Saturday, April 24, 2010
Tuesday, March 30, 2010
Saturday, March 27, 2010
Tuesday, March 23, 2010
Monday, March 8, 2010
महिला आरक्षण बिल. दबी-कुचली और योग्य महिलाओं को लाभ मिले तब होगा फलीभूत.
८ मार्च को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर महिलाओं को लोकसभा और विधानसभा में ३३ फीसदी आरक्षण के लिए बिल लाया गया.जिस तरह नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज ने अपने बयान में कहा कि पिछले १३ साल से अटके इस बिल को इस बार हम पास कराना चाहते है. इससे ऐसा लगता है कि इस बार ये बिल पास हो जायेगा. लेकिन वर्तमान परिस्थिति पर नज़र डालें तो इस बिल के पास हो जाने के बाद इस बात की चिंता जरुर जेहन में उठती है कि क्या इसका लाभ उन महिलाओं को मिल पायेगा जो निम्न वर्ग की और दबी-कुचली हैं? और उन महिलाओं को जो योग्य तो है लेकिन जिन्हें आगे बढने से रोका जाता है? क्योंकि अभी हालिया निबटे लोकल चुनाव पर नज़र डालें तो ऐसी अधिकांश महिलाये चुनाव जीत कर आई है जिनके परिवार का कोई न कोई पुरुष सदस्य राजनीति से जुड़ा है. आरक्षण के बाद ऐसे राजनीतिज्ञों की तो निकल पड़ेगी. क्योंकि आरक्षण के बाद इसका सबसे ज्यादा फायदा भी ऐसे ही राजनीतिज्ञ उठाने वाले है. सुषमा स्वराज ने रायपुर में अपने एक बयान में ये कहा कि जब तक महिलाए राजनीतिक रूप से सशक्त नहीं होंगी तब तक महिला सशक्तिकरण का कोई फायदा नहीं. इसी में मै ये कहना चाहता हूँ कि क्या राजनीतिज्ञों के परिवारों से जुडी महिलाओं के राजनीति में आने से महिला सशक्त होगी या फिर उन महिलाओं के आने से जो अपने दम पर राजनीति में आई है. क्यों भारत वर्ष का इतिहास रहा है कि यहाँ लाभ उठाना तो पद पर बैठे लोगों कि बपौती है. इस बिल का उद्देश्य तभी सफल होगा जब इसका फायदा सही महिलाओं को मिलेगा.
Thursday, March 4, 2010
योग छोड़ भोग में लिप्त हैं कई बाबा.उनके भक्तों का क्या?

भीमानंद,नित्यानंद और ना जाने कितने आनंद. तथाकथित बाबाओं ने पैसा कमाने का ऐसा तरीका इजाद किया है कि अच्छे-अच्छे को भनक तक ना लगे,लेकिन कहते है ना कि पाप का घड़ा भरते देर नहीं लगती. कोई बाबा सेक्स के कारोबार में करोड़ो अन्दर कर रहा है तो कोई सेक्स का आनंद लेने के लिए हेरोइन के साथ हमबिस्तर हो रहा है. ·कोई झूटे दावे करके लोगों को उल्लू बना रहा है तो कोई डर दिखाकर रुपये वसूल रहा है. देश में बाबाओं ने पैसा कमाने का एक बढ़िया धंधा बना लिया है.कई बाबाओं कि शक्ल ही ऐसी दिखती है जैसे किसी जेल से छूटे आरोपी की होती है. हमारे देश में धर्म-कर्म पर आस्था रखने-वालों कि कमी नहीं है इसी का फायदा ढोंगी बाबा बड़ी आसानी से उठा लेते है. उन्हें उन मासूम लोगों की भावनाओं से कोई लेना-देना नहीं जो उन पर अपना अटूट विश्वास रखते है.उन्हें तो बस अपनी झोली भरने और ऐश करने से मतलब है. यदि इन बाबाओं की करतूत पर गौर करें तो ऐसा लगता है कि नौकरी किये बिना, मेहनत किये बिना पैसा आसानी से कमाने के उद्देश्य और तमाम ऐशों आराम आसानी से पाने के लिए तथा पैसा कमाने कि जद्दोजहद से बचने के लिए बाबा बन जाते है. ताकि उनकी सारी जरूरते पूरी हो जाए. आज दीन-दुनिया के चक्कर में पड़ा आदमी पुण्य के चक्कर में बाबाओं के चक्कर में आसानी से पड़ जाता है इसका फायदा कथित ढोंगी किस्म के बाबा लगातार उठाते रहते है.बात तब खुलती है जब बाबा अपनी कई हदें पार कर देता है. भविष्य बताने, परेशानियों से बचाने का झांसा देकर लोगों को ठगने वालों की आज भी कमी नहीं है.कई समाचार-पत्रों में भी बाकायदा ऐसे बाबाओं द्वारा विज्ञापन देकर अपना धंधा चलाया जा रहा है.यदि इस तरह से ठगी करने वाले लोगों पर नज़र रखने निगरानी समिति बनाई जाये तो ठगी के इस कारोबार पर काफी हद तक रोक लगाई जा सकती है.
Monday, March 1, 2010
indian hockey team

चक दे इंडिया
भारतीय हांकी टीम
गोलकीपर: एड्रियन डी'सूजा, पीआर श्रीजेश
डिफ़ेंडर: संदीप सिंह, धनंजय महादिक, दिवाकर राम
मिड फ़ील्डर: गुरबाज सिंह, सरदार सिंह, भारत, अर्जुन हलप्पा, दानिश मुजतबा, विक्रम पिल्लई
फ़ॉरवर्ड: राजपाल सिंह, शिवेंद्र सिंह, तुषार खांडेकर, प्रभजोत सिंह, सरवनजीत सिंह, दीपक ठाकुर, गुरविंदर सिंह चांडी
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खिलाडियों का परिचय
एड्रियन डीसूजा
जन्म 24-3-1984 पोजिशन गोल कीपर
मुंबई के डीसूजा जनवरी 2004 से भारतीय टीम में हैं। इसी साल वह भारत के प्लेयर ऑफ ईयर से नवाजे गए। अब तक वह देश के लिए 135 मैच खेल चुकेहैं।
दिवाकर राम
जन्म - 8-12-1989 पोजिशन- डिफेंडर
गोरखपुर के रहने वाले दिवाकर राम के दनदनाते ड्रैग फ्लिक की बदौलत ने भारत ने 2008 मैं साउथ कोरिया को हराकर जू. एशिया कप जीता था। सीनियर टीम में वह 14 मैच खेले हैं।
सरदारा सिंह
जन्म - 15-7-1986 पोजिशन - सेंटर, फुलबैक
पीएचएल में हैदराबाद सुल्तान और चंडीगढ़ डायनमोज के कप्तान रह चुके हरियाणा के सरदारा सिंह 2008 में भारतीय हॉकी टीम के सबसे युवा कप्तान में शुमार हुए।
गुरबाज सिंह
जन्म - 09-08-1988, पोजिशन - मिडफील्डर
76 मैच खेल चुके गुरबाज सिंह की कप्तानी में भारत ने जू. एशिया कप जीता था। किलोर्स्कर हॉकी एकेडमी का यह खिलाड़ी किसी भी मुकाबले का पासा पलटने का माद्दा रखते हैं।
भरत चिकारा
जन्म - 10-10-1986, पोजिशन - मिडफील्डर
हरियाणा के भरत चिकारा ने कोच जोएकिम कावोर्ल्हो के समय अंतरराष्ट्रीय कैरियर का आगाज किया था। चिकारा बहुत चतुर स्कोर हैं । वह अब तक 60 मैच खेल चुके हैं।
शिवेंदर सिंह
जन्म - 9-6-1987, पोजिशन - फारवर्ड
मध्य प्रदेश का यह युवा खिलाड़ी ने पहले कोच एसपी सिंह और बाद में गुरबक्स सिंह की निगरानी में हॉकी का ककहारा सीखा। 2006 में पदापर्ण के बाद से उन्होंने 102 मैच में 48 गोल दागे हैं।
दानिश मुज्तबा
जन्म - 20.12.1988, पोजिशन - मिडफील्डर
दिल्ली के दानिश मुज्तबा ने 2009 में कोच होसे ब्रासा की निगरानी में अपने कैरियर की शुरुआत की। वह अब तक राष्ट्रीय टीम से देश के लिए 10 मैच खेल चुके हैं।
राजपाल सिंह
जन्म - 08-08-1983, पोजिशन - फारवर्ड
कप्तान राजपाल सिंह अब तक 120 मैच खेल चुके हैं। खुद पर भरोसा करना उनकी ताकत है। उनका कहना है बेशक भारत को कठिन ग्रुप मिला है लेकिन टीम अंतिम चार में जगह बनाने में कामयाब रहेगी।
प्रभजोत सिंह
जन्म - 14.08.1980 पोजिशन - फारवर्ड
भारतीय हॉकी के सबसे तेज तर्रार लेफ्ट विंगर प्रभजोत सिंह मुख्य कोच ब्रासा के सबसे पसंदीदे और भरोसेमंद खिलाड़ी हैं। इसलिए ब्रासा ने बतौर कप्तान पंजाब के इस खिलाड़ी का नाम हॉकी इंडिया के सामने पेश किया था।
तुषार खांडेकर
जन्म - 05-04-1985
पोजिशन - फारवर्ड
एशिया कप 07 (गोल्ड) में भारतीय टीम का हिस्सा रह चुके तुषार खांडेकर ने अब तक देश के लिए 166 मैच खेले हैं और कुल 42 गोल दागे। उन्होंने आस्ट्रेलिया के खिलाफ टेस्ट सीरीज में भारत का नेतृत्व किया।
दीपक ठाकुर
जन्म - 28-12-1980,
पोजिशन - फारवर्ड
भारतीय हॉकी का हीरा है दीपक ठाकुर। यह कहना है कोच हरेंद्र सिंह, जिन्होंने 2009 अर्जेंटीना टूर पर उसे राष्ट्रीय टीम में वापस बुलाया। अर्जेंटीना दौरे पर वह एक अवतार के रूप उभरे।
पीआर श्रीजेश
जन्म - 8-5-1988, पोजिशन - गोलकीपर
केरल से लंबे समय बाद कोई राष्ट्रीय टीम में आया है तो वह है पीआर श्रीजेश। यह एक उदीयमान गोलकीपर है और उसे एंड्रियन डीसूजा के विकल्प के रूप में देखा जा रहा है।
श्रवणजीत सिंह
जन्म - 3-07-1988, पोजिशन - फारवर्ड
पंजाब के स्ट्राइकर श्रवणजीत ने 2007 सुल्तान अजलान शाह कप में कोच जोएकिम कार्वालहो की देखरेख में अंतरराष्ट्रीय कैरियर का आगाज किया था तब से वह 22 मैच खेल चुके हैं।
गुरविंदर सिंह चांदी
जन्म - 20-10-1989 पोजिशन - फारवर्ड
गुरविंदर गजब का फारवर्ड खिलाड़ी है। 2008 में आस्ट्रेलियन चार नेशंस टूर्नामेंट से सीनियर टीम में आगाज करने वाले गुरविंदर ने इस दौरे पर आठ मैचों में तीन गोल दागे थे।
विक्रम पिल्ले
जन्म - 27-11-1981 पोजिशन - मिडफील्डर 163 मैच खेल चुके विक्रम पिल्लै काफी डायनामिक मिडफील्डर हैं। 2004 हॉलैंड टेस्ट सीरीज में वह बेस्ट प्लेयर के खिताब से नवाजे गए।
अर्जुन हलप्पा
जन्म - 17-12-1980 पोजिशन - मिडफील्डर
वर्ल्ड कप में भारत के सबसे अनुभवी खिलाड़ी हैं अर्जुन हलप्पा। कनार्टक का यह खिलाड़ी अब तक 199 मैच खेल चुका है और 32 गोल दोग हैं। इस वर्ल्ड कप में उनपर काफी दारोमदार है।
धनंजय महादिक
जन्म - 5-11-1984 पोजिशन - मिडफील्डर
धनंजय ने अर्जेंटीना के साल्टा में चैंपियंस चैलेंज कप के दौरान खुद को बेहतरीन ऑलराउंडर साबित किया था। 28 मैच मेंं 10 गोल करने वाले महादिक लेफ्ट फुलबैक और मिडफील्डर भी हैं।
संदीप सिंह
जन्म - 27-2-1986 पोजिशन - डिफेंडर
ड्रैग फ्लिकर संदीप सिंह को 18 बरस की उम्र में भारत की सीनियर टीम में खेलने का मौका मिला। उन्होंने 2004 में जूनियर एशिया कप जीतने में अहम भूमिका निभाई।
Sunday, February 28, 2010
Thursday, February 25, 2010
सचिन तेंदुलकर . एक शख्स जिसने दे दी सारे जहाँ को ख़ुशी
सचिन तेंदुलकर .एक शख्स जिसने दे दी सारे जहाँ को ख़ुशी

आज के समय में जब लोगों के पास खुश हो पाने का भी समय नहीं है ऐसे में यदि मात्र एक शख्स करोड़ो लोगों को ख़ुशी दे-दे तो उसे क्या कहेंगे.ये या तो चमत्कार होगा या फिर किसी ऐसे इंसान की मेहनत का नतीजा जिसने अपने कर्म को पूजा माना हो.जी हाँ हम बात कर रहे है हमारे देश भारत के वंडर-बॉय(अब वंडर-मेन) सचिन तेंदुलकर की. आंकड़े बताते है की विश्व क्रिकेट के इतिहास में अब तक कुल २९६१ वन-डे मैच खेले जा चुके हैं लेकिन सचिन ने जो किया वह हर उस नामी क्रिकेटर का सपना होगा जो आज के फटाफट क्रिकेट का हिस्सा हैं लेकिन भारत के इस लाजवाब क्रिकेटर ने २४ फरवरी बुधवार को ग्वालियर में एक-दिवसीय क्रिकेट का पहला दौहरा शतक लगाया तब देश हर वो व्यक्ति गौरवान्वित हो गया जिसे अपने भारतीय होने पर गर्व है.क्यों वन-डे में डबल सेंचुरी किसी सपने से कम नहीं है.क्रिकेट के जानकार उसे क्रिकेट का भगवान् कहते है.लेकिन सचिन ऐसे शख्स है जिन्होंने कभी भी अपने खेल पर घमंड नहीं किया और इतनी ऊँची शख्सियत होने के बाद भी उनका व्यव्हार हमेशा हर किसी से दोस्ताना ही रहा है. इतनी लम्बी क्रिकेट खेलने के बाद भी आज तक कभी वो विवादों में नहीं रहे. सचिन ने बुधवार को पुरे ५० ओवर मैच खेलकर ये बता दिया की उनमे अभी कितना दम बांकी है.सचिन आज हर उस व्यक्ति का आदर्श होना चाहिए जो अपने परिवार तक को ख़ुशी दे पाने की कोशिश में थक जाता है लेकिन सचिन हमारे देश का एकमात्र ऐसा वंडर-बॉय (अब वंडर-मेन) है जिसने सारे जहाँ को ख़ुशी दे दी.

आज के समय में जब लोगों के पास खुश हो पाने का भी समय नहीं है ऐसे में यदि मात्र एक शख्स करोड़ो लोगों को ख़ुशी दे-दे तो उसे क्या कहेंगे.ये या तो चमत्कार होगा या फिर किसी ऐसे इंसान की मेहनत का नतीजा जिसने अपने कर्म को पूजा माना हो.जी हाँ हम बात कर रहे है हमारे देश भारत के वंडर-बॉय(अब वंडर-मेन) सचिन तेंदुलकर की. आंकड़े बताते है की विश्व क्रिकेट के इतिहास में अब तक कुल २९६१ वन-डे मैच खेले जा चुके हैं लेकिन सचिन ने जो किया वह हर उस नामी क्रिकेटर का सपना होगा जो आज के फटाफट क्रिकेट का हिस्सा हैं लेकिन भारत के इस लाजवाब क्रिकेटर ने २४ फरवरी बुधवार को ग्वालियर में एक-दिवसीय क्रिकेट का पहला दौहरा शतक लगाया तब देश हर वो व्यक्ति गौरवान्वित हो गया जिसे अपने भारतीय होने पर गर्व है.क्यों वन-डे में डबल सेंचुरी किसी सपने से कम नहीं है.क्रिकेट के जानकार उसे क्रिकेट का भगवान् कहते है.लेकिन सचिन ऐसे शख्स है जिन्होंने कभी भी अपने खेल पर घमंड नहीं किया और इतनी ऊँची शख्सियत होने के बाद भी उनका व्यव्हार हमेशा हर किसी से दोस्ताना ही रहा है. इतनी लम्बी क्रिकेट खेलने के बाद भी आज तक कभी वो विवादों में नहीं रहे. सचिन ने बुधवार को पुरे ५० ओवर मैच खेलकर ये बता दिया की उनमे अभी कितना दम बांकी है.सचिन आज हर उस व्यक्ति का आदर्श होना चाहिए जो अपने परिवार तक को ख़ुशी दे पाने की कोशिश में थक जाता है लेकिन सचिन हमारे देश का एकमात्र ऐसा वंडर-बॉय (अब वंडर-मेन) है जिसने सारे जहाँ को ख़ुशी दे दी.
Sunday, February 21, 2010
Friday, February 19, 2010
Sunday, February 14, 2010
साइकिल चलाने की बजाय यदि अपने काफिले से एक-एक गाड़ी कम कर लें मंत्री तो लाखों लीटर पेट्रोल बरबाद होने से बच जाएगा .
महंगाई का सब अपने -अपने तरीके से विरोध जता रहे हैं। लोकतंत्र है इसलिए जो जैसी मर्जी आए अपना दिमाग लगाकर कुछ ना कुछ नया कर पब्लिसिटी पाने की तलाश में रहते हैं। अभी छत्तीसगढ़ में महंगाई को लेकर काफी शोर मचा हुआ है। कोई दुकान लगाकर महंगे सामान बेच रहा है तो कोई महंगाई के लिए जिम्मेदार नेता का पुतला फूंक रहा है तो कोई बंद करवाकर दो वक्त की रोटी की जुगाड़ में निकलने वाले मजदूर के पेट में लात मार रहा है, तो कोई सिर्फ नारेबाजी से काम चला रहा है। ये कोई एक की संख्या में नहीं हैं बल्कि सैकड़ों हजारों की संख्या में हैं। जो महंगाई और ना जाने कितने प्रकार की चीजों को लेकर समय-समय पर सड़कों पर आते रहते हैं। उनकी इस करतूत से ना तो पहले कभी कुछ हुआ है और ना आगे कभी कुछ होने वाला है। सरकार में पद पर बैठे नेताओं को जैसा सरकार चलाना है वो वैसा ही चलाएंगे। अब बात करें महंगाई की तो महंगाई के विरोध में हमारे प्रदेश में काबिज भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री,मंत्री और तमाम विधायक (महिला विधायक और मंत्री भी शामिल हैं) साइकिल चलाकर विधानसभा जाएंगे। अब 12 किलोमीटर तक साइकिल चलाना मजाक तो नहीं। क्योंकि जो रोज साइकिल चलाता है उसके लिए 12 क्या 22 भी चलेगा। पर जो ना जाने कितने सालों से साइकिल चलाना तक भूल गए हैं ऐसे लोग 12 किलोमीटर तक साइकिल चलाएंगे कैसे? खैर ये भी छोड़ो। अब बात करे कि आखिर साइकिल चलाकर वो कितना पेट्रोल-डीजल बचा लेंगे। मैं यह सोच ही रहा था तभी मेरे दिमाग में ये ख्याल आया कि जितने लोग भी इस काम में हिस्सा ले रहे हैं उनमें से सभी दल-बल के साथ चलते हैं। दल-बल मतलब एक के पीछे एक ना जाने तीन,चार,पांच कितने वाहन चलते हैं। जाहिर है वाहन चलते हैं तो इंधन भी खर्च होता होगा। अब साइकिल चलाने वाले मंत्रियों को इतनी ही चिंता महंगाई की है तो अपने ताम-झाम को कुछ कम करके एकात वाहन अपने काफिले से यदि कम कर दें तो लाखों लीटर ईंधन की बचत कर सकते हैं। लेकिन वो ऐसा करेंगे नहीं क्योकि यदि वो ऐसा करेंगे तो पावरफुल मंत्री कैसे कहलाएंगे। क्योंकि पावरफुल दिखना है तो ताम-झाम तो दिखाना ही होगा। अब ऐसे दिखावा करके खबरों में आने के लिए इस तरह की हरकत करने वाले नेताओं को कौन समझाए कि जनता इतनी बेवकूफ नहीं है भैय्या बस उसकी कमजोरी सिर्फ इतनी है कि वो अपना गुस्सा सड़क प्रदर्शित नहीं कर सकती?
Saturday, February 13, 2010
ऐश्वेर्या को बुखार. पहले पन्ने पर खबर

कितनी संवेदनशील है मीडिया
बॉलीवुड अभिनेत्री ऐश्वेर्या को बुखार हो गया. बुखार न हुआ कोई पहाड़ टूट पड़ा हो. एक बड़े समाचार पत्र ने इस खबर को पहले पन्ने पर फोटो के साथ छापा. खबर पढने के बाद मुझे लगा कि एक गरीब असहाय जो लाइलाज बीमारी से तड़पता रहता है उसकी पीड़ा उसके सामने से गुजरने वाले मीडिया कर्मियों को नहीं दिखती पता नहीं क्यों आज हर वर्ग इतना मतलबी हो गया है. खबर भी आजकल औकात देखकर बनाई जाती है.बड़े आदमी को छीक आ जाये तो खबर बन जाती है.और गरीब बेमौत मर जाए उसे अखबार जगह तक नहीं मिल पाती.यदि कभी कभार जगह मिल भी जाती है तो ऐसी जगह होती है जिन पन्नो को पाठक पढता ही नहीं है.हमारे प्रदेश में कई स्थानों पर लोगों को खाना (२ रूपए किलो चावल ) तक नहीं मिल रहा है लेकिन शिकायत के बाद भी खबर लग जाए तो बहुत बड़ी बात है.कहने का मतलब यह है कि जिस उद्देश्य के लिये मीडिया का जन्म हुआ है अगर उसमे उन्ही चीजों को स्थान नहीं मिलेगा तो ऐसी मीडिया का क्या मतलब?
Friday, February 12, 2010
बदल गयी है प्यार की परिभाषा
बदल गयी है प्यार की परिभाषा
खबर है कि वैलंटाइंस डे पर कंडोम
और वायग्रा की बिक्री बढ़ गयी.
वैलंटाइंस डे प्रपोज करने का सबसे अच्छा दिन है। कहते हैं ना प्यार का रास्ता पेट से होकर जाता है। डेली मेल में छपे सर्वे के मुताबिक, महिलाओं को अगर अच्छे से रेस्तरां के रूमानी माहौल में कुछ खिलाकर प्रपोज किया जाए तो उन्हें यह काफी अच्छा लगता है। लेकिन खबर पढ़कर तो ऐसा लगता है कि प्यार का रास्ता पेट ही नहीं पेट के ......? वैलंटाइंस डे के बारे में मैंने जब पहली बार सुना था तब ये जानता था कि इस दिन नए प्रेमी अपने प्रेम का इजहार करते है. ऐसे तो वैलंटाइंस डे प्यार के खूबसूरत एहसास को व्यक्त करने का अवसर होता है, मगर अनजाने में ही कुछ लोगों ने इसकी गलत परिभाषा भी गढ़ ली है। यही वजह है कि इस मौके पर वायग्रा जैसी दवाओं का मिस यूज बढ़ जाता है। हालत यह होती है कि, वैलंटाइंस डे के अंतिम चार दिनों में वायग्रा जैसी दवाओं की बिक्री में 40 पर्सेंट की बढ़ोतरी हो जाती है और 90 पर्सेंट खरीदार युवा होते हैं, जिन्हें इसकी कोई जरूरत ही नहीं होती। इसे प्यार कहें या फिर सेक्स या फिर प्यार के नाम पर धोखा. क्योंकि मै समझता हूँ कि प्यार और सेक्स में काफी अंतर होता है लेकिन आज-कल के युवाओं कि यह सोच हो गयी है कि जिससे हम प्यार करते है उससे सेक्स करना हमारा अधिकार है. इस सोच के लिए फिल्मे ज्यादा जिम्मेदार मानी जा सकती है. जानकारों की माने तो वैलंटाइंस डे संत वैलंटाइंस के नाम पर पड़ा है जो प्यार करने की सिख देते थे. पर युवाओं ने इसे सेक्स के दिन के लिए चुन लिया है. समाज में बढ़ रहे खुलेपन और टीवी चैनलों तथा फिल्मों को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है. वैलंटाइंस डे अपने चाहने वाले को प्रपोज करने, घूमने फिरने, खुशी मनाने के लिए बना है, लेकिन इस मौके पर कुछ लोग सुपर मैन बन जाना चाहते हैं।
खबर है कि वैलंटाइंस डे पर कंडोम
वैलंटाइंस डे प्रपोज करने का सबसे अच्छा दिन है। कहते हैं ना प्यार का रास्ता पेट से होकर जाता है। डेली मेल में छपे सर्वे के मुताबिक, महिलाओं को अगर अच्छे से रेस्तरां के रूमानी माहौल में कुछ खिलाकर प्रपोज किया जाए तो उन्हें यह काफी अच्छा लगता है। लेकिन खबर पढ़कर तो ऐसा लगता है कि प्यार का रास्ता पेट ही नहीं पेट के ......? वैलंटाइंस डे के बारे में मैंने जब पहली बार सुना था तब ये जानता था कि इस दिन नए प्रेमी अपने प्रेम का इजहार करते है. ऐसे तो वैलंटाइंस डे प्यार के खूबसूरत एहसास को व्यक्त करने का अवसर होता है, मगर अनजाने में ही कुछ लोगों ने इसकी गलत परिभाषा भी गढ़ ली है। यही वजह है कि इस मौके पर वायग्रा जैसी दवाओं का मिस यूज बढ़ जाता है। हालत यह होती है कि, वैलंटाइंस डे के अंतिम चार दिनों में वायग्रा जैसी दवाओं की बिक्री में 40 पर्सेंट की बढ़ोतरी हो जाती है और 90 पर्सेंट खरीदार युवा होते हैं, जिन्हें इसकी कोई जरूरत ही नहीं होती। इसे प्यार कहें या फिर सेक्स या फिर प्यार के नाम पर धोखा. क्योंकि मै समझता हूँ कि प्यार और सेक्स में काफी अंतर होता है लेकिन आज-कल के युवाओं कि यह सोच हो गयी है कि जिससे हम प्यार करते है उससे सेक्स करना हमारा अधिकार है. इस सोच के लिए फिल्मे ज्यादा जिम्मेदार मानी जा सकती है. जानकारों की माने तो वैलंटाइंस डे संत वैलंटाइंस के नाम पर पड़ा है जो प्यार करने की सिख देते थे. पर युवाओं ने इसे सेक्स के दिन के लिए चुन लिया है. समाज में बढ़ रहे खुलेपन और टीवी चैनलों तथा फिल्मों को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है. वैलंटाइंस डे अपने चाहने वाले को प्रपोज करने, घूमने फिरने, खुशी मनाने के लिए बना है, लेकिन इस मौके पर कुछ लोग सुपर मैन बन जाना चाहते हैं।
Tuesday, February 9, 2010
सिस्टम में सब चोर हैं
सिस्टम में सब चोर हैं
लोगों के जाए बिना ही कैसे खुल
जाते हैं खाते
छत्तीसगढ़ के कृषि सचिव ने राज्य के कई ऐसे गरीबों को लखपति बना दिया था जिनके पास दो वक्त की रोटी जुटाने का भी साधन नहीं है. ये काम भले का होता, यदि जिनके नाम खाता है उन्हें इस बात की जानकारी होती और वो इस खाते का खुद संचालन कर पाते. काले धन को सफ़ेद बनाने का ये खेल क्या सिर्फ कृषि सचिव के चाह लेने से संभव हो पाता.क्या बैंक के अफसर को इस बात के लिए जिम्मेदार नहीं माना जा सकता की जो व्यक्ति बैंक आया ही नहीं है उसके नाम का पास बुक, उसके नाम से चैक आखिर कैसे जारी हो गया. और उस खाते से लाखों रुपये का लेनदेन इन खातेदार की उपस्थिति के कैसे हो रहा था. जाहिर है सिस्टम में सब चोर हैं क्योंकि बिना बैंक अफसरों के सहयोग के इतना बड़ा खेल कर पाना संभव नहीं हैं. लोग बताते हैं की जिस बैंक के बारे में चर्चा छिड़ी है उसके बारे में ऐसी जानकारी है कि वहां सहर के कई और नामी लोगों की इसी तरह कई खाते चल रहे है. यदि उस बैंक के खतों की जाँच की जाए तो निश्चित ही कई बड़े लोगों के फर्जी खातों का पता चल सकता है. कलयुग में सच और सच के रास्ते पर चलने वाले लोगों को आसानी से सुख नसीब हो पाना संभव नहीं है.क्योंकि आज का पूरा सिस्टम ही बिकाऊ और भ्रष्ट है और चोरों के कारण चंडाल राज कर रहें हैं. अभी की घटना में इतना बवाल होने के बाद भी सरकार ने सिर्फ बयान ही जारी किया है कारवाई करने की हिम्मत हो ही नहीं रही है ऐसे में जांच में फंसे अफसर को भी हिम्मत आ गयी की पत्रकारों को बुलाकर बोल रहा है कि मै बेक़सूर हूँ. ये तो इस बात कि इन्तहां हो गयी कि पहले चोरी ऊपर से सीनाजोरी. इतनी मोटी तनखा होने,सरकार द्वारा तमाम सुख-सुविधा देने के बाद भी इस तरह लूट खसोट मचा रखें है तो फिर आम जनता का भला हो पायेगा ये सोचना भी मुश्किल है. नेता हो या मंत्री हर कोई अपनी जिंदगी भर की कमाई एक साथ कमा लेना चाह रहा है. इस पर रोक लगाने के लिए हर पांच साल में सभी अफसरों के खाते और उनकी संपत्ति की जांच करना अनिवार्य कर देना चाहिए ताकि काली कमाई पर कुछ हद तक रोक लग सके.
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