 40 पर्सेंट की बढ़ोतरी हो जाती है और 90 पर्सेंट खरीदार युवा होते हैं, जिन्हें इसकी कोई जरूरत ही नहीं होती। इसे प्यार कहें या फिर सेक्स या फिर प्यार के नाम पर धोखा. क्योंकि मै समझता हूँ कि प्यार और सेक्स में काफी अंतर होता है लेकिन आज-कल के युवाओं कि यह सोच हो गयी है कि जिससे हम प्यार करते है उससे सेक्स करना हमारा अधिकार है. इस सोच के लिए फिल्मे ज्यादा जिम्मेदार मानी जा सकती है. जानकारों की माने तो वैलंटाइंस डे संत वैलंटाइंस के नाम पर पड़ा है जो प्यार करने की सिख देते थे. पर युवाओं ने इसे सेक्स के दिन के लिए चुन लिया है. समाज में बढ़ रहे खुलेपन और टीवी चैनलों तथा फिल्मों को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है. वैलंटाइंस डे अपने चाहने वाले को प्रपोज करने, घूमने फिरने, खुशी मनाने के लिए बना है, लेकिन इस मौके पर कुछ लोग सुपर मैन बन जाना चाहते हैं।

Tuesday, February 9, 2010

सिस्टम में सब चोर हैं



सिस्टम में सब चोर हैं


लोगों के जाए बिना ही कैसे खुल


जाते हैं खाते
 


छत्तीसगढ़ के कृषि सचिव ने राज्य के कई ऐसे गरीबों को लखपति बना दिया था जिनके पास दो वक्त की रोटी जुटाने का भी साधन नहीं है. ये काम भले का होता, यदि जिनके नाम खाता है उन्हें इस बात की जानकारी होती और वो इस खाते का खुद संचालन कर पाते. काले धन को सफ़ेद बनाने का ये खेल क्या सिर्फ कृषि सचिव के चाह लेने से संभव हो पाता.क्या बैंक के अफसर को इस बात के लिए जिम्मेदार नहीं माना जा सकता की जो व्यक्ति बैंक आया ही नहीं है उसके नाम का पास बुक, उसके नाम से चैक आखिर कैसे जारी हो गया. और उस खाते से लाखों रुपये का लेनदेन इन खातेदार की उपस्थिति के कैसे हो रहा था. जाहिर है सिस्टम में सब चोर हैं क्योंकि बिना बैंक अफसरों के सहयोग के इतना बड़ा खेल कर पाना संभव नहीं हैं. लोग बताते हैं की जिस बैंक के बारे में चर्चा छिड़ी है उसके बारे में ऐसी जानकारी है कि वहां सहर के कई और नामी लोगों की इसी तरह कई खाते चल रहे है. यदि उस बैंक के खतों की जाँच की जाए तो निश्चित ही कई बड़े लोगों के फर्जी खातों का पता चल सकता है. कलयुग में सच और सच के रास्ते पर चलने वाले लोगों को आसानी से सुख नसीब हो पाना संभव नहीं है.क्योंकि आज का पूरा सिस्टम ही बिकाऊ और भ्रष्ट है और चोरों के कारण चंडाल राज कर रहें हैं. अभी की घटना में इतना बवाल होने के बाद भी सरकार ने सिर्फ बयान ही जारी किया है कारवाई करने की हिम्मत हो ही नहीं रही है ऐसे में जांच में फंसे अफसर को भी हिम्मत आ गयी की पत्रकारों को बुलाकर बोल रहा है कि मै बेक़सूर हूँ. ये तो इस बात कि इन्तहां हो गयी कि पहले चोरी ऊपर से सीनाजोरी. इतनी मोटी तनखा होने,सरकार द्वारा तमाम सुख-सुविधा देने के बाद भी इस तरह लूट खसोट मचा रखें है तो फिर आम जनता का भला हो पायेगा ये सोचना भी मुश्किल है. नेता हो या मंत्री हर कोई अपनी जिंदगी भर की कमाई एक साथ कमा लेना चाह रहा है. इस पर रोक लगाने के लिए हर पांच साल में सभी अफसरों के खाते और उनकी संपत्ति की जांच करना अनिवार्य कर देना चाहिए ताकि काली कमाई पर कुछ हद तक रोक लग सके.

Monday, February 8, 2010

आमदनी अठन्नी खर्चा दो रुपैया

आमदनी अठन्नी खर्चा दो रुपैया



बढ़ती महंगाई से आम जनता त्रस्त


लोकतंत्र में जी रहे देश के आम लोगों के लिए दो वक्त की रोटी की जुगाड़ भी मुश्किल हो गई है। हर छ: माह में बेहिसाब बढ़ जाने वाली महंगाई ने आम जनता का हाल इतना बेहाल कर दिया है कि उसे अभावों में जीने की आदत पड़ती जा रही है। ऐसा नहीं कि बाजार में किसी चीज की कमी है. बाजार में जरुरत की सभी चीजें उपलब्ध होने के बाद भी बढ़ती महंगाई के कारण लोग चाह कर भी कई चीजों पर अपना मन मार लेते हैं। क्योंकि उन्हें घर परिवार की दूसरी जरुरतों को भी पूरा करना पड़ता है। पहले कहावत हुआ करती थी कि आमदनी अठन्नी खर्चा रुपैया, यह कहावत उन लोगों के लिए लागू होती थी जिनकी कमाई कम और खर्च ज्यादा हुआ करते थे। अब भी यह कहावत लागू होती लेकिन आज के समय में ये खर्ते मजबूरी में लोगों से कराए जा रहे हैं सरकार के द्वारा। क्योंकि पहले इस मुहावरे को जबरिया खर्चे बढ़ाने वाले लोगों पर लागू किया जाता था पर वर्तमान में यह सभी पर लागू हो रहा है। जान निकाल लेनी वाली महंगाई ने पूरे देश के आम लोगों की कमर तोड़ कर रख दी है। ना चाहते हुए भी लोगों की खर्च करना पड़ रहा है क्योंकि यदि जरुरत की चीजों पर खर्च नहीं करेगा तो जीवन कैसे चलेगा। नेताओं की ओर से लगातार यह बयान आते रहते हंै कि कीमतों पर लगाम लगाई जाएगी। लेकिन पिछले डेढ़ दशक में महंगाई हावी हुई है उसका हर कोई जीता जागता सबूत है। लोगों को यह भी पता है कि एक बार जिस वस्तु की कीमत बढ़ी दोबारा उसका मूल्य कभी कम नहीं हुआ। इस पर ना तो नेता लगाम लगा सकते हैं और ना ही देश के नौकरशाह। बढ़ती महंगाई पर यदि कोई लगाम लगा सकता है तो वह है देश की जनता। क्योंकि यही वह जनता है जिसके दम पर नेता कुर्सी पर बैठता है लेकिन जनता कब अपनी ताकत को पहचानेगी कि वो चाहें तो देश,प्रदेश के मुखिया बने लोगों को जब चाहे तब कुर्सी से उतार फेंक सकती है। लेकिन इसके बाद भी कभी जनता उग्र नही होती। सरकार जितनी दाम बढ़ाती है उसे सरकारी फरमान मान कर उसे अपना लेते हैं। यदि जनता उग्र रुप लेकर इनका विरोध करे तो सरकार के इस रवैये पर काफी हद तक रोक लगाई जा सकती है। आज बाजार पर नजर डालें तो हम पाते हैं कि दाल हो तेल,चीनी हो यह दूध या फिर हो रसोई गैस हो या पेट्रोल हर चीज लोगों से जुड़ी है जिनका दैनिक उपयोग करना जरुरी है ऐसे में कोई इन चीजों का उपयोग ना करे तो उनका जीना दूभर हो जाएगा। महंगाई से लोगों की जान तो निकल ही रही पर यदि जनता नहीं जागी तो आने वाले समय में इस तरह की चौकानें वाली खबरें भी सामने आ सकती है कि महंगाई के कारण किसी ने जान दे दी।

Thursday, February 4, 2010

मनमोहन की पहल पर यदि हो जाये अमल...


मनमोहन की पहल पर
यदि हो जाये अमल...

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भ्रष्टाचार रोकने मंत्रियों के लिए जो फरमान जारी किया है ,यदि उस पर अमल हो जाये देश का भला हो जायेगा. क्योंकि देश का हर मंत्री चाहे वो किसी भी राज्य का हो अपने पद का खुलेआम दुरुपयोग कर रहा है. जिस विभाग का वह मंत्री है उस पर ध्यान देने की बजाय अपने दूसरे व्यवसाय पर ज्यादा ध्यान देता है. मंत्री पद मिलने के बाद तो जैसे वह यह सोचने लगता है कि अगली बार मौका मिलेगा कि नहीं। इसलिए पांच साल के कार्यकाल में पूरी जिन्दगी कि कमाई कर लेने चाहता है, और अपने इसी उद्देश्य को पूरा करने सरकार के पैसों का अनाप-शनाप उपयोग कर अपना खजाना भरना चालू कर देते है. कई तरह सरकारी पैसों को अपने फायदे के लिए उपयोग करते है. इस काम में नौकरशाहों का वे भरपूर उपयोग करते है, क्योंकि बिना इनके सहारे कोई भी मंत्री अपनी जेब नहीं भर सकता. मनमोहन जी की इस पहल से ऐसे मंत्रियों के पांव तले जमीन खिसक गयी जो सिर्फ इसी काम में लगे है. वर्तमान देश के किसी भी राज्य में ऐसे किसी मंत्री का मिलना मुश्किल है जो भ्रष्ट न हो. मंत्रियों के पारिवारिक स्थिति पर नजर डालेंगे तो पता चल जायेगा की जो मंत्री बनने के पहले एक कार भी मालिक नहीं होता था वह मंत्री बनते ही करोड़ों की सम्पति का मालिक बन जाता है. आखिर क्या जादू हो जाता है मंत्री पद मिलते ही? जिस नेता का पुत्र कभी राज्य के बाहर नहीं गया होता,मंत्री पद मिलते ही वह हवाई यात्रा कर विदेशों के शैर पर निकल जाता है. देश के बाहर पढने(ऐश) करने चला जाता है. इसे देखने वाला कोई नहीं है. उसे ये पूछने वाला कोई नहीं है कि ये सब कहाँ के पैसों से आ रहा है.मनमोहन जी की इस फरमान को यदि ठीक ढंग से लागु करना है तो मंत्रियों को यह भी निर्देशित करना चाहिए कि मंत्री बनने के पहले उनकी सम्पति कितनी थी और अब कितनी है. मंत्रियों के साथ-साथ नौकरशाहों को भी अपनी सम्पति घोषित करने के निर्देश देने चाहिए क्योंकि किसी मंत्री या नेता को भ्रष्ट बनाने में नौकरशाहों का पूरा-पूरा योगदान होता है.यदि देर से ही सही इस पहल की शुरुवात हो जाती है तो निश्चित ही आने वाले समय में भ्रटाचार पर कुछ हद तक रोक लगायी जा सकती है.

friendship


Wednesday, December 23, 2009

प्रकृति की अनुपम कृति गंगरेल


प्रकृति की अनुपम कृति गंगरेल

जल ही जीवन है- जल से ही जीवन है, जल है तो सब कुछ है, जल नहीं तो कुछ भी नहीं- जल बिन सब सून। प्रकृति के हर चरण में जल से परिपूर्ण दृश्य-सदृश्य सौन्दर्य बोध कराते हैं, और खासकर जहां पहाडिय़ों से घिरा दूर-दूर तक पानी ही पानी नजर आये तो फिर क्या कहने वहीं का मंजर हर मौसम में सुकून भरा होता है। चंचल जल और ठहरा हुआ धीमा हलचल कल। कल हर तरह से प्रकृति के चितेरों को तृप्त करता है। आज हम छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े बांध गंगरेल के ऊपर खड़े हैं- यहां का नजरा मीलों तक पानी भरा अत्यंत सुंदर मधुर नमी स्पर्शमय है। गंगरेल बॉंध 2 किलोमीटर में एक फलांग कम 1830 मीटर लंबा है। इसके 14 विशाल रेडियल गेट (टेन्टर गेट) हैं, जो घूमते हुए खुलते हैं, सामान्य स्थिति में यहां 27 टीएमसी (टन मिलियन क्यूबिक मीटर) जल मौजूद रहता है। यहां से नीचे जाने पर गैलेरी में गंगरेल डेम रविशंकर सागर परियोजना का सबसे प्रमुख आकर्षण है ,यह एक सुरंग है, जो डेम के निचले हिस्से में लगभग 1 किलोमीटर लंबी है। इसका उद्देश्य अंदर का निरीक्षण व रिसाव पर नजर रखना भी है, लेकिन यहां आकर एक आश्चर्य अनुभूति की यात्रा चरम सीमा पर आना स्वाभाविक हो जाती है। यहां एक सुंदर लिफ्ट गार्डन है जहां डेम के ऊपर से लिफ्ट से आने की भी व्यवस्था है। यहां 10 मेगावाट विद्युत उत्पादन का कार्य प्रगति पर है। यहां बोटिंग और वाटर गेम्स तथा पर्यटन की प्रचूर संभावनाओं की भरमार है। डेम की मछलियां भी यहां प्रसिद्घ हैं। अब हम है अंगार मोती देवी के मंदिर की ओर पहुंचते हैं। यह गंगरेल डेम से लगा हुआ अत्यंत प्रसिद्घ है। दीपावली के बाद के शुक्रवार में यहां मड़ई (मेला) लगता है, इस अंचल के नामी नाचा पार्टी इस मेले के खास आकर्षण होते हैं। यहीं गंगरेल कॉलोनी है जो गंगरेल के कर्मचारियों का निवास है। गंगरेल से 4 कि.मी. दूर खूबचंद बघेल बराज (छोटा डेम पुलिया) है जहां मुख्य नहरों को सिंचाई के लिए दिशा दी गई है। इसका दृश्य सुंदर है। यहां से 40 किमी दूरी पर मुरूमसिली (माडम) डेम ब्रिटिश गवर्नमेन्ट का बनाया साइफन स्पील व ऑटोमेटिक पद्घति का दर्शनीय है। हमारा अगला पड़ाव धमतरी है। राष्ट्रीय राजमार्ग 43 पर धमतरी छोटा किंतु नामी शहर है। यहां प्रदेश का पहली नगर पालिका है जहां कचरे से खाद तैयार किया जाता है। धान की पैदावार का सबसे महत्वपूर्ण जगह धमतरी। बिलाईमाता मंदिर यहां का सबसे बड़ा एवं महत्वपूर्ण है। धमतरी और रायपुर के बीच चलने वाली नेरो गेज छोटी रेल लाइन की रेलगाड़ी बड़ी सुंदर है। इसकी कम रफ्तार व समतल क्षेत्र से गुजरते हुए दृश्य को कैमरे में कैद करना न भूलें। दूरी- राष्ट्रीय राजमार्ग 43 पर धमतरी, रायपुर से 77 कि.मी. दूर तथा गंगरेल धमतरी से 11 किमी पर स्थित है। रायपुर से धमतरी तक के लिए छोटी लाइन रेल सेवा भी उपलब्ध है।
पड़ाव- धमतरी में सभी प्रकार की ठहरने व खाने की सुविधा है। बेहतर सुविधा के लिये रायपुर रूकना अच्छा रहता है। चल चित्र में जल चित्र का अति महत्व स्थान है। इसका रूपांकन यहां बेहतरीन तरीके से किया जा सकता है।

Sunday, December 20, 2009

छत्तीसगढ़ का इतिहास



छत्तीसगढ़
छत्तीसगढ़ भारत का एक राज्य है। छत्तीसगढ़ राज्य का गठन १ नवंबर २००० को हुआ था। यह भारत का २६वां राज्य है । भारत में दो क्षेत्र ऐसे हैं जिनका नाम विशेष कारणों से बदल गया - एक तो 'मगध' जो बौद्ध विहारों की अधिकता के कारण "बिहार" बन गया और दूसरा 'दक्षिण कौशल' जो छत्तीस गढ़ों को अपने में समाहित रखने के कारण "छत्तीसगढ़" बन गया। किन्तु ये दोनों ही क्षेत्र अत्यन्त प्राचीन काल से ही भारत को गौरवान्वित करते रहे हैं। "छत्तीसगढ़" तो वैदिक और पौराणिक काल से ही विभिन्न संस्कृतियों के विकास का केन्द्र रहा है। यहाँ के प्राचीन मन्दिर तथा उनके भग्नावशेष इंगित करते हैं कि यहाँ पर वैष्णव, शैव, शाक्त, बौद्ध के साथ ही अनेकों आर्य तथा अनार्य संस्कृतियों का विभिन्न कालों में प्रभाव रहा है।
छत्तीसगढ़ के उत्तर और उत्तर-पश्चिम में मध्यप्रदेश का रीवां संभाग, उत्तर-पूर्व में उड़ीसा और बिहार, दक्षिण में आंध्र प्रदेश और पश्चिम में महाराष्ट्र राज्य स्थित हैं। यह प्रदेश ऊँची नीची पर्वत श्रेणियों से घिरा हुआ घने जंगलों वाला राज्य है। यहाँ साल, सागौन, साजा और बीजा और बाँस के वृक्षों की अधिकता है। छत्तीसगढ़ क्षेत्र के बीच में महानदी और उसकी सहायक नदियाँ एक विशाल और उपजाऊ मैदान का निर्माण करती हैं, जो लगभग 80 कि.मी. चौड़ा और 322 कि.मी. लम्बा है। समुद्र सतह से यह मैदान करीब 300 मीटर ऊँचा है। इस मैदान के पश्चिम में महानदी तथा शिवनाथ का दोआब है। इस मैदानी क्षेत्र के भीतर हैं रायपुर, दुर्ग और बिलासपुर जिले के दक्षिणी भाग। धान की भरपूर पैदावार के कारण इसे धान का कटोरा भी कहा जाता है। मैदानी क्षेत्र के उत्तर में है मैकल पर्वत शृंखला। सरगुजा की उच्चतम भूमि ईशान कोण में है । पूर्व में उड़ीसा की छोटी-बड़ी पहाड़ियाँ हैं और आग्नेय में सिहावा के पर्वत शृंग है। दक्षिण में बस्तर भी गिरि-मालाओं से भरा हुआ है। छत्तीसगढ़ के तीन प्राकृतिक खण्ड हैं : उत्तर में सतपुड़ा, मध्य में महानदी और उसकी सहायक नदियों का मैदानी क्षेत्र और दक्षिण में बस्तर का पठार। राज्य की प्रमुख नदियाँ हैं - महानदी, शिवनाथ, खारुन, पैरी , तथा इंद्रावती नदी[
छत्तीसगढ़ का इतिहास
मुख्य लेख: रामायणकालीन छत्तीसगढ़
छत्तीसगढ़ प्राचीनकाल के दक्षिण कोशल का एक हिस्सा है और इसका इतिहास पौराणिक काल तक पीछे की ओर चला जाता है। पौराणिक काल का 'कोशल' प्रदेश, कालान्तर में 'उत्तर कोशल' और 'दक्षिण कोशल' नाम से दो भागों में विभक्त हो गया था इसी का 'दक्षिण कोशल' वर्तमान छत्तीसगढ़ कहलाता है। इस क्षेत्र के महानदी (जिसका नाम उस काल में 'चित्रोत्पला' था) का मत्स्य पुराण[क], महाभारत[ख] के भीष्म पर्व तथा ब्रह्म पुराण[ग] के भारतवर्ष वर्णन प्रकरण में उल्लेख है। वाल्मीकि रामायण में भी छत्तीसगढ़ के बीहड़ वनों तथा महानदी का स्पष्ट विवरण है। स्थित सिहावा पर्वत के आश्रम में निवास करने वाले श्रृंगी ऋषि ने ही अयोध्या में राजा दशरथ के यहाँ पुत्र्येष्टि यज्ञ करवाया था जिससे कि तीनों भाइयों सहित भगवान श्री राम का पृथ्वी पर अवतार हुआ। राम के काल में यहाँ के वनों में ऋषि-मुनि-तपस्वी आश्रम बना कर निवास करते थे और अपने वनवास की अवधि में राम यहाँ आये थे।
इतिहास में इसके प्राचीनतम उल्लेख सन 639 ई० में प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्मवेनसांग के यात्रा विवरण में मिलते हैं। उनकी यात्रा विवरण में लिखा है कि दक्षिण-कौसल की राजधानी सिरपुर थी। बौद्ध धर्म की महायान शाखा के संस्थापक बोधिसत्व नागार्जुन का आश्रम सिरपुर (श्रीपुर) में ही था। इस समय छत्तीसगढ़ पर सातवाहन वंश की एक शाखा का शासन था। महाकवि कालिदास का जन्म भी छत्तीसगढ़ में हुआ माना जाता है। प्राचीन काल में दक्षिण-कौसल के नाम से प्रसिद्ध इस प्रदेश में मौर्यों, सातवाहनों, वकाटकों, गुप्तों, राजर्षितुल्य कुल, शरभपुरीय वंशों, सोमवंशियों, नल वंशियों, कलचुरियों का शासन था। छत्तीसगढ़ में क्षेत्रीय राजवंशो का शासन भी कई जगहों पर मौजूद था। क्षेत्रिय राजवंशों में प्रमुख थे: बस्तर के नल और नाग वंश, कांकेर के सोमवंशी और कवर्धा के फणि-नाग वंशी। बिलासपुर जिले के पास स्थित कवर्धा रियासत में चौरा नाम का एक मंदिर है जिसे लोग मंडवा-महल भी कहा जाता है। इस मंदिर में सन् 1349 ई. का एक शिलालेख है जिसमें नाग वंश के राजाओं की वंशावली दी गयी है। नाग वंश के राजा रामचन्द्र ने यह लेख खुदवाया था। इस वंश के प्रथम राजा अहिराज कहे जाते हैं। भोरमदेव के क्षेत्र पर इस नागवंश का राजत्व 14 वीं सदी तक कायम रहा।१०

साहित्य
छत्तीसगढ़ साहित्यिक परम्परा के परिप्रेक्ष्य में अति समृद्ध प्रदेश है। इस जनपद का लेखन हिन्दी साहित्य के सुनहरे पृष्ठों को पुरातन समय से सजाता-संवारता रहा है। श्री प्यारेलाल गुप्त अपनी पुस्तक "प्राचीन छत्तीसगढ़" में बड़े ही रोचकता से लिखते है। [२] छत्तीसगढ़ी और अवधी दोनों का जन्म अर्धमागधी के गर्भ से आज से लगभग 1080 वर्ष पूर्व नवीं-दसवीं शताब्दी में हुआ था।"[३]
भाषा साहित्य पर और साहित्य भाषा पर अवलंबित होते है। इसीलिये भाषा और साहित्य साथ-साथ पनपते है। परन्तु हम देखते है कि छत्तीसगढ़ी लिखित साहित्य के विकास अतीत में स्पष्ट रुप में नहीं हुई है। अनेक लेखकों का मत है कि इसका कारण यह है कि अतीत में यहाँ के लेखकों ने संस्कृत भाषा को लेखन का माध्यम बनाया और छत्तीसगढ़ी के प्रति ज़रा उदासीन रहे।इसीलिए छत्तीसगढ़ी भाषा में जो साहित्य रचा गया, वह करीब एक हज़ार साल से हुआ है।
अनेक साहित्यको ने इस एक हजार वर्ष को इस प्रकार विभाजित किया है :
छत्तीसगढ़ी गाथा युग:सन् 1000 से 1500 ई. तक
छत्तीसगढ़ी भक्ति युग - मध्य काल,सन् 1500 से 1900 ई. तक
छत्तीसगढ़ी आधुनिक युग: सन् 1900 से आज तक
ये विभाजन साहित्यिक प्रवृत्तियों के अनुसार किया गया है यद्यपि प्यारेलाल गुप्त जी का कहना ठीक है कि - " साहित्य का प्रवाह अखण्डित और अव्याहत होता है।" [४]
यह विभाजन किसी प्रवृत्ति की सापेक्षिक अधिकता को देखकर किया गया है।एक और उल्लेखनीय बत यह है कि दूसरे आर्यभाषाओं के जैसे छत्तीसगढ़ी में भी मध्ययुग तक सिर्फ पद्यात्मक रचनाएँ हुई है।
संस्कृति
आदिवासी कला काफी पुरानी है । हिंदी लगभग सभी जगह बोली जाती है पर मूल भाषा छत्तीसगढ़ीहै।
लोकगीत और लोकनृत्य
छत्तीसगढ़ के गीत दिल को छु लेती है यहाँ की संस्कृति में गीत एवं नृत्य का बहुत महत्व है। इसीलिये यहाँ के लोगों में सुरीलीपन है। हर व्यक्ति थोड़े बहुत गा ही लेते है। और सुर एवं ताल में माहिर होते ही है।
यहां के गीतों में से कुछ हैं:
के
लोकगीत
भोजलीपंडवानीजस गीतभरथरी लोकगाथा • बाँस गीतगऊरा गऊरी गीतसुआ गीतछत्तीसगढ़ी प्रेम गीतदेवार गीतकरमाछत्तीसगढ़ी संस्कार के iit
छत्तीसगढ़ के लोकगीत में विविधता है, गीत अपने आकार में छोटे और गेय होते है। गीतों का प्राणतत्व है भाव प्रवणता। छत्तीसगढ़ी लोकभाषा में गीतों की अविछिन्न परम्परा है।छत्तीसगढ़ के प्रमुख और लोकप्रिय गीतों है - सुआगीत, ददरिया, करमा, डण्डा, फाग, चनौनी, बाँस गीत, राउत गीत, पंथी गीत।
सुआ, करमा, डण्डा, पंथी गीत नृत्य के साथ गाये जाते है। सुआ गीत करुण गीत है जहां नारी सुअना (तोता) की तरह बंधी हुई है। गोंड जाति की नारियाँ दीपावली के अवसर पर आंगन के बीच में पिंजरे में बंद हुआ सुआ को प्रतीक बनाकर (मिट्टी का तोता) उसकेचारो ओर गोलाकार वृत्त में नाचती गाती जाती हैं। इसालिए अगले जन्म में नारी जीवन पुन न मिलने ऐसी कामना करती है।
राऊत गीत दिपावली के समय गोवर्धन पूजा के दिन राऊत जाति के द्वारा गाया जाने वाला गीत है। यह वीर-रस से युक्त पौरुष प्रधान गीत है जिसमें लाठियो द्वारा युद्ध करते हुए गीत गाया जाता है। इसमें तुरंत दोहे बनाए जातें हैं और गोलाकार वत्त में धूमते हुए लाठी से युद्ध का अभ्यास करते है। सारे प्रसंग व नाम पौराणिक से लेकर तत्कालीन सामजिक / राजनीतिक विसंगतियों पर कटाक्ष करते हुए पौरुष प्रदर्शन करते है।