
Friday, December 10, 2010
Tuesday, December 7, 2010
2 जी स्पेक्ट्रम. भ्रष्टाचार की हद पार हो गयी
देश के सबसे बड़े घोटाले ने भ्रष्टाचार की हद पार कर दी है. इस महा घोटाले ने तो कामनवेल्थ में हुए घोटाले को इतना बौना साबित कर दिया कि कई लोगों के सर चकरा गए. देश में हुए 2जी स्पेक्ट्रम के सस्ते आबंटन से देश को 1.76 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। यह अलॉटमेंट तत्कालीन टेलिकॉम मिनिस्टर ए. राजा के कार्यकाल में हुआ। विपक्ष के लगातार दबाव के बाद ए.राजा ने टेलिकॉम मिनिस्टर के पद से इस्तीफा दे दिया.इसमें आपरेटरों को लाइसेंस देने का प्रावधान किया गया। सरकार को अच्छा पैसा मिला। 2007 में सरकार ने 2जी स्पेक्ट्रम नीलाम करने का फैसला किया। इस नीलामी में सरकार को कुल नौ हजार करोड़ रुपए मिले जबकि सीएजी के अनुमान के अनुसार उसे एक लाख पचासी हजार करोड़ रुपए से अधिक की कमाई होनी चाहिए थी। राजा पर आरोप है कि उन्होंने नीलामी की शर्तो में मनचाहे बदलाव किए। प्रधानमंत्री, कानून मंत्री और वित्त मंत्री की सलाह को अनदेखा किया। उन्होंने ऐसी कंपनियों को कौड़ियों के भाव स्पेक्ट्रम दिया जिनके पास न तो इस क्षेत्र में काम का कोई अनुभव था और न ही जरूरी पूंजी। उन्होंने चंद कंपनियों को फायदा पहंचाने के लिए बनाई और बदली सरकारी नीतियां। लेकिन गठबंधन की राजनीति की दुहाई देते हुए प्रधानमंत्री राजा के खिलाफ विपक्ष, अदालत और सीएजी के आरोप, शिकायतें, टिप्पणियों और रिपोर्टो के बावजूद पूरे तीन साल तक चुप्पी साधे रहे।
क्या है 2 जी?
- सेकंड जनरेशन सेलुलर टेलीकॉम नेटवर्क को 1991 में पहली बार फिनलैंड में लांच किया गया था। यह मोबाइल फोन के पहले से मौजूद नेटवर्क से ज्यादा असरदार तकनीक है। इसमें एसएमएस डाटा सर्विस शुरू की गई।
- राजा ने 2 जी स्पेक्ट्रम के लाइसेंस आवंटन में भारतीय दूरसंचार नियमन प्राधिकरण ट्राई के नियमों की धज्जियां उड़ाईं।
क्या थे नियम
- लाइसेंस की संख्या की बंदिश नहीं
- इकरारनामे में कोई बदलाव नहीं
- प्रक्रिया के समापन तक विलयन और अधिग्रहण नहीं हो सकता
- बाजार भाव से प्रवेश शुल्क
राजा के कानून
- 575 आवेदनों में से 122 को लाइसेंस
- स्वॉन और यूनिटेक के अधिग्रहण को मंजूरी
- इकरारनामे को बदला गया
- 2001 की दरों पर
क्या तरीके अपनाए
- बिल्डर और ऐसी कंपनियों ने लाइसेंस के लिए आवेदन लगाए, जिनका टेलीकॉम क्षेत्र में काम करने का कोई अनुभव नहीं था। रियल स्टेट क्षेत्र की कंपनियों को टेलीकाम लाइसेंस दिया।
- बाहरी निवेशकों को बाहर रखने के लिए अंतिम तिथि को मनमाने ढंग से पहले तय कर दिया गया।
- पहले आओ, पहले पाओ का नियम बना दिया, 575 में से 122 को लाइसेंस दे दिए।
- घोषणा की कि ट्राई की सिफारिशों पर अमल हो रहा है, लेकिन पांच में से चार सिफारिशें बदल दी गईं।
- केबिनेट, टेलीकॉम कमिश्नर और ईजीओएम को दरकिनार किया।
सीएजी रिपोर्ट में
- नुकसान का आंकड़ा 1,76,379 करोड़ रुपए
- लाइसेंस प्रक्रिया में प्रधानमंत्री के दिशा-निर्देशों की अनदेखी
- नीलामी से जुड़ी वित्त मंत्री की जरूरी सिफारिशों को सुना नहीं
- 2 जी स्पेक्ट्रम के आवंटन में टेलीकॉम सचिव के नोट को अनदेखा किया।
- ट्राई के उस पत्र को देखा तक नहीं, जिसमें उसकी सिफारिशों की उपेक्षा नहीं करने को कहा गया।
सात साल पुराने रेट पर स्पेक्ट्रम की बंदरबांट
राजा ने नौ टेलीकॉम कंपनियों को 122 सर्किल में सेवाएं शुरू करने का लाइसेंस दिया। लेकिन प्रक्रिया पर तभी सवाल उठे। आवेदन की अंतिम तारीख एक अक्टूबर घोषित की। बाद में कहा कि स्पेक्ट्रम सीमित होने के कारण 25 सितंबर के बाद मिले आवेदनों पर विचार नहीं होगा। हर कंपनी से 1658 करोड़ रुपए लेकर देश भर में सेवाएं शुरू करने की अनुमति दे दी गई। यह मूल्य सरकार द्वारा 2001 में तय रेट पर लिया गया जबकि 2007 तक टेलीकॉम क्षेत्र कई सौ गुना बढ़ चुका था।
1658 से 10,000 करोड़ बनाए चंद दिनों में
स्वॉन टेलीकॉम को लाइसेंस 1600 करोड़ रुपए में मिला। कुछ दिनों बाद उसने 45 प्रतिशत शेयर सऊदी अरब की इटिसलाट को 4500 करोड़ में बेच दिए। यानी लाइसेंस मिलने के बाद कंपनी का मूल्यांकन 10,000 करोड़ रुपए हो गया। इसी तरह यूनिटेक ने 60 प्रतिशत हिस्सेदारी नार्वे की टेलीनॉर को 6000 करोड़ में बेच दी। तब तक इन दोनों के पास एक भी उपभोक्ता नहीं था। न ही सेवाएं शुरू हुई थीं।
Tuesday, November 30, 2010
घटता मानवीय मूल्य
घटता मानवीय मूल्य
मनुष्य ने विकास के रास्ते पर जितनी तेजी से कदम बढाया उतनी ही तेजी से एक चीज ने अपना मोल खोया है वह है मानवीय मूल्य. आज सिर्फ आदमी के जेब और कुर्सी की क़द्र ही होती है. इनके आगे सब बेकार. समय बदलने के साथ-साथ लोगो की सोच काफी तेजी से बदली है.आज आदमी के पास सब कुछ है लेकिन वह अपनी कीमत खोता जा रहा है.आज किसी भी इंसान की क़द्र करने के पहले उसके कद को देखा जाता है. भले वह व्यक्ति कितना भी गुणवान क्यों न हो यदि उसकी पहुच और पहचान ऊँची नहीं है तो कई लोग चाहकर भी उसकी क़द्र नहीं करते. समाज में तेजी से आ रहे इस बदलाव के कारण संस्कृति पर चोट पहुच रही है. व्यसायिकता और पैसों की अंधी दौड़ में लोग अपनी मर्यादा को भूलते जा रहे है. आज समाज में फ़ैल रहे इस महामारी को रोकने की जरुरत है.लेकिन इसकी सुरुआत करेगा कौन.सब चाहते है कि पडोसी के घर में पहले बगावत हो. अपना घर सुरक्षित हो.आज पुरे देश में हर कोई प्रगति कर रहा है लेकिन आर्थिक प्रगति ने आज जितनी उचाई पर जा पहुची है मानवीय मूल्य उतनी ही तेजी से नीचे गयी है. आगे न जाने क्या होगा?
मनुष्य ने विकास के रास्ते पर जितनी तेजी से कदम बढाया उतनी ही तेजी से एक चीज ने अपना मोल खोया है वह है मानवीय मूल्य. आज सिर्फ आदमी के जेब और कुर्सी की क़द्र ही होती है. इनके आगे सब बेकार. समय बदलने के साथ-साथ लोगो की सोच काफी तेजी से बदली है.आज आदमी के पास सब कुछ है लेकिन वह अपनी कीमत खोता जा रहा है.आज किसी भी इंसान की क़द्र करने के पहले उसके कद को देखा जाता है. भले वह व्यक्ति कितना भी गुणवान क्यों न हो यदि उसकी पहुच और पहचान ऊँची नहीं है तो कई लोग चाहकर भी उसकी क़द्र नहीं करते. समाज में तेजी से आ रहे इस बदलाव के कारण संस्कृति पर चोट पहुच रही है. व्यसायिकता और पैसों की अंधी दौड़ में लोग अपनी मर्यादा को भूलते जा रहे है. आज समाज में फ़ैल रहे इस महामारी को रोकने की जरुरत है.लेकिन इसकी सुरुआत करेगा कौन.सब चाहते है कि पडोसी के घर में पहले बगावत हो. अपना घर सुरक्षित हो.आज पुरे देश में हर कोई प्रगति कर रहा है लेकिन आर्थिक प्रगति ने आज जितनी उचाई पर जा पहुची है मानवीय मूल्य उतनी ही तेजी से नीचे गयी है. आगे न जाने क्या होगा?
Monday, November 22, 2010
Sunday, November 21, 2010
Friday, October 29, 2010
Sunday, October 17, 2010
कहाँ जा रही है संस्कृति,
दुर्गा विसर्जन में बज रहा मीना आ गया तेरा दीवाना...
लोग कई सालों से कहते आ रहे हैं कि संस्कृति खत्म हो रही है. लेकिन मुझे ज्यादा बड़ा कारण नजर नहीं आता था. पर नवरात्रि के अंतिम दिन दुर्गा विसर्जन करने जा रही एक टोली में बजते गानों ने मुझे भी यह सोच्जने पर मजबूर कर दिया कि वाकई संस्कृति खत्म हो रही है. मैंने कई सालों से दुर्गा विसर्जन करने वालों की टोली देखी,पर कभी विसर्जन करने वालों को फूहड़ गाने बजाते नहीं देखा था.लेकिन १७ अक्टूबर को विसर्जन में जा रहे लोग जमकर फ़िल्मी गाँनो का मजा ले रहे थे.माता की विदाई में लोग मीना कहाँ है तेरा दीवाना, तेरे मस्त-मस्त दो नैन, नायक नहीं खलनायक हूँ मै, जैसे न जाने कैसे-कैसे गाने बज रहे थे ? मुझे बड़ी तकलीफ हो रही थी सुनकर पर मै कुछ नहीं कर पाया. क्योंकि उस भीड़ में सिर्फ युवा ही नहीं, बल्कि अधेढ़ और बुजुर्ग और महिलाये भी शामिल थे. गणपति विसर्जन की तरह अब कुछ लोग माता की भक्ति को भी मनोरंजन बना रहे है. देखा जाए तो अब लोगों में
दुर्गा और गणेश बैठने की होड़ सी लग गयी है, आज अधिकांश लोग सिर्फ चंदा-चकारी कर उत्सवों को कैश करने में लगे हैं. थोड़ी देर के मनोरंजन के लिए लोगों ने श्रद्दा- भक्ति को मजाक बना लिया है. देवी-देवताओं के देश में भक्ति के नाम पर इस तरह की करतूत निहायत ही शर्मनाक और निंदनीय है. हे भगवान लोगों को सद्बुद्धि देना.
जय माता दी .
लोग कई सालों से कहते आ रहे हैं कि संस्कृति खत्म हो रही है. लेकिन मुझे ज्यादा बड़ा कारण नजर नहीं आता था. पर नवरात्रि के अंतिम दिन दुर्गा विसर्जन करने जा रही एक टोली में बजते गानों ने मुझे भी यह सोच्जने पर मजबूर कर दिया कि वाकई संस्कृति खत्म हो रही है. मैंने कई सालों से दुर्गा विसर्जन करने वालों की टोली देखी,पर कभी विसर्जन करने वालों को फूहड़ गाने बजाते नहीं देखा था.लेकिन १७ अक्टूबर को विसर्जन में जा रहे लोग जमकर फ़िल्मी गाँनो का मजा ले रहे थे.माता की विदाई में लोग मीना कहाँ है तेरा दीवाना, तेरे मस्त-मस्त दो नैन, नायक नहीं खलनायक हूँ मै, जैसे न जाने कैसे-कैसे गाने बज रहे थे ? मुझे बड़ी तकलीफ हो रही थी सुनकर पर मै कुछ नहीं कर पाया. क्योंकि उस भीड़ में सिर्फ युवा ही नहीं, बल्कि अधेढ़ और बुजुर्ग और महिलाये भी शामिल थे. गणपति विसर्जन की तरह अब कुछ लोग माता की भक्ति को भी मनोरंजन बना रहे है. देखा जाए तो अब लोगों में
दुर्गा और गणेश बैठने की होड़ सी लग गयी है, आज अधिकांश लोग सिर्फ चंदा-चकारी कर उत्सवों को कैश करने में लगे हैं. थोड़ी देर के मनोरंजन के लिए लोगों ने श्रद्दा- भक्ति को मजाक बना लिया है. देवी-देवताओं के देश में भक्ति के नाम पर इस तरह की करतूत निहायत ही शर्मनाक और निंदनीय है. हे भगवान लोगों को सद्बुद्धि देना.
जय माता दी .
Friday, October 15, 2010
कामनवेल्थ गेम्स
कामनवेल्थ गेम्स
1 ऑस्ट्रेलिया 74 55 48 177
2 भारत 38 27 36 101
3 इंग्लैंड 37 59 46 142
4 कनाडा 26 17 32 75
5 द.अफ्रीका 12 11 10 33
6 केन्या 12 11 9 32
7 मलेशिया 12 10 13 35
8 सिंगापुर 11 11 9 31
9 नाईजीरिया 11 10 14 35
10 स्कॉटलैंड 9 10 7 26
11 न्यूजीलैंड 6 22 8 36
12 साइप्रस 4 3 5 12
13 नार्दन 3 3 4 10
14 समोआ 3 0 1 4
15 वेल्स 2 7 10 19
16 जमैका 2 4 1 7
17 पाकिस्तान 2 1 2 5
18 यूगांडा 2 0 0 2
19 बहामास 1 1 3 5
20 श्रीलंका 1 1 1 3
21 नारू 1 1 0 2
22 बोत्सवाना 1 0 3 4
23 सेंट-विंसेट 1 0 0 1
24 कैमेन 1 0 0 1
25 त्रिनिदाद 0 4 2 6
26 कैमरून 0 2 4 6
27 घाना 0 1 3 4
28 नामीबिया 0 1 2 3
29 पापुआन्यूगिनी 0 1 0 1
30 टोंगा 0 0 2 2
31 इस्लआफमैन 0 0 2 2
32 सेंट 0 0 1 1
33 बांग्लादेश 0 0 1 1
कामनवेल्थ गेम्स
नत्था आज भी
नत्था आज भी गरीब है
नत्था को नाम तो बहुत मिल गया लेकिन उतना दाम नहीं मिला जितना उसे मिलना चाहिए? छत्तीसगढ़ का नाम देश ही नहीं पूरी दुनिया में फ़ैलाने वाले इस छोटे कद के बड़े कलाकार को सरकार ने भी सम्मान के नाम पर सिर्फ दिया तो एक लाख. महंगाई के इस दौर में एक लाख में क्या होता है. अपना पूरा जीवन कला के लिए समर्पित करने वाले नत्था उर्फ़ ओंकरदास मानिकपुरी के पास रहने के लिए घर तक नहीं है. वह अपनी फिल्म पिपली लाइव के कारण भले ही आस्कर के सपने देख रहा हो पर अपने जीजा के घर में दिन गुजर रहा है. सफलता के बाद उसे जो कुछ थोड़े पैसे मिले उसे वह सहेज कर रख रहा है ताकि उसका उपयोग मुंबई में स्ट्रगल के लिए कर सके ! नत्था की कहानी आज भी फ़िल्मी नहीं रियल है.पिपली लाइव रिलीज़ होने के बाद लोगों ने उसे हाथो-हाथ लिया. उसका सम्मान करने समाज से लेकर तमाम प्रकार के लोगों ने अपना नाम नत्था के नाम के साथ कैश करा लिया लेकिन नत्था के पास आज भी कैश नहीं है. गरीबी में जीने वाला नत्था अभी भी गरीबी की मार झेल रहा है. आमिर से मिलकर वो जरुर कला में आमिर हो गया पर उसके पास अमीरी नहीं आई.कई कलाकार सालों बिताने के बाद एक छोटे अदद रोल के लिए तरस जाते है. लेकिन नत्था किस्मत का धनी होकर भी धन से धनी नहीं हो पाया. नत्था की फिल्म तो सफल हो गयी लेकिन वह तभी सफल होगा जब वह धनी होगा. क्योंकि आज कीमत कला की कम कीमती कलाकार की ज्यादा होती है !
नत्था को नाम तो बहुत मिल गया लेकिन उतना दाम नहीं मिला जितना उसे मिलना चाहिए? छत्तीसगढ़ का नाम देश ही नहीं पूरी दुनिया में फ़ैलाने वाले इस छोटे कद के बड़े कलाकार को सरकार ने भी सम्मान के नाम पर सिर्फ दिया तो एक लाख. महंगाई के इस दौर में एक लाख में क्या होता है. अपना पूरा जीवन कला के लिए समर्पित करने वाले नत्था उर्फ़ ओंकरदास मानिकपुरी के पास रहने के लिए घर तक नहीं है. वह अपनी फिल्म पिपली लाइव के कारण भले ही आस्कर के सपने देख रहा हो पर अपने जीजा के घर में दिन गुजर रहा है. सफलता के बाद उसे जो कुछ थोड़े पैसे मिले उसे वह सहेज कर रख रहा है ताकि उसका उपयोग मुंबई में स्ट्रगल के लिए कर सके ! नत्था की कहानी आज भी फ़िल्मी नहीं रियल है.पिपली लाइव रिलीज़ होने के बाद लोगों ने उसे हाथो-हाथ लिया. उसका सम्मान करने समाज से लेकर तमाम प्रकार के लोगों ने अपना नाम नत्था के नाम के साथ कैश करा लिया लेकिन नत्था के पास आज भी कैश नहीं है. गरीबी में जीने वाला नत्था अभी भी गरीबी की मार झेल रहा है. आमिर से मिलकर वो जरुर कला में आमिर हो गया पर उसके पास अमीरी नहीं आई.कई कलाकार सालों बिताने के बाद एक छोटे अदद रोल के लिए तरस जाते है. लेकिन नत्था किस्मत का धनी होकर भी धन से धनी नहीं हो पाया. नत्था की फिल्म तो सफल हो गयी लेकिन वह तभी सफल होगा जब वह धनी होगा. क्योंकि आज कीमत कला की कम कीमती कलाकार की ज्यादा होती है !
नत्था आज भी गरीब है
नत्था आज भी
गरीब है
नत्था को नाम तो बहुत मिल गया लेकिन उतना दाम नहीं मिला जितना उसे मिलना चाहिए? छत्तीसगढ़ का नाम देश ही नहीं पूरी दुनिया में फ़ैलाने वाले इस छोटे कद के बड़े कलाकार को सरकार ने भी सम्मान के नाम पर सिर्फ दिया तो एक लाख. महंगाई के इस दौर में एक लाख में क्या होता है. अपना पूरा जीवन कला के लिए समर्पित करने वाले नत्था उर्फ़ ओंकरदास मानिकपुरी के पास रहने के लिए घर तक नहीं है. वह अपनी फिल्म पिपली लाइव के कारण भले ही आस्कर के सपने देख रहा हो पर अपने जीजा के घर में दिन गुजर रहा है. सफलता के बाद उसे जो कुछ थोड़े पैसे मिले उसे वह सहेज कर रख रहा है ताकि उसका उपयोग मुंबई में स्ट्रगल के लिए कर सके ! नत्था की कहानी आज भी फ़िल्मी नहीं रियल है.पिपली लाइव रिलीज़ होने के बाद लोगों ने उसे हाथो-हाथ लिया. उसका सम्मान करने समाज से लेकर तमाम प्रकार के लोगों ने अपना नाम नत्था के नाम के साथ कैश करा लिया लेकिन नत्था के पास आज भी कैश नहीं है. गरीबी में जीने वाला नत्था अभी भी गरीबी की मार झेल रहा है. आमिर से मिलकर वो जरुर कला में आमिर हो गया पर उसके पास अमीरी नहीं आई.कई कलाकार सालों बिताने के बाद एक छोटे अदद रोल के लिए तरस जाते है. लेकिन नत्था किस्मत का धनी होकर भी धन से धनी नहीं हो पाया. नत्था की फिल्म तो सफल हो गयी लेकिन वह तभी सफल होगा जब वह धनी होगा. क्योंकि आज कीमत कला की कम कीमती कलाकार की ज्यादा होती है !
गरीब है
नत्था को नाम तो बहुत मिल गया लेकिन उतना दाम नहीं मिला जितना उसे मिलना चाहिए? छत्तीसगढ़ का नाम देश ही नहीं पूरी दुनिया में फ़ैलाने वाले इस छोटे कद के बड़े कलाकार को सरकार ने भी सम्मान के नाम पर सिर्फ दिया तो एक लाख. महंगाई के इस दौर में एक लाख में क्या होता है. अपना पूरा जीवन कला के लिए समर्पित करने वाले नत्था उर्फ़ ओंकरदास मानिकपुरी के पास रहने के लिए घर तक नहीं है. वह अपनी फिल्म पिपली लाइव के कारण भले ही आस्कर के सपने देख रहा हो पर अपने जीजा के घर में दिन गुजर रहा है. सफलता के बाद उसे जो कुछ थोड़े पैसे मिले उसे वह सहेज कर रख रहा है ताकि उसका उपयोग मुंबई में स्ट्रगल के लिए कर सके ! नत्था की कहानी आज भी फ़िल्मी नहीं रियल है.पिपली लाइव रिलीज़ होने के बाद लोगों ने उसे हाथो-हाथ लिया. उसका सम्मान करने समाज से लेकर तमाम प्रकार के लोगों ने अपना नाम नत्था के नाम के साथ कैश करा लिया लेकिन नत्था के पास आज भी कैश नहीं है. गरीबी में जीने वाला नत्था अभी भी गरीबी की मार झेल रहा है. आमिर से मिलकर वो जरुर कला में आमिर हो गया पर उसके पास अमीरी नहीं आई.कई कलाकार सालों बिताने के बाद एक छोटे अदद रोल के लिए तरस जाते है. लेकिन नत्था किस्मत का धनी होकर भी धन से धनी नहीं हो पाया. नत्था की फिल्म तो सफल हो गयी लेकिन वह तभी सफल होगा जब वह धनी होगा. क्योंकि आज कीमत कला की कम कीमती कलाकार की ज्यादा होती है !
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