नत्था तो नहीं मरा पर ...
किसानो की पीड़ा पर आधारित फिल्म पिपली लाइव में नत्था भले ही न मरे पर आज देश में ऐसे सैकड़ो किसान है जो अपनी व्यथा और सरकारी अनदेखी के कारण मर रहे है. किसानो की हित की बात करने वाली सरकार में आज किसान ही सबसे ज्यादा प्रतार्डित है. कभी अकाल तो कभी भारी बारिश हर हाल में किसान भुगतना किसान को ही पड़ता है. हर साल किसान मौसम की मार झेलता ही है. इतनी विषम परिस्थितियों में भी किसम अपना हौसला नहीं खोता लेकिन जब सरकारी सहायता उन्हें नहीं मिलती तब वो जरुर विचलित हो जाता है. ऐसी बात नहीं है कि सरकार के पास किसानो के लिए योजना नहीं है या फिर सरकार के पास पैसा नहीं है. सरकार के पास सब कुछ है लेकिन सरकारी तंत्र में कुछ ऐसे दलाल और कामचोर व् बेईमान लोग आ गए है जिसके कारण किसानो को मिलने वाला हक़ उन्हें नहीं मिल पाता. जबकि उनके हित का पैसा वो बड़ी चतुराई से डकार जाता है. छत्तीसगढ़ के सन्दर्भ में देखे तो यहाँ किसान दुसरे कारणों से परेशान है. यहाँ उनके पास जमीन हैं, हल है, बैल है, लेकिन उनके पास कम करने वाले मजदूर नहीं है. जिसके कारण किसानी काम प्रभावित हो रहा है. मजदूर मिल भी रहे है तो उनके भाव इतने बड़े है कि उनका कोई इलाज नहीं है. मजदूर आज इतना भाव ताव इसलिए दिखा रहा है क्योंकि सरकार द्वारा उनको १-२-३ रूपए किलो में चावल दे रहा है. इसलिए अब वो काम नहीं करना चाहते. जब ये योजना चालू हुई है तब से किसानो कि कमर ही टूट गयी है. राज्य सरकार भले ही चावल योजना का पुरे देश में गुणगान करे लेकिन इससे राज्य का भला होने कि बजाय किसानो का बुरा जरुर हो रहा है. हम इसके विरोधी नहीं है कि सरकार गरीबों को चावल न दे जरुर दे लेकिन उन्हें काम के बदले अनाज योजना के रूप में दे ताकि वे मजदूर मेहनत भी करे. इस योजना से मजदूर अब आलसी होते जा रहे है. यही कारण है कि छत्तीसगढ़ के किसान पिछले कुछ सालों से लगातार परेशान हो रहे है और खेती-बाढ़ी के काम में ज्यादा रूचि नहीं ले रहे है. यही कारण है यहाँ तो हर नत्था परेशान है.
Thursday, August 19, 2010
Saturday, August 7, 2010
कामन वेल्थ गेम्स
वेल्थ कमाओ हेल्थ बनाओ
कामन वेल्थ गेम्स की तैयारी में लगे नेता, पदाधिकारी और अधिकारी जिसने चाहा उसने गेम्स के नाम पर जितना अति कर सकते थे किया और कर रहे है. इसका खुलासा गेम्स की तारीख नजदीक आते ही होने लगा है. देश में भ्रस्ताचार ने किस कदर अपने नीव जमा ली है वह कामन वेल्थ गेम्स की तैयारी से सामने आने लगा है. जिस खेल में जरा सी लापरवाही होने से देश की छवी ख़राब हो सकती उसमे उससे जुड़े लोगों ने अपनी अवकात दिखा दी और सरकारी पैसों का जमकर दुरुपयोग हुआ. सबने अपनी-अपनी जेबे गर्म करना सबसे ज्यादा लाभदायक समझा. देश हित को दरकिनार करते हुए सबने जमकर लूटा. वर्तमान में चल रही कारगुजारियों को देखने से पता चलता है कि देश किस रस्ते पर जा रहा है. पैसा आज इज्जत और खुदा से बढकर हो गया है. इस तरह के काम करने वालों ने को यह जरा भी नहीं सोचा कि जब सच सामने आएगा तो देश कि इज्जत पर भी बात आएगी. क्योंकि इस आयोजन में कई देश के प्रतिभागी और दर्शक आने वाले है. उनके सामने देश कि छवी कैसी होगी इसकी इन भ्रस्ताचारियों को कोई मतलब नहीं है. इसके लिए नेताओं को ही जिम्मेदार माना जा सकता है. क्योंकि देश के सारे नियम कायदे इनके ही द्वारा बनाये जाते है जो इतने शिथिल होते है कि वे इसका मनमानी तरीके से इस्तेमाल कर अपना उल्लू सीधा कर लेते है. देश में इस तरह कि अनगिनत घटनाये लगातार होती रहेंगी जब तक कि इस पर रोक लगाने और पैसों का गबन करने वालों तथा भ्रस्ताचारियों को सबक सिखाने के लिए कोई कठोर कानून नहीं बनाया जायेगा? यदि यही हाल रहा तो वह दिन दूर नहीं होगा जब हमारा देश भ्रस्ताचारियों का नंबर वन देश बन जायेगा ?
कामन वेल्थ गेम्स की तैयारी में लगे नेता, पदाधिकारी और अधिकारी जिसने चाहा उसने गेम्स के नाम पर जितना अति कर सकते थे किया और कर रहे है. इसका खुलासा गेम्स की तारीख नजदीक आते ही होने लगा है. देश में भ्रस्ताचार ने किस कदर अपने नीव जमा ली है वह कामन वेल्थ गेम्स की तैयारी से सामने आने लगा है. जिस खेल में जरा सी लापरवाही होने से देश की छवी ख़राब हो सकती उसमे उससे जुड़े लोगों ने अपनी अवकात दिखा दी और सरकारी पैसों का जमकर दुरुपयोग हुआ. सबने अपनी-अपनी जेबे गर्म करना सबसे ज्यादा लाभदायक समझा. देश हित को दरकिनार करते हुए सबने जमकर लूटा. वर्तमान में चल रही कारगुजारियों को देखने से पता चलता है कि देश किस रस्ते पर जा रहा है. पैसा आज इज्जत और खुदा से बढकर हो गया है. इस तरह के काम करने वालों ने को यह जरा भी नहीं सोचा कि जब सच सामने आएगा तो देश कि इज्जत पर भी बात आएगी. क्योंकि इस आयोजन में कई देश के प्रतिभागी और दर्शक आने वाले है. उनके सामने देश कि छवी कैसी होगी इसकी इन भ्रस्ताचारियों को कोई मतलब नहीं है. इसके लिए नेताओं को ही जिम्मेदार माना जा सकता है. क्योंकि देश के सारे नियम कायदे इनके ही द्वारा बनाये जाते है जो इतने शिथिल होते है कि वे इसका मनमानी तरीके से इस्तेमाल कर अपना उल्लू सीधा कर लेते है. देश में इस तरह कि अनगिनत घटनाये लगातार होती रहेंगी जब तक कि इस पर रोक लगाने और पैसों का गबन करने वालों तथा भ्रस्ताचारियों को सबक सिखाने के लिए कोई कठोर कानून नहीं बनाया जायेगा? यदि यही हाल रहा तो वह दिन दूर नहीं होगा जब हमारा देश भ्रस्ताचारियों का नंबर वन देश बन जायेगा ?
Monday, August 2, 2010
फ्रेंडशिप डे
ये कैसा विरोध?
संस्कृति के नाम पर राजधानी रायपुर में बजरंग दल और धर्म सेना के कार्यकर्ताओं ने फ्रेंडशिप डे पर जिस कदर दिन भर गुंडागर्दी उसकी हर तरफ निंदा हो रही है. एक सभ्य समाज में इस तरह कि करतूत को दंडनीय अपराध मन गया है.लेकिन खुलेआम मजा लेते इन युवकों पर पुलिस भी मेहरबान दिखी. इस तरह कि घटना हमारे समाज के लिए चिंतनीय है क्योंकि यह हमारे समाज की देन नहीं है. खुलेआम वे तथाकथित कार्यकर्ता जिस तरह युवतियों से अभद्र व्यहार कर रहे थे युवको को लात घूसों से पीट रहे थे इसका हक़ उन्हें किसने दिया? और तो और लाठी लेकर खड़ी पुलिस भी तमाशाई बनी रही. फ्रेंडशिप डे का इन्तेजार कर रहे संस्कृती के ये रक्षक सुबह से इस ताक में थे कि कब उन्हें कोई जोड़ा दिखे और वो इसका मजा लें. विरोध दर्ज करा रहे युवकों में ऐसे लोगों कि संख्या ज्यादा थी जो खुद छेड़खानी और नशाखोरी कि गिरफ्त में हैं. हुरदंग कर रहे ऐसे लोगों पुलिस ने सिर्फ खानापूर्ति के लिए गिरफ्तार कर लिया जबकि होना ये चाहिए था कि उन्हें गिरफ्तार कर उन्हें कठोर सजा देनी चाहिए थी. यदि इस तरह गुंडागर्दी करने वालों पर कड़ी नहीं की गई तो उनके हौसले लगातार बड़ते ही जायेंगे और शहर में भाई बहनों का भी एक साथ घूमना खतरनाक हो जायेगा. क्योंकि कौन किस परिस्थिति में कहाँ जा रहा है कहाँ बैठा है इससे उन तथाकथित लोगों को कुछ नहीं करना है.जो साल के केवल चंद दिन संस्कृति की रक्षा का दिखावा करते है. यदि इन तथाकथित कार्यकर्ताओं को संस्कृति का इतना ही ख्याल है तो नंगी फिल्मे क्यों बड़े चाव से देखते है? वो सड़कों पर राह चलती लड़कियों से छेड़खानी क्यों करते हैं? उन्हें इस तरह की हर गन्दी चीजों का विरोध पूरी मजबूती के साथ करना चाहिए. क्या इसके लिए उन्हें अलग से ट्रेनिंग देनी पड़ेगी? संस्कृति के नाम पर इस तरह की मनमानी करने वालो पर कड़ी करवाई करने की जरुरत है
संस्कृति के नाम पर राजधानी रायपुर में बजरंग दल और धर्म सेना के कार्यकर्ताओं ने फ्रेंडशिप डे पर जिस कदर दिन भर गुंडागर्दी उसकी हर तरफ निंदा हो रही है. एक सभ्य समाज में इस तरह कि करतूत को दंडनीय अपराध मन गया है.लेकिन खुलेआम मजा लेते इन युवकों पर पुलिस भी मेहरबान दिखी. इस तरह कि घटना हमारे समाज के लिए चिंतनीय है क्योंकि यह हमारे समाज की देन नहीं है. खुलेआम वे तथाकथित कार्यकर्ता जिस तरह युवतियों से अभद्र व्यहार कर रहे थे युवको को लात घूसों से पीट रहे थे इसका हक़ उन्हें किसने दिया? और तो और लाठी लेकर खड़ी पुलिस भी तमाशाई बनी रही. फ्रेंडशिप डे का इन्तेजार कर रहे संस्कृती के ये रक्षक सुबह से इस ताक में थे कि कब उन्हें कोई जोड़ा दिखे और वो इसका मजा लें. विरोध दर्ज करा रहे युवकों में ऐसे लोगों कि संख्या ज्यादा थी जो खुद छेड़खानी और नशाखोरी कि गिरफ्त में हैं. हुरदंग कर रहे ऐसे लोगों पुलिस ने सिर्फ खानापूर्ति के लिए गिरफ्तार कर लिया जबकि होना ये चाहिए था कि उन्हें गिरफ्तार कर उन्हें कठोर सजा देनी चाहिए थी. यदि इस तरह गुंडागर्दी करने वालों पर कड़ी नहीं की गई तो उनके हौसले लगातार बड़ते ही जायेंगे और शहर में भाई बहनों का भी एक साथ घूमना खतरनाक हो जायेगा. क्योंकि कौन किस परिस्थिति में कहाँ जा रहा है कहाँ बैठा है इससे उन तथाकथित लोगों को कुछ नहीं करना है.जो साल के केवल चंद दिन संस्कृति की रक्षा का दिखावा करते है. यदि इन तथाकथित कार्यकर्ताओं को संस्कृति का इतना ही ख्याल है तो नंगी फिल्मे क्यों बड़े चाव से देखते है? वो सड़कों पर राह चलती लड़कियों से छेड़खानी क्यों करते हैं? उन्हें इस तरह की हर गन्दी चीजों का विरोध पूरी मजबूती के साथ करना चाहिए. क्या इसके लिए उन्हें अलग से ट्रेनिंग देनी पड़ेगी? संस्कृति के नाम पर इस तरह की मनमानी करने वालो पर कड़ी करवाई करने की जरुरत है
Saturday, July 24, 2010
Sunday, May 30, 2010
Tuesday, May 25, 2010
Wednesday, May 19, 2010
नक्सली हैं या आतंकी?
नक्सली हैं या आतंकी?
40 साल, 20 राज्य और हजारों वारदात
एक नहीं, दो नहीं, तीन नहीं बल्कि पूरे चालीस साल हो चुकें हैं नक्सल समस्या को देश में पांव जमाए। इतने लंबे समय में नक्सलियों ने अपना नेटवर्क इतना मजबूत कर लिया है कि वो आज देश के 20 राज्यों में अपनी सामानान्तर सरकार चला रहे हैं। नक्सली कौन है? कहां से आते हैं? क्या खाते हैं? कहां रहते हैं? उन तक घातक हथियार और जरूरतों के सामान कैसे पहुंचते हैं, यह ना तो राज्य सरकार को पता है और ना ही केन्द्र सरकार को? कई बार मुठभेड़ हो जाने और लगातार सर्चिंग के बाद भी आज तक पुलिस इनकी पहचान तक नहीं कर पाई है।
जानकारों की माने तो छत्तीसगढ़ में नक्सलियों का कोई भी बड़ा नेता नहीं है। लेकिन छत्तीसगढ़ राज्य में ही नक्सली अपनी जड़े काफी मजबूत कर चुुके हैं। दूसरे राज्यों के नक्सली नेता छत्तीसगढ़ में आकर इतनी सफाई से कई बड़ी घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं। शांत, सुकुन व धान का कटोरा कहा जाने वाला राज्य छत्तीसगढ़ आज लाल आतंक से पस्त हो चुका है। खनिज संपदा से भरपूर व सीधा-साधा प्रदेश अब देश भर में सिर्फ नक्सली आतंक के लिए ही जाना जाताा है। कभी सिर्फ बस्तर के जंगलों और दंतेवाड़ा, बीजापुर तक सक्रिय रहने व छुट-पुट घटनाओं को अंजाम देने वाले नक्सली अब प्रदेश के लगभग सभी जंगली क्षेत्रों में पहुंच चुके हैं। चाहे वह महानदी का उद्गम स्थल सिहावा नगरी हो या चाहे हीरा उगलने वाला मैनपुर गरियाबंद हो, सभी स्थानों पर नक्सली अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुके हैं। इन स्थानों पर ना सिर्फ नक्सलियों की अवाजाही है बल्कि अब वहां पर वे अपना ठिकाना भी बना चुके हैं। मोटे तौर पर कहा जाए तो गलत नहीं होगा कि राज्य का पूरा जंगल नक्सलियों के कब्जे में है। जंगलों में अपनी हुकूमत स्थापित कर लेने के बाद नक्सली अब धीरे-धीरे शहरों में पांव जमा रहे हैं।
रायपुर, दुर्ग, भिलाई, नांदगांव, महासमुंद आदि शहरों में नक्सलियों के अरबन नेटवर्क का खुलासा शहरी पुलिस द्वारा कई बार किया जा चुका है लेकिन एक बार जो हाथ लग गया उसके बाद पुलिस ना तो फालोअप करती है ना ही उसे कुछ हासिल होता है। इतना नेटवर्क मिलने के बाद भी हमारी पुलिस द्वारा कोई बड़ी कामयाबी हासिल नहीं कर पाना सबसे बड़ा चिंता का विषय है।
कहा जाए तो असीमित संसाधन और तमाम प्रकार की सुविधाओं के बाद भी हम हर मामले में नक्सलियों से पीछे हैं। नक्सलियों से निपटने के लिए सिर्फ गोली-बंदूकें ही काफी नहीं हैं। इस बात के उल्लेख करने के कई कारण हैं जैसे नक्सलियों का खुफिया तंत्र हमारे जवानों के खुफिया तंत्र से अधिक मजबूत है। ऐसा नहीं है कि उनके पास हमारे जवानों से ज्यादा घातक हथियार हैं लेकिन जिस तरह की भौगौलिक परिस्थिति में रहकर नक्सलियों ने अपने आप को तैयार कर लिया है वह उनका सबसे बड़ा हथियार है।
जंगली क्षेत्र के जानकारों की माने तो नक्सलियों से निबटने के लिए जितनी भी कंपनियां, उन क्षेत्रों में भेजी जाती हैं उन्हें वहां का जरा भी ज्ञान नहीं रहता। अनजान जगहों पर खतरनाक नक्सलियों से लडऩा अंधे कुंए में जाने से कम नहीं है। यदि कंपनी या बटालियनों के जवान भौगौलिक परिस्थिति में ढल भी जाएं तो समस्या वहां आती है कि उनके दुश्मन की पहचान क्या है? क्योंकि आज तक नक्सलियों की कोई वास्तविक पहचान नही हैं ? कोई पहचान नहीं होने का फायदा ही ये अब तक उठाते आए हैं और कोई भी बड़ी वारदात आसानी से करके फरार हो जाते हंै। जानकारों के मुताबिक नक्सली,आदिवासी क्षेत्रों मेेंं सामान्य नागरिक की तरह ही रहते हैं और जब किसी घटना को अंजाम देना हो तभी ये वर्दी धारण कर जंगलों मेें सक्रिय हो जाते हैं।
बताते है कि रानी बोदली में हुए 55 जवानों की हत्या के बाद यह बात सामने आई थी कि नक्सली ग्रामीण के वेश में किसी विवाह समारोह में शामिल होने आए थे और वहां उन्होंने सीआरपीएफ के जवानों से दोस्ती बना ली थी। कुछ दिनों तक जवानों के साथ लगातार बैठकर शराब का सेवन करते रहे और जिस रात यह घटना हुई कैम्प के सारे जवान शराब के नशे में थे। इसी तरह की एक अन्य घटना में थानेदार हेमंत मंडावी सहित 12 जवान नक्सलियों का शिकार बने थे। धमतरी जिले के रिसगांव में भी सर्चिंग पर निकले 11 जवानों को नक्सलियों ने इसी तरह मारा था। ग्रामीणों के वेश में अपनी पहचान छुपाने में नक्सली बड़ी आसानी से कामयाब हो जाते हैं।
आंकड़ों के मुताबिक छत्तीसगढ़ का लगभग 40 हजार वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र नक्सलियों के कब्जे में है। इसमें से करीब 13 हजार वर्ग किमी क्षेत्र में नक्सलियों का भारी दबदबा है। जानकारी के मुताबिक दंतेवाड़ा के कोंटा ब्लाक के चिंतलनार, चिंतागुफा, जुगरगुंडा, कांकेरलंका, बीजापुर के उसुर तरैम, पुजारी कांकेर, तारलागुड़ा, नारायणपुर जिले के अबूझमाड व बस्तर के मरदायाले व मारडूम में आजादी के इतने सालों बाद भी प्रशासन नहीं बल्कि नक्सलियों की तूती बोलती है। जानकार बताते हैं कि इस क्षेत्र के 35 लाख की आबादी में लगभग 12 लाख लोगों पर नक्सलियों की हुकूमत चलती है। नक्सलियों के खिलाफ चल रहे अभियान के लिए बीएसएफ, आईटीबीपी, सीआरपीएफ, छत्तीसगढ़ सशस्त्र बल तथा जिला पुलिस के लगभग 24 हजार से भी अधिक जवान तैनात हैं। जबकि पुलिस सूत्रों के मुताबिक लगभग 40-50 हजार सशस्त्र नक्सली इस क्षेत्र में हैं जिनमें करीब 15 हजार महिला नक्सली हैं, इनमें से 10 हजार नक्सली सैन्य प्रशिक्षण प्राप्त हंै। इतनी बड़ी संख्या में जंगलों में मौजूद नक्सलियों ने कभी अपनी पहचान सार्वजनिक नहीं की है। यही वजह है कि वे लगातार पुलिस व प्रशासन पर हावी हो रहे हैं।
पहले 10, फिर 20, 30, 55, और अब 77। नक्सलियों द्वारा मारे जा रहे जवानों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। हाल ही में 6 अपै्रल को दंतेवाड़ा के ताड़मेटला में हुआ नक्सली हमला देश का अब तक का सबसे बड़ा नक्सली हमला है। इस हमले से देश के गृहमंत्री पी. चिंदबरम खुद इतने व्यथित हो गए कि उन्होंने अपना त्याग पत्र प्रधानमंत्री के पास भेज दिया। भले ही उनका त्याग पत्र मंजूर नहीं किया गया हो पर इससे एक बात तो साफ है कि नक्सल समस्या वर्तमान में देश में आतंकवाद से बड़ी समस्या बन गई है। यदि छत्तीसगढ़ में नक्सलियों का प्रभाव इसी तरह बढ़ता रहा तो आने वाले कुछ वर्षों में पूरे प्रदेश में कश्मीर जैसे हालात पैदा हो सकते हैं।
बताते हैं कि छत्तीसगढ़, आंध्रप्रदेश, बिहार, झारखंड, कर्नाटक, म.प्र., उ.प्र., उड़ीसा, उत्तरांचल व पश्चिम बंगाल में लाल आतंक का साया बहुत अधिक है। आंकड़ों की माने तो देश के 180 जिलों में नक्सलियों का जबरदस्त आतंक है इसके अलावा 40 जिले ऐसे है जहां पर ये किसी ना किसी रूप में सक्रिय हैं। जबकि छत्तीसगढ़ को ये अब अपना गढ़ बना चुके हैं। विभागीय जानकारी के मुताबिक देश के वन क्षेत्रफल का 1/5 वां हिस्सा नक्सलियों के कब्जे में है।
जहां गरीबी वहां नक्सली
नक्सलियों को अपनी जड़े मजबूत करने में बस्तर की भौगौलिक स्थिति ने जितना साथ दिया इससे कहीं ज्यादा उन्हे वहां की गरीब जनता का समर्थन है। बताते हैं कि नक्सलियों की प्रत्येक गांव के लोगों तक सीधी पहुंच है। वे लगभग प्रत्येक गांव में जाकर मीटिंग करते हैं,इस मीटिंग की खास बात यह होती है कि उसमें प्रत्येक घर से एक व्यक्ति को शामिल होना अनिवार्य है। यदि ऐसा नहीं हुआ तो वह परिवार नक्सलियों की क्रूरता का शिकार हो जाता है। बताते हैं कि उस मीटिंग में वो लोगों के साथ न्याय करने का ढकोसला भी करते हैं। और अपने आप को उन ग्रामीणों का सबसे बड़ा हितैषी भी बताते हैं। नक्सलियों ने ग्रामीणों के दिलो-दिमाग पर अपना वर्चस्व हासिल कर लिया है। ये काम नक्सलियों ने एक दिन में हासिल नहीं किया बल्कि धीरे-धीरे सरकार के प्रति गरीबों के मन में नफरत पैदा कर उन्हें यह समझाते गए कि सरकार तुम्हारे लिए कुछ नहीं करेगी। सरकार ने ना तो पहले तुम्हारी मदद की है ना ही अब मदद करेगी। यदि तुम अपना विकास चाहते हो तो हमारा साथ दो। उनकी भाषा और बोली में बात कर नक्सलियों ने ग्रामीणों के दिलों में अपनी जगह बना ली है। आदिवासी व गरीब क्षेत्र के लोग सरकारी मदद लेते जरूर हैं पर दिल से वे नक्सलियों से जुड़े रहते हैं। यही कारण है कि किसी भी कार्रवाई की पूर्व सूचना नक्सलियों तक पहुंच जाती है।
सरकार से सीधी लड़ाई
विशेषज्ञों की माने तो माओवादी राज्य व केन्द्र सरकार के खिलाफ सीधी लड़ाई लड़ रहे हैं। हाल में हुए नक्सली हमने ने केन्द्र सरकार के समक्ष आंतरिक सुरक्षा और नक्सलवाद ग्रस्त इलाकों के विकास की बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। सरकार को देश की आंतरिक सुरक्षा के खिलाफ नासूर बन चुके नक्सलवाद से निपटने के लिए बेहतर रणनीति तैयार करने की जरूरत है। राजनेताओं को आपसी कलह और मतभेद भुलाकर इस मसले पर एकजुट होकर प्लांिनंग करनी चाहिए जिससे मजबूती के साथ इस समस्या से निपटने का जोश पैदा हो।
पशुपति से तिरूपति तक रेड कारिडोर बनाने के मंसूबे लेकर उतरे नक्सलियों का नरसंहार ऐसा ही चलता रहा तो बहुत जल्द वो इसमें कामयाब हो सकते हैं।
विकास विरोधी और आतंकी
माओवादी वर्तमान में विकास के सबसे बड़े विरोधी हैं। वे आदिवासी क्षेत्रों में गांवों तक ना तो सड़क बनने दे रहे हैं और ना ही वहां बने सरकारी स्कूल भवनों व अस्पतालों को सुरक्षित रहने दें रहे हैं। ऐसी कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं जिससे नक्सलियों ने सड़क निर्माण में लगे वाहनों को आग के हवाले कर दिया तो कहीं स्कूल व अस्पताल भवनों को बारूद से उड़ा दिया। नक्सली आतंक का पर्याय बन चुके हैं। उनका काम अब सिर्फ दहशत फैलाना और हत्या करना ही रह गया है। आंकड़े बताते है कि नक्सलियों ने पिछले पांच सालों में 248 शासकीय भवनों को विस्फोट से उड़ाया है। जिनमें 74 स्कूल भवन, 29 आश्रम शालाएं, 15 आंगनबाड़ी केन्द्र व 128 अन्य शासकीय भवनें शामिल हैं। इसी तरह शासन प्रशासन ग्रामीण आदिवासियों तक ना पहुंच सके इसलिए लगभग 72 सड़के नक्सलियों ने खोद डाली है, इसके अलावा 135 बिजली टॉवर भी वे अब तक उड़ा चुके है। सरकारी आंकड़ों की माने तो नक्सलियों ने अब तक 3700 करोड़ रूपये से अधिक की संपत्ति का नुकसान पहुंचाया है।
जिला पुलिस और जवानों के बीच तालमेल का अभाव
हर हमले के बाद यह बात प्रमुख रुप से सामने आती है कि जो जवान सर्चिंग पर निकले थे उन्हें उस रास्ते की जानकारी नहीं थी, या फिर उन्हें सूचना सहीं नहीं मिली थी। जाहिर बिना जानकारी के कोई भी कुछ नहीं कर सकता। इसके लिए जरुरी है कि जिला पुलिस और वहां के स्थानीय निवासी जिन्हें एसपीओ बनाया गया है उनकी मदद सर्चिंग या नक्सली गतिविधियों से निपटने के लिए लेनी चाहिए। क्योंकि उन्हें वहां की भौगोलिक परिस्थितियों का ज्ञान होने के साथ-साथ नक्सलियों के संबंध में पुख्ता जानकारियां भी मिलती रहती हैं। जब तक बटालियनों और कंपनियों के तथा जिला पुलिस के आला अफसर आपस में तालमेल नहीं बिठाएंगे तक तक नक्सलियों से मुकाबला कर पाना असंभव है। इसके लिए पुलिस अफसरों को विशेष रुप से पहल करनी चाहिए तथा आपसी तालमेल के साथ ही किसी भी सूचना पर गतिविधी को अंजाम देने के लिए तैयारी की जानी चाहिए।
ऐसे कर सकते हैं मुकाबला
नक्सलियों का मुकाबला करने में गोली-बंदूक सहायक हो सकते है लेकिन जब तक नक्सलियों का मनोबल नहीं तोड़ा जाएगा तब तक हम उनका आसानी से मुकाबला नहीं कर सकते। नक्सलियों का मनोबल तोडऩे के लिए उन तक पहुंचने वाली तमाम चीजों को रोकना होगा जिनके सहारे वे जंगल में भी बड़े आराम से रह रहे हैं। भले ही नक्सली क्षेत्र में या जंगल में हमारी सूचना तंत्र कमजोर हो लेकिन यदि जंगल के बाहर मैदानी क्षेत्रों में ही हम अपने सूचना तंत्र को मजबूत कर लें और जिन रास्तों, जिन माध्यमों और जिन लोगों द्वारा नक्सलियों तक खाने-पीने, पहनने ओढऩे से लेकर हथियार तक, पहुंचाने का काम किया जा रहा है यदि इसकी पुख्ता सूचना मिल जाए और उनको जब्त करने या पकडऩे में पुलिस को कामयाबी हासिल हो जाए तो नक्सलियों से आधी लड़ाई ऐसे ही जीत जाएंगे। ऐसा नहीं है कि इसकी जानकारी पुलिस को नहीं मिलती होगी? मिलती जरूर होगी सूचनाएं लेकिन उस पर गंभीरता से अमल नहीं किया जाता। ऐसे कई उदाहरण हंै जिसमें पुलिस कोई बड़ी कामयाबी हासिल नहीं कर पाई जैसे रायपुर के सुंदरनगर में लगभग दो साल पहले हथियारों से भरी कार बरामद की गई थी, लेकिन उसकी असलियत क्या थी स्पष्ट नहीं हो पाई। इसी तरह जशपुर में पिछले साल विस्फोटकों से भरा एक पूरा ट्रक जब्त किया गया था लेकिन उसकी भी सच्चाई सामने नहीं आ पाई थी। सरकार और पुलिस तथा कंपनी तथा बटालियनों के जवानों को इस मामले पर गंभीरता दिखाने की जरूरत है क्योंकि इस नेटवर्क को तोडऩे में सफल होने के बाद ही नक्सलियों का मनोबल तोड़ा जा सकता है।
40 साल, 20 राज्य और हजारों वारदात
एक नहीं, दो नहीं, तीन नहीं बल्कि पूरे चालीस साल हो चुकें हैं नक्सल समस्या को देश में पांव जमाए। इतने लंबे समय में नक्सलियों ने अपना नेटवर्क इतना मजबूत कर लिया है कि वो आज देश के 20 राज्यों में अपनी सामानान्तर सरकार चला रहे हैं। नक्सली कौन है? कहां से आते हैं? क्या खाते हैं? कहां रहते हैं? उन तक घातक हथियार और जरूरतों के सामान कैसे पहुंचते हैं, यह ना तो राज्य सरकार को पता है और ना ही केन्द्र सरकार को? कई बार मुठभेड़ हो जाने और लगातार सर्चिंग के बाद भी आज तक पुलिस इनकी पहचान तक नहीं कर पाई है।
जानकारों की माने तो छत्तीसगढ़ में नक्सलियों का कोई भी बड़ा नेता नहीं है। लेकिन छत्तीसगढ़ राज्य में ही नक्सली अपनी जड़े काफी मजबूत कर चुुके हैं। दूसरे राज्यों के नक्सली नेता छत्तीसगढ़ में आकर इतनी सफाई से कई बड़ी घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं। शांत, सुकुन व धान का कटोरा कहा जाने वाला राज्य छत्तीसगढ़ आज लाल आतंक से पस्त हो चुका है। खनिज संपदा से भरपूर व सीधा-साधा प्रदेश अब देश भर में सिर्फ नक्सली आतंक के लिए ही जाना जाताा है। कभी सिर्फ बस्तर के जंगलों और दंतेवाड़ा, बीजापुर तक सक्रिय रहने व छुट-पुट घटनाओं को अंजाम देने वाले नक्सली अब प्रदेश के लगभग सभी जंगली क्षेत्रों में पहुंच चुके हैं। चाहे वह महानदी का उद्गम स्थल सिहावा नगरी हो या चाहे हीरा उगलने वाला मैनपुर गरियाबंद हो, सभी स्थानों पर नक्सली अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुके हैं। इन स्थानों पर ना सिर्फ नक्सलियों की अवाजाही है बल्कि अब वहां पर वे अपना ठिकाना भी बना चुके हैं। मोटे तौर पर कहा जाए तो गलत नहीं होगा कि राज्य का पूरा जंगल नक्सलियों के कब्जे में है। जंगलों में अपनी हुकूमत स्थापित कर लेने के बाद नक्सली अब धीरे-धीरे शहरों में पांव जमा रहे हैं।
रायपुर, दुर्ग, भिलाई, नांदगांव, महासमुंद आदि शहरों में नक्सलियों के अरबन नेटवर्क का खुलासा शहरी पुलिस द्वारा कई बार किया जा चुका है लेकिन एक बार जो हाथ लग गया उसके बाद पुलिस ना तो फालोअप करती है ना ही उसे कुछ हासिल होता है। इतना नेटवर्क मिलने के बाद भी हमारी पुलिस द्वारा कोई बड़ी कामयाबी हासिल नहीं कर पाना सबसे बड़ा चिंता का विषय है।
कहा जाए तो असीमित संसाधन और तमाम प्रकार की सुविधाओं के बाद भी हम हर मामले में नक्सलियों से पीछे हैं। नक्सलियों से निपटने के लिए सिर्फ गोली-बंदूकें ही काफी नहीं हैं। इस बात के उल्लेख करने के कई कारण हैं जैसे नक्सलियों का खुफिया तंत्र हमारे जवानों के खुफिया तंत्र से अधिक मजबूत है। ऐसा नहीं है कि उनके पास हमारे जवानों से ज्यादा घातक हथियार हैं लेकिन जिस तरह की भौगौलिक परिस्थिति में रहकर नक्सलियों ने अपने आप को तैयार कर लिया है वह उनका सबसे बड़ा हथियार है।
जंगली क्षेत्र के जानकारों की माने तो नक्सलियों से निबटने के लिए जितनी भी कंपनियां, उन क्षेत्रों में भेजी जाती हैं उन्हें वहां का जरा भी ज्ञान नहीं रहता। अनजान जगहों पर खतरनाक नक्सलियों से लडऩा अंधे कुंए में जाने से कम नहीं है। यदि कंपनी या बटालियनों के जवान भौगौलिक परिस्थिति में ढल भी जाएं तो समस्या वहां आती है कि उनके दुश्मन की पहचान क्या है? क्योंकि आज तक नक्सलियों की कोई वास्तविक पहचान नही हैं ? कोई पहचान नहीं होने का फायदा ही ये अब तक उठाते आए हैं और कोई भी बड़ी वारदात आसानी से करके फरार हो जाते हंै। जानकारों के मुताबिक नक्सली,आदिवासी क्षेत्रों मेेंं सामान्य नागरिक की तरह ही रहते हैं और जब किसी घटना को अंजाम देना हो तभी ये वर्दी धारण कर जंगलों मेें सक्रिय हो जाते हैं।
बताते है कि रानी बोदली में हुए 55 जवानों की हत्या के बाद यह बात सामने आई थी कि नक्सली ग्रामीण के वेश में किसी विवाह समारोह में शामिल होने आए थे और वहां उन्होंने सीआरपीएफ के जवानों से दोस्ती बना ली थी। कुछ दिनों तक जवानों के साथ लगातार बैठकर शराब का सेवन करते रहे और जिस रात यह घटना हुई कैम्प के सारे जवान शराब के नशे में थे। इसी तरह की एक अन्य घटना में थानेदार हेमंत मंडावी सहित 12 जवान नक्सलियों का शिकार बने थे। धमतरी जिले के रिसगांव में भी सर्चिंग पर निकले 11 जवानों को नक्सलियों ने इसी तरह मारा था। ग्रामीणों के वेश में अपनी पहचान छुपाने में नक्सली बड़ी आसानी से कामयाब हो जाते हैं।
आंकड़ों के मुताबिक छत्तीसगढ़ का लगभग 40 हजार वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र नक्सलियों के कब्जे में है। इसमें से करीब 13 हजार वर्ग किमी क्षेत्र में नक्सलियों का भारी दबदबा है। जानकारी के मुताबिक दंतेवाड़ा के कोंटा ब्लाक के चिंतलनार, चिंतागुफा, जुगरगुंडा, कांकेरलंका, बीजापुर के उसुर तरैम, पुजारी कांकेर, तारलागुड़ा, नारायणपुर जिले के अबूझमाड व बस्तर के मरदायाले व मारडूम में आजादी के इतने सालों बाद भी प्रशासन नहीं बल्कि नक्सलियों की तूती बोलती है। जानकार बताते हैं कि इस क्षेत्र के 35 लाख की आबादी में लगभग 12 लाख लोगों पर नक्सलियों की हुकूमत चलती है। नक्सलियों के खिलाफ चल रहे अभियान के लिए बीएसएफ, आईटीबीपी, सीआरपीएफ, छत्तीसगढ़ सशस्त्र बल तथा जिला पुलिस के लगभग 24 हजार से भी अधिक जवान तैनात हैं। जबकि पुलिस सूत्रों के मुताबिक लगभग 40-50 हजार सशस्त्र नक्सली इस क्षेत्र में हैं जिनमें करीब 15 हजार महिला नक्सली हैं, इनमें से 10 हजार नक्सली सैन्य प्रशिक्षण प्राप्त हंै। इतनी बड़ी संख्या में जंगलों में मौजूद नक्सलियों ने कभी अपनी पहचान सार्वजनिक नहीं की है। यही वजह है कि वे लगातार पुलिस व प्रशासन पर हावी हो रहे हैं।
पहले 10, फिर 20, 30, 55, और अब 77। नक्सलियों द्वारा मारे जा रहे जवानों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। हाल ही में 6 अपै्रल को दंतेवाड़ा के ताड़मेटला में हुआ नक्सली हमला देश का अब तक का सबसे बड़ा नक्सली हमला है। इस हमले से देश के गृहमंत्री पी. चिंदबरम खुद इतने व्यथित हो गए कि उन्होंने अपना त्याग पत्र प्रधानमंत्री के पास भेज दिया। भले ही उनका त्याग पत्र मंजूर नहीं किया गया हो पर इससे एक बात तो साफ है कि नक्सल समस्या वर्तमान में देश में आतंकवाद से बड़ी समस्या बन गई है। यदि छत्तीसगढ़ में नक्सलियों का प्रभाव इसी तरह बढ़ता रहा तो आने वाले कुछ वर्षों में पूरे प्रदेश में कश्मीर जैसे हालात पैदा हो सकते हैं।
बताते हैं कि छत्तीसगढ़, आंध्रप्रदेश, बिहार, झारखंड, कर्नाटक, म.प्र., उ.प्र., उड़ीसा, उत्तरांचल व पश्चिम बंगाल में लाल आतंक का साया बहुत अधिक है। आंकड़ों की माने तो देश के 180 जिलों में नक्सलियों का जबरदस्त आतंक है इसके अलावा 40 जिले ऐसे है जहां पर ये किसी ना किसी रूप में सक्रिय हैं। जबकि छत्तीसगढ़ को ये अब अपना गढ़ बना चुके हैं। विभागीय जानकारी के मुताबिक देश के वन क्षेत्रफल का 1/5 वां हिस्सा नक्सलियों के कब्जे में है।
जहां गरीबी वहां नक्सली
नक्सलियों को अपनी जड़े मजबूत करने में बस्तर की भौगौलिक स्थिति ने जितना साथ दिया इससे कहीं ज्यादा उन्हे वहां की गरीब जनता का समर्थन है। बताते हैं कि नक्सलियों की प्रत्येक गांव के लोगों तक सीधी पहुंच है। वे लगभग प्रत्येक गांव में जाकर मीटिंग करते हैं,इस मीटिंग की खास बात यह होती है कि उसमें प्रत्येक घर से एक व्यक्ति को शामिल होना अनिवार्य है। यदि ऐसा नहीं हुआ तो वह परिवार नक्सलियों की क्रूरता का शिकार हो जाता है। बताते हैं कि उस मीटिंग में वो लोगों के साथ न्याय करने का ढकोसला भी करते हैं। और अपने आप को उन ग्रामीणों का सबसे बड़ा हितैषी भी बताते हैं। नक्सलियों ने ग्रामीणों के दिलो-दिमाग पर अपना वर्चस्व हासिल कर लिया है। ये काम नक्सलियों ने एक दिन में हासिल नहीं किया बल्कि धीरे-धीरे सरकार के प्रति गरीबों के मन में नफरत पैदा कर उन्हें यह समझाते गए कि सरकार तुम्हारे लिए कुछ नहीं करेगी। सरकार ने ना तो पहले तुम्हारी मदद की है ना ही अब मदद करेगी। यदि तुम अपना विकास चाहते हो तो हमारा साथ दो। उनकी भाषा और बोली में बात कर नक्सलियों ने ग्रामीणों के दिलों में अपनी जगह बना ली है। आदिवासी व गरीब क्षेत्र के लोग सरकारी मदद लेते जरूर हैं पर दिल से वे नक्सलियों से जुड़े रहते हैं। यही कारण है कि किसी भी कार्रवाई की पूर्व सूचना नक्सलियों तक पहुंच जाती है।
सरकार से सीधी लड़ाई
विशेषज्ञों की माने तो माओवादी राज्य व केन्द्र सरकार के खिलाफ सीधी लड़ाई लड़ रहे हैं। हाल में हुए नक्सली हमने ने केन्द्र सरकार के समक्ष आंतरिक सुरक्षा और नक्सलवाद ग्रस्त इलाकों के विकास की बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। सरकार को देश की आंतरिक सुरक्षा के खिलाफ नासूर बन चुके नक्सलवाद से निपटने के लिए बेहतर रणनीति तैयार करने की जरूरत है। राजनेताओं को आपसी कलह और मतभेद भुलाकर इस मसले पर एकजुट होकर प्लांिनंग करनी चाहिए जिससे मजबूती के साथ इस समस्या से निपटने का जोश पैदा हो।
पशुपति से तिरूपति तक रेड कारिडोर बनाने के मंसूबे लेकर उतरे नक्सलियों का नरसंहार ऐसा ही चलता रहा तो बहुत जल्द वो इसमें कामयाब हो सकते हैं।
विकास विरोधी और आतंकी
माओवादी वर्तमान में विकास के सबसे बड़े विरोधी हैं। वे आदिवासी क्षेत्रों में गांवों तक ना तो सड़क बनने दे रहे हैं और ना ही वहां बने सरकारी स्कूल भवनों व अस्पतालों को सुरक्षित रहने दें रहे हैं। ऐसी कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं जिससे नक्सलियों ने सड़क निर्माण में लगे वाहनों को आग के हवाले कर दिया तो कहीं स्कूल व अस्पताल भवनों को बारूद से उड़ा दिया। नक्सली आतंक का पर्याय बन चुके हैं। उनका काम अब सिर्फ दहशत फैलाना और हत्या करना ही रह गया है। आंकड़े बताते है कि नक्सलियों ने पिछले पांच सालों में 248 शासकीय भवनों को विस्फोट से उड़ाया है। जिनमें 74 स्कूल भवन, 29 आश्रम शालाएं, 15 आंगनबाड़ी केन्द्र व 128 अन्य शासकीय भवनें शामिल हैं। इसी तरह शासन प्रशासन ग्रामीण आदिवासियों तक ना पहुंच सके इसलिए लगभग 72 सड़के नक्सलियों ने खोद डाली है, इसके अलावा 135 बिजली टॉवर भी वे अब तक उड़ा चुके है। सरकारी आंकड़ों की माने तो नक्सलियों ने अब तक 3700 करोड़ रूपये से अधिक की संपत्ति का नुकसान पहुंचाया है।
जिला पुलिस और जवानों के बीच तालमेल का अभाव
हर हमले के बाद यह बात प्रमुख रुप से सामने आती है कि जो जवान सर्चिंग पर निकले थे उन्हें उस रास्ते की जानकारी नहीं थी, या फिर उन्हें सूचना सहीं नहीं मिली थी। जाहिर बिना जानकारी के कोई भी कुछ नहीं कर सकता। इसके लिए जरुरी है कि जिला पुलिस और वहां के स्थानीय निवासी जिन्हें एसपीओ बनाया गया है उनकी मदद सर्चिंग या नक्सली गतिविधियों से निपटने के लिए लेनी चाहिए। क्योंकि उन्हें वहां की भौगोलिक परिस्थितियों का ज्ञान होने के साथ-साथ नक्सलियों के संबंध में पुख्ता जानकारियां भी मिलती रहती हैं। जब तक बटालियनों और कंपनियों के तथा जिला पुलिस के आला अफसर आपस में तालमेल नहीं बिठाएंगे तक तक नक्सलियों से मुकाबला कर पाना असंभव है। इसके लिए पुलिस अफसरों को विशेष रुप से पहल करनी चाहिए तथा आपसी तालमेल के साथ ही किसी भी सूचना पर गतिविधी को अंजाम देने के लिए तैयारी की जानी चाहिए।
ऐसे कर सकते हैं मुकाबला
नक्सलियों का मुकाबला करने में गोली-बंदूक सहायक हो सकते है लेकिन जब तक नक्सलियों का मनोबल नहीं तोड़ा जाएगा तब तक हम उनका आसानी से मुकाबला नहीं कर सकते। नक्सलियों का मनोबल तोडऩे के लिए उन तक पहुंचने वाली तमाम चीजों को रोकना होगा जिनके सहारे वे जंगल में भी बड़े आराम से रह रहे हैं। भले ही नक्सली क्षेत्र में या जंगल में हमारी सूचना तंत्र कमजोर हो लेकिन यदि जंगल के बाहर मैदानी क्षेत्रों में ही हम अपने सूचना तंत्र को मजबूत कर लें और जिन रास्तों, जिन माध्यमों और जिन लोगों द्वारा नक्सलियों तक खाने-पीने, पहनने ओढऩे से लेकर हथियार तक, पहुंचाने का काम किया जा रहा है यदि इसकी पुख्ता सूचना मिल जाए और उनको जब्त करने या पकडऩे में पुलिस को कामयाबी हासिल हो जाए तो नक्सलियों से आधी लड़ाई ऐसे ही जीत जाएंगे। ऐसा नहीं है कि इसकी जानकारी पुलिस को नहीं मिलती होगी? मिलती जरूर होगी सूचनाएं लेकिन उस पर गंभीरता से अमल नहीं किया जाता। ऐसे कई उदाहरण हंै जिसमें पुलिस कोई बड़ी कामयाबी हासिल नहीं कर पाई जैसे रायपुर के सुंदरनगर में लगभग दो साल पहले हथियारों से भरी कार बरामद की गई थी, लेकिन उसकी असलियत क्या थी स्पष्ट नहीं हो पाई। इसी तरह जशपुर में पिछले साल विस्फोटकों से भरा एक पूरा ट्रक जब्त किया गया था लेकिन उसकी भी सच्चाई सामने नहीं आ पाई थी। सरकार और पुलिस तथा कंपनी तथा बटालियनों के जवानों को इस मामले पर गंभीरता दिखाने की जरूरत है क्योंकि इस नेटवर्क को तोडऩे में सफल होने के बाद ही नक्सलियों का मनोबल तोड़ा जा सकता है।
Saturday, April 24, 2010
Tuesday, March 30, 2010
Saturday, March 27, 2010
Tuesday, March 23, 2010
Monday, March 8, 2010
महिला आरक्षण बिल. दबी-कुचली और योग्य महिलाओं को लाभ मिले तब होगा फलीभूत.
८ मार्च को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर महिलाओं को लोकसभा और विधानसभा में ३३ फीसदी आरक्षण के लिए बिल लाया गया.जिस तरह नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज ने अपने बयान में कहा कि पिछले १३ साल से अटके इस बिल को इस बार हम पास कराना चाहते है. इससे ऐसा लगता है कि इस बार ये बिल पास हो जायेगा. लेकिन वर्तमान परिस्थिति पर नज़र डालें तो इस बिल के पास हो जाने के बाद इस बात की चिंता जरुर जेहन में उठती है कि क्या इसका लाभ उन महिलाओं को मिल पायेगा जो निम्न वर्ग की और दबी-कुचली हैं? और उन महिलाओं को जो योग्य तो है लेकिन जिन्हें आगे बढने से रोका जाता है? क्योंकि अभी हालिया निबटे लोकल चुनाव पर नज़र डालें तो ऐसी अधिकांश महिलाये चुनाव जीत कर आई है जिनके परिवार का कोई न कोई पुरुष सदस्य राजनीति से जुड़ा है. आरक्षण के बाद ऐसे राजनीतिज्ञों की तो निकल पड़ेगी. क्योंकि आरक्षण के बाद इसका सबसे ज्यादा फायदा भी ऐसे ही राजनीतिज्ञ उठाने वाले है. सुषमा स्वराज ने रायपुर में अपने एक बयान में ये कहा कि जब तक महिलाए राजनीतिक रूप से सशक्त नहीं होंगी तब तक महिला सशक्तिकरण का कोई फायदा नहीं. इसी में मै ये कहना चाहता हूँ कि क्या राजनीतिज्ञों के परिवारों से जुडी महिलाओं के राजनीति में आने से महिला सशक्त होगी या फिर उन महिलाओं के आने से जो अपने दम पर राजनीति में आई है. क्यों भारत वर्ष का इतिहास रहा है कि यहाँ लाभ उठाना तो पद पर बैठे लोगों कि बपौती है. इस बिल का उद्देश्य तभी सफल होगा जब इसका फायदा सही महिलाओं को मिलेगा.
Thursday, March 4, 2010
योग छोड़ भोग में लिप्त हैं कई बाबा.उनके भक्तों का क्या?

भीमानंद,नित्यानंद और ना जाने कितने आनंद. तथाकथित बाबाओं ने पैसा कमाने का ऐसा तरीका इजाद किया है कि अच्छे-अच्छे को भनक तक ना लगे,लेकिन कहते है ना कि पाप का घड़ा भरते देर नहीं लगती. कोई बाबा सेक्स के कारोबार में करोड़ो अन्दर कर रहा है तो कोई सेक्स का आनंद लेने के लिए हेरोइन के साथ हमबिस्तर हो रहा है. ·कोई झूटे दावे करके लोगों को उल्लू बना रहा है तो कोई डर दिखाकर रुपये वसूल रहा है. देश में बाबाओं ने पैसा कमाने का एक बढ़िया धंधा बना लिया है.कई बाबाओं कि शक्ल ही ऐसी दिखती है जैसे किसी जेल से छूटे आरोपी की होती है. हमारे देश में धर्म-कर्म पर आस्था रखने-वालों कि कमी नहीं है इसी का फायदा ढोंगी बाबा बड़ी आसानी से उठा लेते है. उन्हें उन मासूम लोगों की भावनाओं से कोई लेना-देना नहीं जो उन पर अपना अटूट विश्वास रखते है.उन्हें तो बस अपनी झोली भरने और ऐश करने से मतलब है. यदि इन बाबाओं की करतूत पर गौर करें तो ऐसा लगता है कि नौकरी किये बिना, मेहनत किये बिना पैसा आसानी से कमाने के उद्देश्य और तमाम ऐशों आराम आसानी से पाने के लिए तथा पैसा कमाने कि जद्दोजहद से बचने के लिए बाबा बन जाते है. ताकि उनकी सारी जरूरते पूरी हो जाए. आज दीन-दुनिया के चक्कर में पड़ा आदमी पुण्य के चक्कर में बाबाओं के चक्कर में आसानी से पड़ जाता है इसका फायदा कथित ढोंगी किस्म के बाबा लगातार उठाते रहते है.बात तब खुलती है जब बाबा अपनी कई हदें पार कर देता है. भविष्य बताने, परेशानियों से बचाने का झांसा देकर लोगों को ठगने वालों की आज भी कमी नहीं है.कई समाचार-पत्रों में भी बाकायदा ऐसे बाबाओं द्वारा विज्ञापन देकर अपना धंधा चलाया जा रहा है.यदि इस तरह से ठगी करने वाले लोगों पर नज़र रखने निगरानी समिति बनाई जाये तो ठगी के इस कारोबार पर काफी हद तक रोक लगाई जा सकती है.
Monday, March 1, 2010
indian hockey team

चक दे इंडिया
भारतीय हांकी टीम
गोलकीपर: एड्रियन डी'सूजा, पीआर श्रीजेश
डिफ़ेंडर: संदीप सिंह, धनंजय महादिक, दिवाकर राम
मिड फ़ील्डर: गुरबाज सिंह, सरदार सिंह, भारत, अर्जुन हलप्पा, दानिश मुजतबा, विक्रम पिल्लई
फ़ॉरवर्ड: राजपाल सिंह, शिवेंद्र सिंह, तुषार खांडेकर, प्रभजोत सिंह, सरवनजीत सिंह, दीपक ठाकुर, गुरविंदर सिंह चांडी
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खिलाडियों का परिचय
एड्रियन डीसूजा
जन्म 24-3-1984 पोजिशन गोल कीपर
मुंबई के डीसूजा जनवरी 2004 से भारतीय टीम में हैं। इसी साल वह भारत के प्लेयर ऑफ ईयर से नवाजे गए। अब तक वह देश के लिए 135 मैच खेल चुकेहैं।
दिवाकर राम
जन्म - 8-12-1989 पोजिशन- डिफेंडर
गोरखपुर के रहने वाले दिवाकर राम के दनदनाते ड्रैग फ्लिक की बदौलत ने भारत ने 2008 मैं साउथ कोरिया को हराकर जू. एशिया कप जीता था। सीनियर टीम में वह 14 मैच खेले हैं।
सरदारा सिंह
जन्म - 15-7-1986 पोजिशन - सेंटर, फुलबैक
पीएचएल में हैदराबाद सुल्तान और चंडीगढ़ डायनमोज के कप्तान रह चुके हरियाणा के सरदारा सिंह 2008 में भारतीय हॉकी टीम के सबसे युवा कप्तान में शुमार हुए।
गुरबाज सिंह
जन्म - 09-08-1988, पोजिशन - मिडफील्डर
76 मैच खेल चुके गुरबाज सिंह की कप्तानी में भारत ने जू. एशिया कप जीता था। किलोर्स्कर हॉकी एकेडमी का यह खिलाड़ी किसी भी मुकाबले का पासा पलटने का माद्दा रखते हैं।
भरत चिकारा
जन्म - 10-10-1986, पोजिशन - मिडफील्डर
हरियाणा के भरत चिकारा ने कोच जोएकिम कावोर्ल्हो के समय अंतरराष्ट्रीय कैरियर का आगाज किया था। चिकारा बहुत चतुर स्कोर हैं । वह अब तक 60 मैच खेल चुके हैं।
शिवेंदर सिंह
जन्म - 9-6-1987, पोजिशन - फारवर्ड
मध्य प्रदेश का यह युवा खिलाड़ी ने पहले कोच एसपी सिंह और बाद में गुरबक्स सिंह की निगरानी में हॉकी का ककहारा सीखा। 2006 में पदापर्ण के बाद से उन्होंने 102 मैच में 48 गोल दागे हैं।
दानिश मुज्तबा
जन्म - 20.12.1988, पोजिशन - मिडफील्डर
दिल्ली के दानिश मुज्तबा ने 2009 में कोच होसे ब्रासा की निगरानी में अपने कैरियर की शुरुआत की। वह अब तक राष्ट्रीय टीम से देश के लिए 10 मैच खेल चुके हैं।
राजपाल सिंह
जन्म - 08-08-1983, पोजिशन - फारवर्ड
कप्तान राजपाल सिंह अब तक 120 मैच खेल चुके हैं। खुद पर भरोसा करना उनकी ताकत है। उनका कहना है बेशक भारत को कठिन ग्रुप मिला है लेकिन टीम अंतिम चार में जगह बनाने में कामयाब रहेगी।
प्रभजोत सिंह
जन्म - 14.08.1980 पोजिशन - फारवर्ड
भारतीय हॉकी के सबसे तेज तर्रार लेफ्ट विंगर प्रभजोत सिंह मुख्य कोच ब्रासा के सबसे पसंदीदे और भरोसेमंद खिलाड़ी हैं। इसलिए ब्रासा ने बतौर कप्तान पंजाब के इस खिलाड़ी का नाम हॉकी इंडिया के सामने पेश किया था।
तुषार खांडेकर
जन्म - 05-04-1985
पोजिशन - फारवर्ड
एशिया कप 07 (गोल्ड) में भारतीय टीम का हिस्सा रह चुके तुषार खांडेकर ने अब तक देश के लिए 166 मैच खेले हैं और कुल 42 गोल दागे। उन्होंने आस्ट्रेलिया के खिलाफ टेस्ट सीरीज में भारत का नेतृत्व किया।
दीपक ठाकुर
जन्म - 28-12-1980,
पोजिशन - फारवर्ड
भारतीय हॉकी का हीरा है दीपक ठाकुर। यह कहना है कोच हरेंद्र सिंह, जिन्होंने 2009 अर्जेंटीना टूर पर उसे राष्ट्रीय टीम में वापस बुलाया। अर्जेंटीना दौरे पर वह एक अवतार के रूप उभरे।
पीआर श्रीजेश
जन्म - 8-5-1988, पोजिशन - गोलकीपर
केरल से लंबे समय बाद कोई राष्ट्रीय टीम में आया है तो वह है पीआर श्रीजेश। यह एक उदीयमान गोलकीपर है और उसे एंड्रियन डीसूजा के विकल्प के रूप में देखा जा रहा है।
श्रवणजीत सिंह
जन्म - 3-07-1988, पोजिशन - फारवर्ड
पंजाब के स्ट्राइकर श्रवणजीत ने 2007 सुल्तान अजलान शाह कप में कोच जोएकिम कार्वालहो की देखरेख में अंतरराष्ट्रीय कैरियर का आगाज किया था तब से वह 22 मैच खेल चुके हैं।
गुरविंदर सिंह चांदी
जन्म - 20-10-1989 पोजिशन - फारवर्ड
गुरविंदर गजब का फारवर्ड खिलाड़ी है। 2008 में आस्ट्रेलियन चार नेशंस टूर्नामेंट से सीनियर टीम में आगाज करने वाले गुरविंदर ने इस दौरे पर आठ मैचों में तीन गोल दागे थे।
विक्रम पिल्ले
जन्म - 27-11-1981 पोजिशन - मिडफील्डर 163 मैच खेल चुके विक्रम पिल्लै काफी डायनामिक मिडफील्डर हैं। 2004 हॉलैंड टेस्ट सीरीज में वह बेस्ट प्लेयर के खिताब से नवाजे गए।
अर्जुन हलप्पा
जन्म - 17-12-1980 पोजिशन - मिडफील्डर
वर्ल्ड कप में भारत के सबसे अनुभवी खिलाड़ी हैं अर्जुन हलप्पा। कनार्टक का यह खिलाड़ी अब तक 199 मैच खेल चुका है और 32 गोल दोग हैं। इस वर्ल्ड कप में उनपर काफी दारोमदार है।
धनंजय महादिक
जन्म - 5-11-1984 पोजिशन - मिडफील्डर
धनंजय ने अर्जेंटीना के साल्टा में चैंपियंस चैलेंज कप के दौरान खुद को बेहतरीन ऑलराउंडर साबित किया था। 28 मैच मेंं 10 गोल करने वाले महादिक लेफ्ट फुलबैक और मिडफील्डर भी हैं।
संदीप सिंह
जन्म - 27-2-1986 पोजिशन - डिफेंडर
ड्रैग फ्लिकर संदीप सिंह को 18 बरस की उम्र में भारत की सीनियर टीम में खेलने का मौका मिला। उन्होंने 2004 में जूनियर एशिया कप जीतने में अहम भूमिका निभाई।
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